अमित कुमार मल्ल की 5 कविताएं

अमित कुमार मल्ल

जन्म स्थान – देवरिया

शिक्षा – स्नातक (दर्शन शास्त्र , अंग्रेजी साहित्य , प्राचीन इतिहास व विधि  ), परास्नातक ( हिन्दी साहित्य )
सम्प्रति  –  सेवारत
रचनात्मक उपलब्धियां-

प्रथम काव्य संग्रह – लिखा नहीं एक शब्द , 2002 में प्रकाशित ।
प्रथम लोक कथा संग्रह – काका के कहे किस्से , 2002 में प्रकाशित ।वर्ष 2018 में इसका  , दूसरा व पूर्णतः संशोधित  संस्करण प्रकाशित। 
दूसरा काव्य संग्रह – फिर , 2016    में प्रकाशित ।
2017 में  ,प्रथम काव्य संग्रह – लिखा नही एक शब्द का अंग्रेजी अनुवाद Not a word was written प्रकाशित ।
तीसरा काव्य संग्रह – बोल रहा हूँ , वर्ष 2018 के जनवरी  में प्रकाशित ।
आकाशवाणी लखनऊ से काव्य पाठ प्रसारित।

पुरस्कार / सम्मान
राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान , उत्तर प्रदेश द्वारा 2017 में ,डॉ शिव मंगल सिंह सुमन पुरस्कार , काव्य संग्रह , फिर , पर दिया गया ।
मोब न0 9319204423
इ मेल –amitkumar261161@gmail.com

एक

लड़ो 
लड़ो 
लड़कर जीतने के लिए

जीत 
न हो 
लड़ो 
जमकर लड़ने के लिए

साँस न दे 
साथ अंत तक 
लड़ो 
लड़ने की शुरुआत के लिए

प्रारंभ न 
हो तो भी 
लड़ो 
लड़ाई के विश्वास के लिए

विश्वास 
बन जाये 
पिघलती बर्फ
लड़ो 
लड़ाई के सपने के लिए

दो

मोबाइल बंद करके
टी वी देखता हूँ
रिमोट से
अपने चाहे
अनुसार
चैनल बदलता हूँ

बिना मेहनत के ,
बिना लड़े 
बिना हारे
अपने
चाहे अनुसार ,
दुनिया बनाता हूँ
अपनी चाही दुनिया में
रहने का
सुकून पाता हूँ ।

तीन

लहुलुहान हूँ मैं
घायल आत्मा है
चीत्कार तड़प रही है
धरती से आसमाँ तक
किन्तु मैं हारा नहीं हूँ।

फूटती है बिजलियाँ
कंपकपाते हैं बाजू
टूट गए है तूणीर
धूल धूसरित हो गयी है आशाएँ
किन्तु धड़क रहा हूँ
और धड़कूँगा इसी तरह।

ऐ वक्त के ख़ुदाओ!
नहीं ले रहा हूँ दम
जीत रहा हूँ थकन
सी रहा हूँ ज़ख्म

लौटूँगा !
लौटूँगा!!
जुझूँगा, इसी समर में।

चार

वह
बहुत अच्छा था
सपने बुनता था
थक जाता था
सो जाता था

वह
बहुत शालीन था
सपने देखता था
पर जोड़ता न था अपने को

वह
बहुत सभ्य था
सपनों का दर्द
उसे रुलाता नहीं था
मालूम था उसे
सपने का दर्द केवल सपने में है

वह
बहुत सुलझा था
खूबसूरत सपने देखता था
यथास्थिति तोड़ने का
ख़तरा नहीं लेता था

वह 
बहुत सफल था
सपने न पूरे हो
फिर भी देखता था,
दुनियाई सपनों में
शुमार के लिए बुनता था
सपनों के भीतर सपने

पांंच

मुझे पहचानना चाहते हो 
तो देखो 
सुबह की चहचहाती चिड़िया

मुझे पहचानना चाहते हो
तो देखो 
सुलगती दहकती चिंगारी

मुझे पहचानना चाहते हो
तो देखो
ज़मीन में घुलते और बीजते बीजों को

उगूंगा मैं
फोड़ कर वही पथरीली धरती 
जहा खिलते हैं , बंजर-कांटे – झाड़िया

 

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