अनिरुद्ध सिन्हा की 5 ग़ज़लें

अनिरुद्ध सिन्हा

जन्म-2 मई 1957

शिक्षा-स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र)

प्रकाशित कृतियाँ

(1)नया साल (2)दहेज (कविता संग्रह )(3))और वे चुप हो गए (कहानी-संग्रह)(4)तिनके भी डराते हैं (5)तपिश (6)तमाशा (7)तड़प (8)तो ग़लत क्या है (9)ताकि हम बचे रहें (10)तो मैं ग़ज़ल कहूँ (ग़ज़ल-संग्रह)(11)हिन्दी ग़ज़ल सौंदर्य और यथार्थ (12)हिन्दी ग़ज़ल का यथार्थवादी दर्शन (13)उद्भ्रांत की ग़ज़लों का सौंदर्यात्मक विश्लेषण (14) हिन्दी ग़ज़ल-परंपरा और विकास (15)हिन्दी ग़ज़ल का नया पक्ष (16)हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे (17)किताबों का सफ़र (आलोचना)

 सम्पादन

(1)हिन्दी ग़ज़ल का बदलता मिजाज (2)आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल समूहिक संवेगों का आख्यान (4)हिन्दी ग़ज़ल प्रकृति और पर्यावरण (5)बिहार के प्रतिनिधि ग़ज़लकार (6)

सिसकियों की सदा (7)किसी-किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है (अशोक मिजाज की ग़ज़लें ।

साहित्यिक पत्रिका (1)समय सुरभि (2)तर्जनी (3)जनपथ के ग़ज़ल विशेषांक का सम्पादन

सम्मान 

बिहार उर्दू अकादेमी,राजभाषा,विद्यावाचस्पति,नई धारा का रचना सम्मान,लक्ष्मीकांत मिश्र स्मृति सम्मान,संकल्प साहित्य संस्थान राऊरकेला का वार्षिक सम्मान,हिन्दी भाषा साहित्य परिषद खगड़िया का स्वर्ण सम्मान के अतिरिक्त दर्जनों साहित्यिक सम्मान।

संप्रति

स्वतंत्र लेखन

संपर्क

गुलज़ार पोखर,मुंगेर(बिहार)811201

Email-anirudhsinhamunger@gmail.com

Mobile-7488542351,/9430450098   

एक

सहरा  उदास  है  न  समंदर  उदास है

आँखों  के सामने  का ये मंज़र उदास है

रोया  तमाम  रात  किसी  के ख़याल में

सुर्ख़ी है उसकी आँखों में बिस्तर उदास में

उभरा है आइने में हमारा ही जब से अक्स

तब से  हमारे  हाथ  का  पत्थर उदास में

सारे  मकान वाले  बिछाए हैं छत पे जाल

बुलबुल  भी है  उदास  कबूतर  उदास  है

सावन  है पास  और  हवा  का दबाव भी

दीवार  गिर  न  जाए  मेरा घर उदास है

 

दो

तहों में दलदल सतह पे साज़िश धुआँ-धुआँ-सा हरेक घर है

झुकी हुई है हमारी गर्दन घरों में रह के भी दिल में  डर है

हताहतों  से  लिपट गए  हैं अलग-अलग  ये तमाम चेहरे

उदास  मौसम  उदास दुनिया  उदासियों  में डगर-डगर है

कहाँ है  बादल कहाँ समंदर  कहाँ घटाओं का शोर-गुल भी

सभी  परिंदे थके-थके हैं  थकन  का मौसम शजर-शजर है

है शोर इतना खमोशियों का है बोझ इतना अकेलेपन का

हरेक घर का यही है  मंज़र जो कुछ इधर है वही उधर है

हथेलियों पर पड़े हैं आँसू  किसे है फुर्सत जो बढ़ के देखे

जिधर भी देखो बिछी हैं लाशें ये एक मंज़र नगर-नगर है

 

तीन

सुलग रहा है ये अपना वतन ज़रा सोचो

लगी है आज ये कैसी  अगन ज़रा सोचो

किसी की कोई ख़बर ही कहाँ है अब उनको

ये हुक़्मरान हैं कितने  मगन ज़रा  सोचो

कहीं से आज खुशी की ख़बर नहीं  आती

उदास रात की  जैसी घुटन  ज़रा  सोचो

नए  ज़माने के फ़ैशन में ढल गई है अब

पुराने  दौर का  छूटा चलन  ज़रा  सोचो

ग़ज़ब  तो ये है  परिंदा नज़र नहीं आता

उजड़  रहा है  गुलों का चमन ज़रा सोचो

 

 

चार

नगर में  आए  हैं तो  ख़ानदान है ग़ायब

पिता की  याद का कच्चा मकान है ग़ायब

कहाँ से  चाँद  सितारों  पे  हो चहलकदमी

हमारे  सर  से  अभी आसमान  है  ग़ायब

किसी ने प्यार से आकर जो छू लिया मुझको

बदन के ज़ख्म का हर इक निशान है ग़ायब

थका -थका  सा   परिंदा   उदास  बैठा  है

परों  से जाने  क्यों  उसकी उड़ान है ग़ायब

बिखरते- टूटते  लम्हों   की  दास्तां  चुप है

हमारे  मुँह   से  हमारी  ज़ुबान  है  ग़ायब

 

पांच

क्या कहा  ज़िन्दगी ज़रा-सी है

जो भी जितनी है वो बला-सी है

कब बरस जाए कोई ठीक  नहीं

रात  आँखों में इक घटा- सी है

कौन हँसता है ज़र्द मौसम  में

हर तरफ़ तो अभी  उदासी  है

मैं  जिसे  पूजता हूँ वो धरती

क्यों मेरे आँसुओं की प्यासी है

वो जिधर जाए फूल खिल जाएँ

वो  है पानी-सी और हवा-सी है

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