बोर्ड पर काली चॉक से मैं नहीं लिख सकता-मंटो

रंजन ज़ैदी

मंटो-शताब्दी वर्ष बीत गया लेकिन उसके चर्चे अब भी महफ़िलों में जारी हैं क्योंकि वह एक जीवंत और संघर्षशील कहानीकार था। वह एशिया उप-महाद्वीप में उस समय जन्मा था जब हिन्दुस्तान अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था और देश पर अंग्रेज़ी साम्राज्य की हुकूमत थी। इसके बावजूद मंटो के पास लिखने की आज़ादी थी। वह जानता था कि रचनात्मक साहित्य की सर्जना किसी भी तरह की पाबंदियों के अधीन नहीं हो सकती, इसीलिए वह आज़ादी के साथ लिखता रहा।

      तत्कालीन सामाजिक-स्थितियां एक ओर देश व समाज पर अपना प्रभाव डाल रही थीं, वहीं मंटो की तत्कालीन रचनाएं अपने सामाजिक परिदृश्य को शाब्दिक अर्थ व स्वर प्रदान करने की ज़िम्मेदारी निभा रही थीं। 

       अजीब बात यह है कि सादत हसन मंटो की कहानियों पर तब जिन लोगों की ओर से मुकदमे दायर किये गये थे, वे अंग्रेज़ नहीं थे और न ही अंग्रेज़ी हुकूमत के प्रतिनिधि थे, वे तो उसके अपने थे जो समाज में दोहरी ज़िन्दगी जीते थे और नहीं चाहते थे कि उनके वर्ग की लाशों की जेबों से कहानियां निकाली जांएं और चेहरे बेनक़ाब हो जाएं। मानव-अस्तित्व के स्थायित्व  की वकालत करने वाले व्यवस्था विरोध निडर मंटो की कहानियों के वे ऐसे किरदार थे जो आने वाले परिवर्तन की कल्पना से कांपते रहते थे लेकिन अपनी कमज़ोरियों के रहते मंटो पर गोली नहीं चला सकते थे क्योंकि तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था उन्हें खाद-पानी मुहैया करा रही थी।         

       सादत हसन मंटो को हिन्दी-उर्दू के महान कथाकारों में शुमार किया जाता है क्योंकि उसने पूरी जिन्दगी आम किरदारों की आवाज़ बनकर अपने अफ़सानों को ज़िन्दगी दी। वही आम आदमी जो मंटो के समय में दुख, सामाजिक व राजनीतिक शोषण का शिकार रहा था, वही आज भी सामाजिक असमानता, शोषण, साम्प्रदायिक-हिंसा, बलात्कार और भ्रष्टाचार का शिकार है। इसलिए मंटो के अफ़साने आज भी ज़िन्दा हैं और शायद आगे भी ज़िदा रहेंगे। उनका पहला कहानी संग्रह आतिश पारे 1936 में लाहौर से प्रकाशित हुआ था। यदि वह 20 वर्ष और जीवित रह जाते तो उर्दू-हिन्दी कहानी-कोश अत्यधिक समृद्ध हो जाता।

     सरदार टोबाटेक सिंह, ठंडा गोश्त, नंगी आवाज़ें, आखिरी सियालकोट, खाली बोतलें-खाली डिब्बे, काली शलवार, खोल दो, नया कानून, लाइसेंस, ब्लाउज़ और अनारकली जैसे अफ़सानों का लेखक बुद्धिजीवियों के बीच सस्ते और अश्लील साहित्य के रचयिता के रूप में उपेक्षा का शिकार रहा। हालांकि वह प्रगतिशील आंदोलन के लेखकों में काफ़ी समय से सक्रिय था और उसकी रचनाओं को चटखारे ले-लेकर चोरी-छुपे पढ़ा जाता था, फिर भी उसके साहित्य को गम्भीरता से नहीं लिया गया। अश्लील अफ़सानों को लेकर उनके विरुद्ध कानूनी प्रशासनिक कार्यवाइयां भी हुईं, उन्हें दंडित भी किया गया लेकिन कालांतर में जैसे लोगों को समझ में आने लगा कि मंटो यथार्थवादी कथाकार है।           

      मंटो की कहानी ठंडा गोश्त प्रकाशित हुई तो उनके विरुद्ध तत्कालीन प्रशासन ने कार्रवाई की। उन पर मुकदमा चला और अदालत की ओर से उन्हें 3 माह की कैद और 300 रुपये के जुर्माने की सज़ा दी गई। मंटो के ऐसे 5 अफ़साने थे जिनपर मुकदमे चलाये गये। इनमें काली शलवार जैसी कहानी भी शामिल थी। बड़ी अजीब बात यह है कि मंटो पर मुक़दमे कोलोनियल-पावर ने नहीं बल्कि उनके अपने हमवतनों ने दायर किये थे।       

अपने बयान में सफ़ाई देते हुए एक बार उन्होंने कहा था कि वह अपने लेखन और अपनी रचनाओं की शाब्दिक-मर्यादा और उसकी सीमाओं से भलीभांति परिचित हैं। वह अश्लील कथाकार नहीं, अफ़सानानिगार हैं। उन्हीं के अनुसार,’मैं ब्लैक बोर्ड पर काली चॉक से नहीं लिख सकता, सफ़ेद चॉक इस्तेमाल करता हूं ताकि ब्लैकबोर्ड की स्याही और साफ़ नज़र आने लगे।‘              

            डी. एच. लारेंस के उपन्यास लेडीज़ चेटरलीज़ लवर के प्रकाशन और विक्रय पर अमेरिका व ब्रिटेन में एक लम्बे समय तक प्रतिबंध लगा रहा। उपन्यास के कुछ हिस्से उसके जीवन-काल में भी प्रकाशित हुए। उसकी मृत्यु के लगभग 30 वर्ष बाद जब मुकम्मल उपन्यास प्रकाशित हुआ तो उसने हलचल मचा दी और आज वही उपन्यास कालजयी उपन्यासों में शुमार किया जाता है। यही स्थिति यूलिसिस उपन्यास की रही। मुकदमे चले, प्रतिबंधित हुआ लेकिन समय-काल से निकलकर अंततः वह पाठकों के बीच पहुंचकर अपनी पहचान बनाने में कामियाब हो गया।     

      वास्तविकता यह है कि अश्लीलता की परिभाषा अपने समय और काल में बदलती रही है। 250 हज़ार साल पहले संस्कृत के ग्रंथ काम-सूत्र के रचयिता वात्स्यायन पर भी अश्लील साहित्यकार की मुहर लगाई गई थी किन्तु कालांतर में उसी काम-सूत्र ने संस्कृत साहित्य के कालजयी ग्रंथों में अपना स्थान बनाया। फोर्ट विलियम कॉलेज द्वारा प्रकाशित तोता कहानी की अनेक कहानियों को अश्लील कहानी बताया जा सकता है लेकिन इसके बावजूद हम आज तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि मूलतः अश्लीलता की परिभाषा है क्या।

            देखा जाये तो, जो कानून 1856 में ऑब्सीन बुक्स एंड पिक्चर्स एक्ट के नाम से ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बनाया था, वही कानून इंडियन पीनल कोड ने भी अपनाया जिसके अंतर्गत काली शलवार, बू और धुआं जैसी कहानियों को अश्लील साहित्य में शुमार करते हुए उसके लेखक सादत हसन मंटो पर भारत में, ठंडा गोश्त, और खेल दो तथा ऊपर नीचे दरमियान पर पाकिस्तान में मुक़दमे चलाये गये। एक जगह मंटो लिखते भी हैं-’मैं अपने लेखन और रचना की अस्मिता से भली-भांति परिचित हूं। मेरे कलम से अश्लील शब्दों की सर्जना संभव नहीं है। मैं अश्लील साहित्य का सर्जक नहीं, कहानीकार हूं।’ लेकिन वही कहानीकार आज समकालीन परिस्थितिजन्य साहित्य की उपादेयता के सामने सवालिया निशान लगाये हमें फिर से झिंझोड़ने पर मजबूर कर रहा है।     

      मंटो ने 325 कहानियां लिखीं। 25 कहानियां सहलिंगता पर आधारित थीं। उर्दू की प्रतिष्ठित कवयित्री किश्वर नाहीद अपने संस्मरण में बताती हैं कि जब वह सातवीं की छात्रा थीं तब उन्होंने मंटो की कहानी ठंडा गोश्त पढ़ी लेकिन उनकी समझ में नहीं आया कि इस कहानी में ऐसा क्या है जिसके कारण घर में औरतें इसका़ ज़िक्र किया करती है? उन्होंने अपने भाई से जानना चाहा तो उन्होंने किश्वर नाहीद के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया और हिदायत दी कि भविष्य में मंटो की कहानियों को वह न पढ़े।         

इसके बावजूद किश्वर नाहीद ने मंटो को पढ़ा और उसके विचारों से सहमत भी हुई। उसे मंटो का नज़रिया साफ़ लगा, ’हरेक शहर में बदरू और मोरनियां मौजूद हैं जो शहर की गंदगी को बाहर ले जाती हैं। हम अपने संगेमरमर के गुस्लखानों की बात कर सकते हैं, अगर हम साबुन और लिवेंडर की बात कर सकते हैं तो इन मोरियों और बदरुओं का ज़िक्र क्यों नहीं कर सकते जो हमारे बदन का मैल पीती हैं?‘ इस बयान से ही लग जाता है कि मंटो कितने बड़े कथाकार थे और उनका चिंतन समाज के किन त्रासदपूर्ण-चरित्रों और पात्रों के चित्रण को महत्व देता था। समाज से उठाये हुए शारदा, मोजे़ल और कुलसूम जैसे पात्र मंटो के स्वस्थ चिंतन की गवाही देते हैं। मोज़ेल विभाजन की त्रासदी से प्रभावित एक अवस्मरणरीय ओर कालजयी कहानी है। ठंडा गोश्त भी इसी चिंतन की गवाही देता है जो भारत-पाक विभाजन और साम्प्रदायिक-हिंसा की भयानक त्रासदी के बीच जन्मा।           

पाकिस्तान में जाकर बसने की इच्छा मंटो की अपनी नहीं, उनकी पत्नी की थी जो वहां बसकर एक खुशहाल ज़िन्दगी गुज़ारने का स्वप्न देखना चाहती थीं। उस समय की स्थितियों में खुशहाली का स्वप्न देखना ही किसी भयानक स्वप्न से कम नहीं था क्योंकि उन स्थितियों में सरदार टोबाटेक सिंह नये मुल्कों की सरहद पर अपने खेत तलाश रहा था। सरहदों के दोनों ओर लाइन से सस्ते दामों पर ठंडा-गोश्त बेचा जाता रहा था, काली शलवारों की गिरहों के फंदे गिने जा रहे थे। जब बवंडर गुज़रा और महामारी के चिन्ह भी मिटने लगे तो मंटो दुनिया से ही कूच कर गया। शायद वह न भी कूच करता अगर लाहौर स्वार्थी और अवसरवादी शहर न बन जाता, मंटो से मुल्क की सियासत मुम्बई का सिने-जगत न छीन लेती और उन्हें कोई यह बता देता कि कालांतर में पाकिस्तान एक लोकतांत्रिक देश बनेगा। लेकिन हुआ यह कि राजनीति ने पाकिस्तान को वहां की अस्थिर सैनिक तानाशाही की गोद में डाल दिया जिससे मंटो आहत होकर टूट गये। ‘56 वर्ष बाद पाकिस्तान सरकार को इस महान कथाकार को सितार-ए-इम्तियाज़ से सम्मानित करने का विचार आया।      

      मंटो की शिकायत थी कि पाकिस्तान की ब्रांडेड फ़तवा-कम्पनियां उन्हें कम्युनिस्ट मानती हैं और उनकी मृत्यु के बाद क़ब्र के कतबे पर भी यही मैडल चिपका दिया जायेगा लेकिन यह बात कहने वाला कोई नहीं होगा कि यहां वह कथाकार मंटो दफ्न है जो सच्चाइयों को गहराइयों तक देखने, परखने और बुरों को गले लगाने तक का हौसला रखता था। वह मंटो जिसने मानस की खोज में, मनुष्य को तलाश किया।   

      नया कानून अफ़साने में अंग्रेज़ों के विरुद्ध आज़ादी की जंग का नज़रिया प्रस्तुत किया गया था। इसमें मंगू पात्र के द्वारा अंग्रज़ों के विरुद्ध जो आक्रोश व्यक्त किया गया गया था उसे लेकर मंटो पर मुकदमा किया जा सकता था लेकिन अंग्रेजी हुकूमत तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर मंटो को पुनः जेल में डालने से इनकार कर दिया। इसी तरह टोबाटेक सिंह मंटो की श्रेष्ठ और कालजयी कहानियों में से एक है।       

बंटवारे की त्रासदी के मध्य मंटो इस प्रश्न से भी जूझते रहे थे कि दोनों मुल्कों की साझी विरासत और साहित्य का भी बटवारा हो जाएगी? क्या उस रूप में साहित्य, समाज औेर राजनीति की स्थितियां भी बदल जायेगी? क्या उनके समय का मनुष्य, चिंतक-विचारक, शायर, पत्रकार, समाज-सुधारक और राजनेता आने वाले समय में अपना रूप बदल लेंगे? क्या साहित्यिक-रचनाएं आतंकवाद की दहशत में जन्म लेंगीं? क्या आने वाले समय का कहानीकार मंटो की तरह अपने गोपीनाथ, मोज़ेल और मम्मी जैसे पात्रों को अपने समाज में बिना व्हाईट-कालर बनाये कहानियों में ला सकता है?       

      मंटो ने अफ़सानों के अतिरिक्त अनेक रेखा-चित्र, नाटक और फिल्मों के लिए कहानियां लिखीं। यहां तक कि उन्होंने फ़िल्मों में काम भी किया। उनका जन्म मई 11, 1912 में ज़िला लुधियाना, पंजाब के सम्बराला गांव में हुआ था और मृत्यु  जनवरी 18, 1955 में लाहौर में हुई।

      यह मृत्यु कथाकार मंटो की नहीं, उस पदार्थ की मृत्यु थी जो मिट्टी में विलीन हो गया था लेकिन उस पदार्थ के भीतर का कथाकार आज भी जीवित है। जीवित इसलिए कि कालजयी रचनाओं के रचयिता की मृत्यु कभी नहीं होती। आज तो बस एक ही सवाल का जवाब तलाशा जा रहा है कि मंटो बम्बई से पाकिस्तान क्यों चले गये, वो भी मात्र 8 वर्षों के लिए? इसका जवाब उनके समकालीन कथाकार कृष्न चंदर, राजेंद्र सिंह बेदी, गुलाम अब्बास और इस्मत चुग़ताई तक नहीं दे पाये। शायद आप दे सकें….।

1 Response

  1. एस पी सुधेश says:

    बढिया और सारगर्भित लेख के लिए आप को बधाई । लगता है आप ने मन्टो को खूब पढा और गुना है ।

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