नामवर की दृष्टि में प्रेमचंद

अनिता यादव

प्रेमचंद और नामवर सिंह का नाम साथ में आते ही पहला विचार आता है हिंदी साहित्य के दो युग पुरुष एक साथ एक स्थान पर। एक अनेक विरोध के  बावजूद शीर्ष पर बैठा हुआ है  और दूसरा उसको शीर्ष पर स्थापित करने में पूर्ण समर्पित है।  प्रेमचंद का विरोध कोई नई बात नहीं। सोज़े वतन की प्रतियां जब्त करने से लेकर प्रेमा तथा गत वर्ष गोदान आदि कृतियों को जलाना इसका प्रमाण है। प्रेमचंद का विरोध करने वाले ही नहीं अपितु हर साहित्य प्रेमी को यह पुस्तक ध्यानपूर्वक अध्ययन करने के लिए आवश्यक है। नामवर जी सबके सम्मुख प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या दलित जीवन पर लिखने का सामर्थ्य गैर दलित नहीं कर सकता है। जिसने स्वयं जीवन में वह भोगा नहीं है किंतु संवेदनशीलता है वह सहानुभूति या गहरा लगाव महसूस करता है वह उन पर क्यों नही लिख सकता है। और क्या औरत  को औरत ही रिप्रेजेंट करेंगी?फिर महिला लेखिका के साहित्य में पुरुष पात्र और पुरुष लेखक की रचना में महिला पात्र कैसे रचे जायेंगे। यहाँ प्रश्न किसी वर्ग निर्धारण का नहीं संवेदना के प्रेषण का है। पर नामवर जी एक विशेष तथ्य की ओर ध्यान दिलाते हैं कि जब प्रेमचंद लिख रहे थे तब न कोई नारीवादी आंदोलन और ना ही दलित विमर्श चल रहा था। प्रेमचंद का सेवा सदन निर्मला और प्रेमा उपन्यास स्त्री समस्या तथा ठाकुर का कुआं दूध का दाम गोदान आदि दलित प्रसंग से जोड़ता है। क्या यह अपने समय में एक साहसिक कार्य नहीं है और इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि किसी और ने यह कार्य क्यों नहीं किया? साहित्य के इतिहास की एक लंबी धारा इस ओर सूनी दिखाई पड़ती है।

प्रेमचंद को पहला प्रगतिशील लेखक घोषित करते हुए नामवर कहते हैं कि 1930 में प्रेमचंद ने एलान कर दिया था कि वह स्वराज के लिए लिख रहे हैं स्वराज अर्थात सामाजिक स्वाधीनता। सामाजिक स्वाधीनता से तात्पर्य साम्राज्यवाद जातिवाद छुआछूत से मुक्ति और स्त्रियों की स्वाधीनता से  भी है। नामवर की दृष्टि में प्रेमचंद की सादगी और मामूलीपन प्रेमचंद की मौलिक विशेषता है इसी से वह भारत के मामूली आदमी  होरी और धनिया  को लाकर सादगी का नया सौंदर्यशास्त्र बनाते हैं। रचना की बनावट के केंद्र में जाना नामवर सिंह की विशेषता है। इसी कारण वह संपूर्ण रचना का सार एक वाक्य में दे देते हैं। जैसे रंगभूमि के संदर्भ मेंवह कहते हैं किरंगभूमि वस्तुतः साम्राज्यवाद और सामंतवाद की गठबंधन का सशक्त विरोध है यहां यह कहना असंगत ना होगा कि जो लोग रंगभूमि को सिर्फ गांधी का प्रभाव वह आदर्श का चश्मा लगाकर पढ़ते हैं उन्हें नामवर की दृष्टि को केंद्र में रखकर उपन्यास को पढ़ना चाहिए।

प्रेमचंद ने अपने साहित्य में जो प्रश्न खड़े किए हैं वह दलित,किसान,सामंती शोषण आदि के हैं। इन सभी बिंदुओं पर नामवर जी अपनी लेखनी चलाते हैं। कुछ सवाल भी खड़े करते हैं और कुछ निदान भी प्रस्तुत करते हैं। वह कहते हैं कि किसान की मुक्ति में भारत की मुक्ति है। यह बोध प्रेमचंद के संपूर्ण लेखन का सर्जनात्मक विकास है। नामवर जी प्रेमचंद की तुलना कबीर से करते हुए उनकी भारतीयता की कल्पना को पुष्ट करते हैं। भारतीय एवं पाश्चात्य चिंतन को ध्यान में रखकर प्रेमचंद की परख इस पुस्तक में की गई है। पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद जो आलोचक या पाठक व्याख्या के सूत्र ढूंढना चाहेंगे उन्हें निराशा हाथ लगेगी क्योंकि नामवर आलोचना में सूत्र नहीं गढ़ते हैं जिन्हें सामने रखकर लेखक की समीक्षा की जा सके बल्कि वह समीक्षा के फलक को शीशे की तरह साफ रखते हैं जिससे आर पार देखा जा सके।

प्रेमचंद पर विचार करते हुए भी वह यही करते हैं। वह उपन्यास का स्वरूप और भारतीय उपन्यास पर भी विवेचन करते हैं। वह कहते हैं कि एक विधा के रूप में उपन्यास की हमारी समझ औपनिवेशिक  दासता  में छटपटाते हुए किसान की जीवन गाथा से हुआ है। भारतीय उपन्यास को परिभाषित करने के मूल में एक तो वह किसान है, जिसे साहित्य में स्थान नहीं मिला था। वह पहली बार नायक बना और दूसरी ओर वह नारी है जो हाशिए पर थी, अब उपन्यास विधा में समस्त संवेदनाओं का केंद्र बन बनी। इन दोनों के साथ भारतीय उपन्यास ने स्वरूप प्राप्त किया। प्रेमचंद का स्थान इसलिए प्रथम और महत्वपूर्ण है कि इन दोनों को वह एक जगह ले आए।

प्रेमचंद के फुटकर निबंधों से कुछ विचार लेकर नामवर जी ने बड़ी कुशलता से अपनी और प्रेमचंद की विचारधारा को पुष्ट किया है। पूस की रात, कफन जैसी कहानियां विवेचन के क्रम में नहीं आए हैं जो प्रेमचंद की पहचान है। प्रेमचंद की आरंभिक कहानियों में  इकहरी अन्विति  से लेकर उत्तरोत्तर विकास हुआ है इसपर भी चर्चा नामवर जी ने की है। प्रेमचंद के अथक परिश्रम और भारतीय समाज में प्रेमचंद के योगदान को रेखांकित करने के लिए नामवर जी ने अनेक लेख लिखे हैं जिसे उनके बाद आशीष जी ने प्रेमचंद और भारतीय समाज नाम से प्रकाशित किया है। यह लेख प्रेमचंद पर लगे आक्षेप पर पुनर्विचार करने को भी बाध्य करते हैं। नामवर जी के यह लेख प्रेमचंद को समझने में सहयोग ही नहीं करते, बल्कि उन के संदर्भ में आलोचना के प्रतिमान को बदलने के साथ नए प्रतिमान भी बनाते हैं।

नामवर सिंह की यह विशेषता रही है कि एक भाव या तथ्य को लेकर वह तुलनात्मक अध्ययन करते हैं। यह तुलनात्मकता सिर्फ भाव की नहीं अपितु भारतीय और पाश्चात्य समीक्षा के तुलनात्मक संदर्भों के संकरे रास्तों से होते हुए पाठक के समक्ष स्पष्ट मार्ग खोलती है। ‘भारतीय समाज और प्रेमचंद’ में वह प्रेमचंद को कबीर और टॉलस्टॉय दोनों के सापेक्ष रख कर आलोचना करते हैं। कबीर के साथ प्रेमचंद को देखते हुए वह प्रेमचंद की यह काव्यात्मक पंक्ति बार बार रखते हैं —

हिया जरत रहत  दिन रैन
आम की डरिया कोयल बोले तनिक न आवत चैन

नामवर जी प्राचीन और वर्तमान साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बताते हैं की जब प्रेमचंद ने लिखना प्रारंभ किया था तब स्त्री विमर्श या दलित विमर्श का प्रचलन नहीं था फिर भी इन ज्वलंत मुद्दों पर प्रेमचंद का लेखन उनकी प्रगतिशील दृष्टि का परिचायक है। प्रेमचंद की सादगी और मामूलीपन नामवर की दृष्टि में प्रेमचंद की मौलिक विशेषता है और मेरा मानना है कि मामूलीपन और सादगी के साथ समालोचना करना  नामवर सिंह की विशेषता है।

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अनिता यादव

शिक्षा एम0 ए0, बी 0 एड0
प्रकाशन —- विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन कार्य
सम्प्रति — प्रधान अध्यापिका
पू0 मा0 वि 0 सारनाथ वाराणसी
संपर्क —- 9415370160

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