अरुण शीतांश की 3 कविताएं

अरुण शीतांश

जन्म  02.11.1972अरवल जिला के विष्णुपुरा गाँव में शिक्षा –एम ए ( भूगोल व हिन्दी)एम लिब सांईसएल एल बी पी एच डी कविता संग्रह  १. एक ऐसी दुनिया की तलाश में २. हर मिनट एक घटना है ३.पत्थरबाज़आलोचना४.शब्द साक्षी हैं सम्मान –           शिवपूजन सहाय सम्मानयुवा शिखर साहित्य सम्मान पत्रिकादेशज नामक पत्रिका का संपादन  संप्रति शिक्षण संस्थान में कार्यरत संपर्कमणि भवन संकट मोचन नगरआरा भोजपुर802301मो ० – 09431685589arunsheetansh@gmail.com  

  1. साइकिल

घर में  साइकिल है 

पहले दुकानदार ने रखा था

आज मेरे पास है 

पैसे वैसे की बात छोड़ दीजिए 

साइकिल है मेरे पास 

रोज़ साफ करता हूँ 

उस पर हाथ बराबर रखता हूँ 

सुबहोशाम निहारता हूँ 

साइकिल को धोता हूँ 

चलाता नहीं हूँ 

रोज़ उस पर स्कूल-बैग टंगा रहता था

बाजार से लौटती थी बेटी

तो घर लौट आता था जैसे

अब नहीं जाती

एक सब्जी भी लाने

टिफ़िन के रस नहीं लगते चक्के में 

वह चुपचाप खड़ी है 

उसे गाँव नहीं जाना

हवा – सी चलती

और उड़ती साइकिल 

हवा से ही बातें करती 

साइकिल की पिछली सीट पर एक कागज की खड़खड़ाहट सुनाई देती है

उसमें लिखा है- पापा !इस साइकिल को बचाकर रखना

किसी को देना नहीं। 

साइकिल को बारह बजे रात को भी देखता हूँ 

कल डभ सैम्पू से नहलाऊँगा

साइकिल कम बेटी ज्यादा याद आयेगी 

देखकर आया हूँ- आपके पास से।

थोड़ी देर हो चुकी है 

एक खिलौना को रखने में 

वह खिलौना नही जीवन है

जीवन की साइकिल है ..l

  1. शीशम का पेड़

यह पेड़ कितना हरा भरा है

पानी टपक रहा है पत्तों से 

इसकी जड़ें  तर हो रही हैं

बूंद – बूंद से

भीगे हुए पेड़

जंगल की तरह हैं

शीशम के छोटे-छोटे पौधे बड़े नाज नखरे से होते हैं

इनके बीज छिमियों की तरह छरहरे हैं

हर डाल पर झूलते लटकते रहतें हैं बाली की तरह

न जाने कितने कट गए

हत्यारों के

सोफे पर बैठने के लिए 

होटल में सजतें हैं दरबार इन्हीं के सहारे

किसान के लगाए पौधे

बड़े होने पर हजार-हजार बार काटे गए

लगाये जनता दरबार

शीशम ने  तमाम कठिनाइयों के बीच भी लंबा होना कम नहीं किया

छायादार

दमदार और

ताकतवर हुआ

शीशम का जीवन 

मनुष्य का जीवन है

हमारे हाथ ने कई बार लगाए पेड़

हमारे पॉव के अँगूठे से कई बार दबे बीज

फिर उगे

और झूमने लगे 

हम शीशम हैं

शीशम के पेड़…..

  1. नदी का पानी

कभी कभी अचानक लगातार आवाज आती है

चिड़ियों की जगह 

किसी विज्ञापन की

कभी पानी की गड़गड़ाहट की जगह

बाढ़ के हहास की

अपनों की जगह

खराब सपनों की

पत्तों की खरखराहट की जगह 

ट्रेन में खर्राटे की

धान की फसल के रंग की जगह

आंधी के

भूकंप के

धूसर रंग

प्रेम करते हुए कबूतरों की जगह

बूढ़े नेता के द्वारा बलात्कार

उस जगह की बहुत याद नहीं आती है

जहां बड़े-बड़े पोस्टर बैनर और चुनाव की  होती है घोषणा  

फोन की आवाज़ की जगह

मांगता है प्यार से पासवर्ड ए टी एम कार्ड का !!

हर रोज़ कोई धीमा नहीं बोलता 

कि रुलाई दे जाती है कोई स्त्री पडो़स की

अभी तो ठीक से

दाल रोटी चावल पर बात ही नहीं हुई

कि घर तोड़कर- छोड़कर पुल बनाने की

बात होने लगी

गांव में शहर की चलन है अब

कौआ और कोयल की बोली कहां है

थोड़ी सी लड़कियों की हंसी बची है

और आसमां का रंग 

हम खेत पटाने जा रहे हैं लाठी लेकर

आप मॉल में कैमरे निहाराते रहिए 

कोई मनुष्य एक दिन ईश्वर बन सकता है।

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