आशीष श्रीवास्तव की लघु कथा ‘तबीयत’

आशीष श्रीवास्तव

पिछले एक सप्ताह से राकेश कार्यालय आता और अपने कार्यालयीन सहयोगी नरेश को काम में सहयोग करने के लिए कहता, फिर बहुत-सा काम बताकर चला जाता। कहता : पिताजी की तबियत ठीक नहीं है उन्हें दिखाने जाना है, भाई संभाल ले।

नरेश  ने संवेदनशीलता और गंभीरता दिखाई और अपने कार्य के साथ-साथ राकेश का कार्य भी करने लगा। वह कई बार बहुत थक भी जाता। वह राकेश  से अपना काम किसी ओर से कराने को कहता, क्योंकि उसके अपने पास बहुत-सा काम रहता। लेकिन, राकेश भाई-भाई कहते हुए काम कराता रहा, वह कभी देर से कार्यालय आता, कभी जल्दी घर चला जाता। ये सिलसिला कई दिनों तक जारी रहा।

जब कुछ दिन यूं ही निकल गए और राकेश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो नरेश ने राकेश के काम को टालना शुरू कर  दिया। इसपर राकेश अकड़ गया और नरेश को खरी-खोटी सुना दीं। अगले दिन जब राकेश अपने पिताजी को उपचार के लिए अस्पताल लेकर पहुंचा तो वहां पहले से दवाई की दुकान पर नरेश को खड़ा देखकर आश्चर्य में पड़ गया। बोला : अरे ! तुम यहां, तुम्हें तो कार्यालय में होना चाहिए।

नरेश :  पिताजी तीन दिन से अस्पताल में भर्ती हैं!!!

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