Author: literaturepoint

4

गुंजन श्रीवास्तव की कविताएं

ऊँचे होने का नाटक आदमी पैसों को गिनता हुआ नहीं देखता कि इससे पहले ये क्षत्रीय के हाथों में थी या किसी शूद्र के! न ही वो पूछता है एक वेश्या से उसे भोगने से पहले उसकी जात! आदमी ऊँचे होने का नाटक करता है सभी के बीच तन्हाई में...

11

सचिन मनन की कहानी ‘मोमेंट’ (Moment)

सचिन मनन अब तक 30 से 40 कहानियां लिख चुके हैं लेकिन लिटरेचर प्वाइंट पर उनकी यह पहली कहानी प्रकाशित हो रही है। इस कहानी की खासियत इसका ट्रीटमेंट है। अपना संदेश पाठकों तक पहुंचाने के लिए सचिन ने दो कालखंडों को जिस तरह जोड़ा है, वह अद्भुत है। आप...

0

नए विषय, नए फलक, नई दृष्टि : कहानी की नई ज़मीन

‘उद्भावना’ के कहानी विशेषांक में स्त्री कथाकारों की प्रभावशाली मौजूदगी है। इस अंक में प्रकाशित स्त्री कथाकारों की कहानियों में नए विषय हैं, नई  दृष्टि है और नए फलक हैं। इन कहानियों  पर सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की टिप्पणी साहित्यिक पत्रिका ‘उद्भावना’ के हाल ही में प्रकाशित कहानी विशेषांक में आठ...

4

किसी एक पते की खोज में

डायरी के पन्नेसोनू यशराज गुम हुए एक दोस्त के लिए,जिसका पता भी गुम और चेहरा-मोहरा भी ! किसी एक पते की खोज में हर पते पर दस्तक देती हैं अपनी पूरी लहक के साथ हवाएं ! उड़ेल देती हैं हर मोड़ पर स्मृतियों की धुंध ..और धप से बैठ जाती...

0

ज़िन्दग़ी के बीच से निकली कहानियां

पुस्तक समीक्षा गोविंद सेन के कहानी संग्रह ‘दसवीं के भोंगाबाबा’ पर आशा पांडेय की टिप्पणी अच्छी कहानियां मेरे लिये गूँगे के गुड़ के समान होती हैं।मैं उन्हें जितना महसूस करती हूं उतना उनके बारे में कह नहीं पाती हूँ। कथाकार गोविंद सेन जी का दूसरा कहानी संग्रह”दसवीं के भोंगाबाबा’ को...

0

शहाब उद्दीन शाह की ग़ज़लें

एक किरदारों से बौने लोगछोटे औने  पौने ‌ लोग पैसा  रुत्बा रूप नशे केपागल और खिलौने लोग इन्सानों  में   शैत्वां  जैसे झूठे  और  घिनौने   लोग ख़ुश फहमी से फूले लोगख़ुद  से  गोल नमूने लोग चमचे ढक्कन पेंदी लोटाकरछी और भगौने लोग जगह जगह पर पीकदान सेमुंह से लार थुकौने लोग तन...

0

 मुंशी प्रेमचंद का समग्रता में आकलन

पुस्तक समीक्षा रंजन ज़ैदी की किताब ‘प्रेमचंद : अपार संभावनाओं के विस्मयकारी साहित्यकार’ पर शंभूनाथ शुक्ल की टिप्पणी हिंदी गद्य के नाम पर जो कुछ है, बस प्रेमचंद ही हैं। उनकी मृत्यु को 83 साल गुज़र चुके हैं पर लगता है, न प्रेमचंद के पहले हिंदी थी, न प्रेमचंद के...

0

रंजन ज़ैदी की ग़ज़लें

जो वक़्त था आख़िर बीत गया जो  वक़्त था आख़िर बीत गया, अब  उसकी  शिकायत कैसे करूँ ? है   चाँद    वही   सूरज भी  वही, तारों  की  अदावत कैसे करूँ? बच्चों   को   उठाये  कांधों  पर, इक   भीड़  हवा  के साथ चली, जो  अपने  ठिकाने  छोड़  आये   मैं  उनकी  इनायत  कैसे करूँ?...

0

सवाल बनकर पीछा करने वाली कहानी

क से कहानी में आज सुधा अरोड़ा की कहानी ‘एक मां का हलफनामा’ पर चर्चा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव बहुत कम कहानियां ऐसी होती हैं, जो बेचैन करती हैं, पीछा करती हैं। ‘एक मां का हलफनामा’ ऐसी ही एक कहानी है। छोटे कलेवर की बड़ी कहानी।  बेटी को गंवा चुकी एक...

4

देवेश पथ सरिया की कविताएं

पश्चाताप मैंने प्रेम किया जैसा साधक करते हैं अंकित किया तुम्हें हर पेड़ की हर पत्ती के हर रेशे में देखा तुम्हारा अक़्स बारिश की हर टपकती बूंद में तुम पर्णहरित थीं तुम जल का अणु हश्र मेरा हुआ वैसा जैसा हुआ करता है बाज़ार में आंखें मूंद धूनी रमाने...

2

पल्लवी मुखर्जी की कविताएं

विलुप्त होती स्त्रियाँ उसने जी लिया था अपने हिस्से का जीवन शायद… उसके पैरों के निशान पगडंडियों पर मिल जायेंगे तुम्हें उसके पंजों का छापा भी दीवार पर तुम्हें मिलेगा जिसे उसने पाथा था उपले थापते हुए बड़े प्रेम से बड़े जतन से बड़े  इत्मीनान से घर के फर्श को...

1

सरिता कुमारी की कहानी ‘चलो घर चलें’

वह आहत था। गहरे बहुत गहरे।  उसने कमरे के दरवाज़े पर पड़े ताले पर फिर से उचटती निगाह डाली। उसकी दयनीय स्थिति पर वह ताला मानो उसे मुँह चिढ़ा रहा था। उसने फिर से अपने स्मार्ट्फ़ोन के व्हाट्सएप मैसेज को नज़र भर कर देखा। मानो वह उन्हें पढ़ तो ले...

0

लेखन से क्या मिला? लिखने से क्या होगा?

लेखन से क्या मिला ? लिखने से क्या होगा? ऐसे सवाल अक्सर पूछे जाते हैं। इनके जवाब दे रहे हैं वरिष्ठ कथाकार और साहित्य की बहुचर्चित पत्रिका ‘निकट’ के संपादक कृष्ण बिहारी लिखने से क्या होगा?… आदि, ऐसे सवाल हैं जो कई-कई बार अपने साहित्यिक मित्रों से मुझे सुनने को...

0

एकजुट चूहे तोड़ सकते हैं बिल्ली की टांग

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव नंदीग्राम एक बार फिर चर्चा में है। चुनाव जीतने के लिए सभी सियासी दल नंदीग्राम के 14 साल पुराने उस ज़ख्म को कुरेदने की कोशिश कर रहे हैं, जिस ज़ख्म की कहानी मधु कांकरिया ने अपनी कहानी ‘नंदीग्राम के चूहे’ में लिखी है। इस कहानी...

0

आदित्य अभिनव की कहानी ‘सुंदरी’

अबुल हसन यों तो था पाँचवक्ती नमाजी लेकिन उसका उठना-बैठना हिंदुओं के साथ था। उसके रग-रग में भारतीय सभ्यता और संस्कृति रची-बसी थी। उसे अपनी सभ्यता-संकृति से बड़ा प्यार था। उसकी दृष्टि में भारतीय संस्कृति के चार आधार ‘गंगा,गीता, गायत्री और गौ’ किसी धर्म विशेष यानी केवल हिंदू धर्म, जिसे...

0

साधारण लोगों की असाधारण कहानी

नीरज नीर के कहानी संग्रह ‘ढुकनी एवं अन्य कहानियां’ पर कमलेश की टिप्पणी मैंने नीरज नीर की पहली कहानी हंस में पढ़ी थी- कोयला चोर। उससे पहले मैं उन्हें एक बेहतरीन कवि के रूप में जानता था। उनका कविता संग्रह ‘जंगल में पागल हाथी’ और ‘ढोल’ चर्चित हो चुका था...

0

हरियश राय की कहानी ‘भंवर में…’

रेखांकन : संदीप राशिनकर चाहता तो वह गूगल के जनक सरगै ब्रिन की तरह बनना जिसकी वजह से गूगल दुनिया भर में मशहूर हो गया और जिसकी वजह से क्लास का हर बच्चा ‘’गूगल करो’’ या  ‘’गूगल कर लेना’’ या ‘’गूगल में देख कर बताता हूं ‘’ कहता  रहता था...

2

संजय शांडिल्य की प्रेम कविताएं

लौटना जरूरी नहींकि लौटो यथार्थ की तरहस्वप्न की भी तरहतुम लौट सकती हो जीवन में जरूरी नहींकि पानी की तरह लौटोप्यास की भी तरहलौट सकती हो आत्मा में रोटी की तरह नहींतो भूख की तरहफूल की तरह नहींतो सुगंध की तरहलौट सकती हो और हाँ,जरूरी नहीं कि लौटनाकहीं से यहीं...

1

बोर्ड पर काली चॉक से मैं नहीं लिख सकता-मंटो

रंजन ज़ैदी मंटो-शताब्दी वर्ष बीत गया लेकिन उसके चर्चे अब भी महफ़िलों में जारी हैं क्योंकि वह एक जीवंत और संघर्षशील कहानीकार था। वह एशिया उप-महाद्वीप में उस समय जन्मा था जब हिन्दुस्तान अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था और देश पर अंग्रेज़ी साम्राज्य की हुकूमत थी। इसके बावजूद...

1

मीरा मेघमाला की कविताएँ

कैसे मर जायें झट से! ऐसे में गर मरने को कहा जाएतो कैसे मर जायें झट से! अंतिम दर्शन के लिएआये लोग हंसेंगे,झाड़ू-पोछा नहीं लगाया हैबर्तन, कपड़े नहीं धोये हैंसाफ़ नहीं कर पाई घर का शौचालयपेड़ पौधों को भी पानी नहीं दिया हैकुत्ता और बिल्ली भूखे बैठे हैंकल के नाश्ते...