राजा सिंह की कहानी ‘बिना मतलब’

      टेम्पो से उतरकर मैं बाज़ार के पास खड़ा हो गया. यहीं उतरना पड़ता है. सामने कोकाकोला की इमारत है.  उसी के बगल के चौराहे से जवाहर नगर है.  वहीं पर रामकृष्ण नगर है, जहाँ पर उनका मकान है. रिक्शा लेना पड़ेगा. अपना स्कूटर ख़राब है, मैंकेनिक के पास है.

      मैं कई बार आ चुका हूँ, मगर हर बार उनका घर ढूढने में दिक्कत आती है. रामकृष्ण नगर में कई गलियां है. किस गली में उनका मकान है हर बार भूल जाता हूँ. हर बार गली की पहचान बदल जाती है. फिर भी अंततः उनका मकान पा ही जाता हूँ.  

      किन्तु अबकी बार कुछ ज्यादा ही दिक्कत आ रही है. जिस मकान को मैं उनका मकान पहचानता था, वह खंडहर था. क्या वह इस मकान में नहीं रहते? फिर कहाँ ? यह वह मकान नहीं है. फिर कहाँ गया?  यहीं पर था. अगर यही है तो फिर वह कहाँ?  नहीं, यह नहीं हो सकता। मुझे उनका मकान कहीं और देखना चाहिए. मैं असमंजस में खड़ा रह गया. मैं भौंचक उस खंडहर का निरीक्षण कर रहा हूँ. इधर उधर ताक झांक भी रहा हूँ. किससे पूछतांछ करूँ?

      “शुक्ल जी से मिलना है? ” एक गुजरने वाले आदमी ने ठहर कर पूछा.

      “हाँ. . हाँ. ”मैं तुरंत बोल उठा. जैसे कोई लम्बे समय से खोई वस्तु अचानक मिल गयी हो.

      “यह बगल में जो पतली सी गली गई,  गली के समाप्त होते ही बायीं तरफ जीना लगा है. वह इसी मकान का है.

      “यह उन्हीं का मकान है? ”

      “निश्चय ही !” यह कहकर वह आगे बढ़ गया.

      थोड़ी देर तक मैं ताकता रह गया. अपने को यकीन दिलाता रहा. फिर आजमाने का फैसला किया. गली मुश्किल से तीन चार फीट की होगी और लम्बाई करीब १०० ग़ज की. मैं सोचता रहता और आगे बढ़ता रहा. गली की कुछ दूरी पर रेलवे लाइन दिखाई पड़ रही थी. कहीं गलत जगह पर तो नहीं जा रहा हूँ? उस खँडहर वाले मकान के पीछे, बाएं मुड़ने पर दस फीट की जगह में उस मकान का पीछे का हिस्सा दिखाई दिया. सामने जमीन में धंसी पटरियां थी जो वर्षों से बेकार पड़ी थी. शायद कभी किसी समय कोई मालगाड़ी गुजरा करती होगी किसी फैक्ट्री का सामान लाने ले जाने के लिए. उसके आस पास का हिस्सा खाली मैदान पड़ा था. और उससे दूर कुछ और मकानों की श्रृंखलाबद्ध कतारें. मैं संकोच और झिझक त्याग कर उस जीने पर बेधड़क चढ़ गया.

                वह मिल गए थे. वह वहीं बैठे थे, परन्तु दिख नहीं रहे थे.  शायद कोई आया है, यह सोचकर उठे थे. उनके बत्ती जलाते ही रोशनी की चकाचौध से मैं कुछ हकबका गया. वे मिचमिचाती आँखों से मुझे देखने लगे और फिर अपने पलंग पर विराजमान हो गए. शायद वैसे ही जैसे पहले बैठे होंगे.

      “आप अँधेरे में बैठे हैं? ” मैंने उनके पैर छूते हुए कहा.

      “बस रोशनी करने ही वाला था. ”

      मैं बेशर्म की तरह बगैर उनकी अनुमति के एक कुर्सी पर बैठ गया. मुझे मालूम था उन्हें मेरा आना अच्छा लगता है. परन्तु कभी उनके हाव-भाव से प्रगट नहीं हुआ. न कभी ‘इतने दिनों बाद आये हो’ इसका उलाहना दिया. वह मुझसे बोलते कम ताकते ज्यादा थे. पता नहीं क्या मेरे चेहरे पर लिखा रहता जिसे वह पढ़ नहीं पाते थे.

      इधर पीछे की तरफ मैं पहली बार आया था. स्कूल के दिनों से लेकर आज से पहले तक मैं सड़क की तरफ वाले पोर्शन में ही आता जाता रहा था. पीछे की तरफ दो कमरे बड़े से और किचेन बाथरूम आदि सब था जैसे किसी किरायेदार को देने के लिए बनवाया हो. यह मजबूत और पक्के थे. शायद पीछे का पोर्शन बाद में बनवाया हो या पहले से ही रहा हो, मेरी जानकारी में अब आया हो. मैं अनुमान लगाने में असमर्थ था.

      “खाने के बाद आप दवाइयां रेगुलर ले रहे है न ? ”

उन्होंने विरक्त निगाहों से मेरी ओर देखा. मैं सकपकाया जैसे कुछ गलत पूछ लिया हो. मेरा वाक्य वैसे के वैसे ही झूलता रहा. वे चुप थे. मैं बहुत कुछ पूछना चाहता था किन्तु शाम की उस एकांत जगह पर उनका मौन कुछ इतना निजी और व्यक्तिगत था कि कुछ भी पूछना निरर्थक जान पड़ा.

      वे अस्सी पार अपने में व्यस्त मनुष्य थे. सरकारी जूनियर हाईस्कूल के भूतपूर्व प्रध्यापक. मेरे बचपन के सहपाठी के पिता. वे बूढ़े थे कहना मुश्किल था. बुढ़ापा उम्र के साथ बड़ा होता है परन्तु उन्हें मैंने बचपन से ऐसा ही देखा था. एक बुजुर्ग आदमी का अकेलापन और उससे चिपटा हुआ दुःख.  दुःख की वजह से अकेलापन था या अकेलापन की वजह से दुख था. एक ऐसा अकेलापन जिसमे लोगों के साथ रहने की इच्छाएं दमित हो चुकी हो. वे बहुत चुप थे अपने में खोये हुए.

      मैं इधर उधर ताकने लगता हूँ. अपने मित्र के विषय में सोचने लगता हूँ जो कभी मेरे काफी नजदीक था. अब विगत कई वर्षो से मैं उससे नहीं मिला था. तिमाही-छमाही सीइटेल (अमेरिका) से फ़ोन आता. “पिताजी कैसे हैं ? ”आखरी बार कब गए थे? ”             

मैं अजीब से अपराध बोध से घिर जाता. महीनों महीनों हो जाते मैं भी कहाँ जा पाता?  शुरू के महीनों में जो ललक और ताजगी उनसे मिलने, देखने सुनने सुनाने को होती थी अब उसका लोप होने लगा था.  उनके चेहरे पर छाई व्यथा, थकान, मौन और ऊंब धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी और अपना आना असंगत लगने लगा था.  उदासी विषाद और मायूसी मुझे भी घेरने लगी थी.

      “तिमिर का फ़ोन आया था. ” उन्होंने एक प्रश्न उछाल दिया. वे समझते थे कि तिमिर का फ़ोन आने पर ही मैं यहाँ आता हूँ. अनायास मेरा ध्यान उनसे हटकर तिमिर की ओर भटक जाता है. एक घनी चुप्पी ने हमें घेर लिया. समुद्र की असीम अबाध गहनता की मानिंद रहस्यमय यह वाक्य हम दोनों के बीच तैरता ही रहता है. मैं कभी भी इसका उत्तर नहीं देता.

            वे बहुत घुमे नहीं है. पैसे और सेहत की लाचारी नहीं है तो भी कही नहीं जाते. कही भी जाने पर उनका मन नहीं लगता. जल्द ही मन उचाट हो जाता, और वापस अपने घोसले में आने को व्यग्र हो जाते. इसलिए कहीं भी जाने के नाम पर उनका जी घबराता था. अपनी माँ की मृत्यु पर तिमिर आया था और एक तरह से जबरदस्ती अपने साथ अमेरिका ले गया था, परन्तु वह एक हफ्ते भी नहीं रुके. यहाँ उनकी लेखकीय दुनिया थी. अलबत्ता पत्नी की मृत्यु के पश्चात शनै: शनै: वह शांत और ठण्डे पड़ते जा रहे थे. अब तो एकदम स्थिर.

      वे आलोचक थे. शुरू के दिनों में यह घर चहल पहल से भरा रहता था. साहित्यकारों का हुजूम उन्हें घेरे रहता था. उनका घर किताबों का भंडार था. वे अपना मौलिक बहुत कम लिख पाएँ. दरअसल उन्हें समीक्षाओं से ही फुर्सत नहीं मिलती थी. वे किसी लेखक को मना नहीं कर पाते. सेवा से निवर्तमान होने पर उनकी साहित्यिकता चरम पर थी. साहित्यिक गोष्ठियां, सम्मेलन, सेमिनार, विमोचन और लोकार्पण में उनकी उपस्थिति मायने रखती थी और उनके व्यक्त विचारों को बड़ी तल्लीनता से सुना जाता. लेखक बंधुओं में उन्हें अपने साथ ले जाने की होड़ मची रहती. उनकी पत्नी की बीमारी से सब कुछ धीरे धीरे थम गया. वे देखभाल और कुछ उनसे उपजी व्यस्तता, मानसिकता को सम्हालने में लग गए और लेखक और लेखक संगठन ने उनसे किनारा करना शुरू कर दिया. अंततः वे पूरी तरह अलग थलग पड़ गए.

अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने आलोचना की एक किताब लिखनी शुरू ही की थी कि घिर गए अपनी इच्छा अनिच्छा और डॉक्टर की हिदायत के चक्रव्यूह में.  उपेक्षा,  अकेलेपन,  षड्यंत्रों को झेलना और फिर लिखते रहना सबके बस की बात नहीं है. पुनः समीक्षा, आलोचना  आजकल प्रशंसा में तब्दील हो गयी थी.  उन दिनों वह असमंजस में फंसे रहते कि क्या करें, क्या न करें? अंततः डॉक्टर की सलाह भारी पड़ी और उन्होंने लिखने का विचार त्याग दिया. अपने लिखे का संकलन संग्रह का छपवाने का विचार कई दिनों. हफ़्तों छाया रहा. कई प्रकाशकों से बात की. अधिकांश ने उनसे भारी भरकम राशि की मांग कर दी जो उनके तीन चार मासिक पेंशन के बराबर थी.  अपनी जमा पूंजी वह अपनी पत्नी की बीमारी में खर्च कर चुके थे. बेटे से किसी भी तरह की सहायता लेना उन्हें नागवार था. इस प्रयास को भी तिलांजलि देनी पड़ी.  नतीजा यह हुआ कि साहित्य से नाता सिर्फ एक आध साहित्यिक पत्रिका जो यदा कदा आ जाया करती थी, कभी आलोचना नामक पत्रिका खरीदकर,  या अपनी धरोहर की देखभाल में सिमट गयी थी. . शायद साहित्य से भी दिलचस्पी समाप्त प्रायः थी. क्योंकि कई दफा से मैंने उनके पास कोई साहित्यिक किताब नहीं देखी थी.    वह बाहर जाने लगे तो मैंने कहा,  “कहाँ ? ”

      “ पांच मिनट में आता हूँ. ”

      “जल्दी आइयेगा , मुझे जल्दी जाना है. ”

      “अच्छा ? ” उन्होंने मेरी तरफ देखकर कहा.

वे जानते थे कि मैं जल्दी जाने वाला नहीं हूँ. मुझे मालूम था कि वह मेरे लिए कुछ लेने गये हैं. मैं मना नहीं कर सकता था. मुझे खाते खिलाते देखना उनमें एक अनकही तृप्ति भर देता था, जिसे मैं उनसे छीनने में अपने को असमर्थ पाता था. मेरे खाते समय वह एकटक मुझे निहारा करते. मेरी नज़र पड़ते ही वह कहीं और देखने की कोशिश करते. किन्तु यह अहसास मुझे सदैव हैरत में डाल देता था की कि इस सीमित दायरे में अपने को कैद कर लेने के वावजूद उनकी अपनी जिजीविषा मरी नहीं थी. उनके कमरे से बाहर जाते ही मैं अनुमान लगाने लगता की आज वह कौन सी चीज लायेंगे?  ज्यादातर बार वह चीज कुछ अलग सी होती. मैं हैरान रह जाता कि वह मुझे पसंद आ जाती. कैसे भी हो कहीं न कहीं से वह मेरे मन दिमाग और इच्छा के तार पकड़ लेते थे. उनकी यह ललक मेरे लिए अक्सर उत्प्रेरक का कार्य करती थी.

कुछ देर के लिए मैं खड़ा हो गया. मैं चाहता था मैं छज्जे में खड़ा होकर उन्हें जाते हुए देखूं. जब तक मैं छज्जे तक आया वह तेज तेज कदमों से आँखों से ओझल हो चुके थे. यही चीज मुझे हैरत में डाल देती थी कि वह मेरी वजह से तेज चलते है या उनकी स्वाभाविक चाल है? जिस तरह से वह इस घर में रहते थे पता लगाना असंभव था कि वह इतने सक्रिय हैं.

मैं उनके खाली कमरे में लौट आया था परन्तु ऐसा क्यों लग रहा था कि वे यहीं कहीं हैं. उस कमरे में छाई उनकी गंध और उनका समान सब कुछ उनको जीवंत किये था. वह इसी कमरे में रहते थे, दिन रात चौबीसों घंटे. क्या कुछ देर के लिए भी बाहर जाते हैं? जाते जरुर होंगे जैसे अभी गए थे. बाहर टहलने या छत पर बिचरने? कभी पूछा नहीं, पूछता तो भी जवाब नहीं मिलता. सिर्फ निस्पृह निसंग भाव से देखने लग जाते और मैं झेप जाता ऐसे अपने किसी निरर्थक प्रश्नों से.

      मैं दूसरे कमरे में चला आया. वह कमरा खोलते ही सीलन और बदबू के एक भभके ने मेरे ऊपर हमला कर दिया और उससे मैं बुरी तरह विक्षुब्ध हो गया. एक बार मन में आया कि लौट चला जाये, परन्तु कुछ और जानने की उत्सुक्तता ने हौसला दिया. मुझे लगता है इस कमरे में कामवाली को भी नहीं जाने देते होंगे सफाई आदि के लिए. इस कमरे लकड़ी की सीसे के फ्रेम वाली सिर्फ तीन अलमारियां थी. मैं निरीक्षण के लिए पास तक गया. अलमारियां गर्द और गुबार से अटी पड़ी थी. साथ में एक टेबल और चेयर भी थी अपने पर रखे हुए टेबल लैंप के साथ. मैंने अनुमान लगाया शायद यहीं बैठ कर वह कभी अपनी लिखा पढ़ी करते होंगे. मैंने वहीं पड़े एक गंदे से कपड़े से अलमारियों के सीसे साफ़ करने की कोशिश की तो कुछ कुछ देखने के काबिल हुआ. एक अलमारी में उनके द्वारा रचित प्रकाशित एक दो किताबें और बाकी पत्रिकाएं थी। संभवतः वे पत्रिकाएं जिनमें उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई होंगी. दूसरे में उनके पास आई समीक्षार्थ पुस्तकों का अम्बार था, बेतरतीब एक दुसरे से ठुसी, घुसी और अटी पड़ी. किसी तरह अपने लिए जगह बनाती. तीसरी अलमारी कायदे करीने से लगी थी। यह आलमारी प्रसिद्ध लेखकों कवियों और आलोचकों की किताबों की थी, जो शायद वह अपने सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप और कभी अपने गंभीर अध्ययन हेतु लायी गयी होंगी.

इस कमरे में ज्यादा देर रुका नहीं जा सकता था. मैं छीकने, खांसने लगा था और कुछ धूल भी मुझसे लपट गयी थी. उसे वापस वैसे ही बंद करके मैं अपनी लिपटी धूल झाड़ पोछ कर पुनः व्यवस्थित होकर वापस लौट आया. उसी कमरे में जहाँ सुबह का अखबार बुरी तरह अस्तव्यस्त ढंग से पड़ा था. लगता पढ़ा कम खीजा ज्यादा गया है. टेबल पर पानी का जग और गिलास रखे थे. उसी एक किनारे पर कई तरह की बोतलें,  दवाइयों की शीशियाँ और टेबलेट्स और जमीन पर रेपर पड़े थे. ज्यादातर मेडिसिन होमोपैथी और आयुर्वेदिक की थी कुछ अंग्रेजी मेडिसिन भी दिखाई पड़ रही थी.

एक बार मैं उनके साथ उस डॉक्टर के पास चला गया, जिससे वह अक्सर इलाज करवाया करते थे, उनका वास्तविक हाल-चाल और बीमारी पता करने.  

 “आप! चिंता न करें . . . इन्हें वास्तव में कोई खास बीमारी नहीं है. इस उम्र में ऐसा ही होता है. सिर्फ अकेलापन है और यदि यह बीमारी है तो यही है. डॉक्टर ने सांत्वना देते कहा था,  “हो सके तो इनका अकेलापन दूर करने का प्रयत्न करें.

एक बार मैंने उन्हें अपने साथ रहने की दावत दी थी. हालंकि आंधे-अधूरे मन से. मेरे बहुत कुरेदने पर भी उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. उन्हें किसी से दिलचस्पी नहीं थी, समय समाज घर परिवार या आसपास की जिंदगी से. मुझे लगता था उनकी अपने आप के प्रति भी दिलचस्पी समाप्त हो चुकी थी. मैं उन्हें समझाने, समझने की बेहद कोशिश करता रहता परन्तु वह उतने ही अनभिग्य और मैं अनभिग्य होता जाता .

वे वापस आ गए थे और मैं अभी तक खड़ा होकर जासूसी निगाह से अवलोकन कर रहा था, कि उनके स्वास्थ के विषय में कुछ जान सकूँ. उनके आते ही मैं सकपकाकर कुर्सी पर बैठा गया. उनकी प्रश्नवाचक निगाहों का सामना करना दुष्कर होता है.

“लीजिये भोग लगाइए. ” उन्होंने एक बड़ी प्लास्टिक की प्लेट पर सारा भोज्य रखते हुए कहा. खुद किचेन से मेरे लिए एक गिलास पानी लाने चले गए. सब चीजें गरम थी, समोसा, खस्ता और इमरती. उन्हें शायद पता था कि मैं गरम चीजें ही पसंद करता हूँ.

“आप भी लीजिये ? ” जिसे उन्होंने नजरंदाज कर दिया और एकटक मेरी ओर दत्त-चित्त ताकने लगे. वे चौकन्ने और सतर्क थे कि सब कुछ मैं ही समाप्त करूँ. कभी उन्होंने बताया था की उच्च रक्तचाप की वजह से नमकीन ज्यादा नहीं और सुगर की वजह से मीठा नहीं खा सकते. सब कुछ फीका था स्वाद उनकी जिंदगी की तरह. मगर कभी उन्हें जिंदगी से कोई शिकवा, शिकायत करते नहीं देखा.

उनका ध्यान तभी टूटता जब मैं भोज्य समाप्त कर पानी पी रहा होता.  “अब! आप जाइए ” कुछ अपराधी भाव से देखते हुए कहते.

‘ नहीं. . .  मुझे अभी जल्दी नहीं है. मैं उनका मन रखने के लिए कहता. . . . किन्तु मैं ज्यादा देर रुकता नहीं था. कभी कभी मुझे लगता मैं उन्हें देखने की औपचारिकता निभाते निभाते उनमें खो गया हूँ, उनमें उलझ गया हूँ और उन्हें छोड़कर आने का मन नहीं करता. उनका मन लगाने की कोशिश करता. मैं जो कहता वे बड़ी उत्सुक्तता से सुनते और बड़ी तत्परता से टाल देते.

एकाएक वह उठे और वही पास में रखी दो किताबें मुझे दिखने लगे-होम्योपैथी चिकित्सा और आयुर्वैदिक उपचार. मैं उसे उलट पुलट कर देखने लगा. मेरी कोई दिलचस्पी न देखकर उन्होंने पूछा.

“ठीक. . है. !”उन्होंने कुछ दबे स्वर में पूछा.

‘आप स्वयं चिकत्सा करते हैं? ” मेरे स्वर में गहरा विस्मय था.

“नहीं ऐसे ही. . ” कभी कभार. . शायद तुम्हें पता नहीं , यह हम जैसों के लिए काफी मुफीद रहती है.

“यह ठीक नहीं है. ” मैंने कुछ सोचते हुए हलके से कहा. उन्हें कुछ निराशा हुई. उन्होंने अपनी आंखें फेरकर उस दीवार पर स्थिर कर दी जहाँ पर उनकी पत्नी की फोटो लटकी थी. फोटो साफ़ सुथरी और बिगैर किसी किसी धूल के गंभीर मुद्रा में वेसे के वैसे ही स्थिर थी. वह कभी कभी घर की चीजों को ऐसे देखते जैसे पहले कभी न देखा हो या शायद कई वर्षो के बाद देखा हो. उनके लिए शायद वह तस्वीर वैसे ही पड़ती हो जैसे बेड, मेज, कुर्सी तिपाई या अन्य कुछ भी. हालाँकि यह पहले रोड वाले बेडरूम में तिपाई पर रखी रहती थी सुंदर शीशे और सुनहरे फ्रेम में जड़ी. वहां मैं कई बार जाने अनजाने उसकी तारीफ कर चुका था. पता नहीं क्यों उस समय वह सजीव लगती थी,  आज निर्जीव और निस्पंद है.  

“आपकी वह ढेर सारी सहित्यिक किताबे कहाँ गईं?  क्या वह सब मलवे में दब गयी? ”

“ नहीं कुछ बच गयी है. उन्हें पास वाले कमरें में रख दिया है, जहाँ मेरी व्यक्तिगत किताबें थी. वहीँ मैं लिखता पढ़ता था. ” कहकर वह मुस्कराएँ.

उनकी मुस्कराहट गहरी थी. जब उनका रोड साइड वाला पोर्शन था, उस समय उनके पास किताबों की छोटी मोटी लाइब्रेरी थी. उनके सहित्यिक मित्रों और शिष्यों ने उसकी अधिकांश किताबें साफ़ कर दी. कुछ ने लौटने का वादा करके कुछ ने अब आप क्या करेंगे कहकर. वे किसी को मना नहीं कर पाये. ये कुछ भी न बच पाती यदि वह हिस्सा गिर न पड़ता. अब वे इन किताबों की भनक भी न लगने देंगे, ऐसा उन्होंने मुझे आश्वस्त किया.

“ आप ले जाना चाहोगे ? ” उन्होंने पूछा.

“ मेरे किस काम की? . . . . . .  बिना मतलब. !”

वह नीरव आँखों से ताकने लगे. वह अच्छी तरह जानते थे कि मैं उनके बेटे की तरह साइंटिस्ट और उसी तरह की नौकरी में भी संलग्न हूँ. मेरी हिंदी साहित्य के प्रति रत्ती भर भी रूचि नहीं है. फिर वह अजीब ढंग से मुस्कराए.

उनका अब शायद ही कोई मित्र, रिश्तेदार बचा हो. इस शहर में उनके कुछ कम नहीं तो सैकड़ो जान पहचान के साहित्यिक मित्र भी थे, परन्तु अब कोई हालचाल लेने भी नहीं आता. उनके लिए कोई बुलावा नहीं आता. पहले तो कुछ वे आ जाते थे जिन्हें कुछ साहित्यिक मदद की जरुरत होती, जब उनका रोड साइड वाला हिस्सा नहीं गिरा था. उन्हें भी अब कोई उत्सुकता, चाहत नहीं थी कि कोई उनसे मिले या वे किसी से मिलें.

तिमिर उन्हें कभी कभार चिट्ठी भेजता था, जिसका वे कभी जवाब नहीं देते थे. उन्होंने लैंडलाइन कटवा दिया था और मोबाइल कभी लिया ही नहीं. वह उससे भीतर ही भीतर नाखुश थे. जिसे उन्होंने कभी प्रगट नहीं किया. उसने वहां किसी अमेरिकन से शादी कर ली थी और उसने उन्हें बताने की जहमत भी नहीं उठाई. एक बार अच्छा खासा समय बिता कर अपनी पत्नी के साथ आया था. माँ ने जरुर हौस और हुलस से स्वागत किया था परन्तु उनकी प्रतिकिया निहायत ठंडी और निरुत्साहित करने वाली थी. मेरे दोस्त ने मेरा ध्यान इस ओर आकर्षित किया था . परन्तु मैं उन दोनों के बीच कोई गर्माहट पैदा नहीं कर पाया था. माँ के मरने पर तिमिर अकेला ही आया था और उन्हें अपने साथ ले गया था. वह उसके साथ अमेरिका चले गए थे शायद अपने वंश की वृद्धि को देखने की ललक उन्हें वहाँ ले गयी थी. वह जल्दी ही लौट आये थे. उसके बाद तिमिर उन्हें कभी लेने नहीं आया. उन्हें कई बुलावे दिये आने के. परन्तु वे कभी नहीं गए. मुझे अच्छी तरह याद है कि उसने मुझे भी कभी वहां आने को नहीं कहा. उन्हें साथ लाने को भी नहीं कहा. उन्हें कभी कोई जल्दी नहीं रहती. सारे कार्य बड़े संतुलित और स्थिर ढंग से करते.  पानी पीना भी एक कार्य की तरह करते जैसे एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित कर रहे हो. जब वह पानी पीने लगे तो मैंने पूछा,  “क्या तिमिर की कोई चिट्ठी आयी है? ”

“हाँ, . . एक आयी है. ” वह एक क्षण रुके जैसे चिट्ठी के साथ उन्हें कुछ याद आया हो. .

“इस बार एक वर्ष बाद आयी है. इस वर्ष भी वह नहीं आ सकेगा. इसी बात की चिट्ठी ये है. ” फिर उन्हें एक विद्रूप हंसी ने ढंक लिया.

“आप ही कुछ दिनों के लिए क्यों नहीं चले जाते? ”

“कभी जाऊंगा. . जाऊंगा जरुर!. . देखो कब जाना होता है? ”उन्होंने मुझे दिलासा दिया.  यह दिलासा मेरे लिए था या स्वयं खुद के लिए, मैं अनुमान नहीं लगा पाया.

‘उसने तो आपको कई बार बुलाया है. ” मैंने जिद की.

“अभी. . नहीं. . . गर्मियों में जाऊंगा. ” मैं जानता था कि वह अक्सर ऐसे ही टाल जाते है. उन्हें तिमिर से मिलने की कलप जरुर थी परन्तु वहाँ जाकर नहीं. उससे मिलाने की आस वह सख्ती से दबा दिया करते. वह मुस्कराते. यह मुस्कराहट काफी अजीब होती.  शायद दर्द भरी. . उस ठेस भरे दर्द को भेदना मेरे लिए असंभव होता.

स्मृति के पटल पर उन्हें देखना वर्षों पीछे ढकेल देता है, परन्तु चाहकर भी मैं उना हँसता खिलखिलाता चेहरा पकड़ने में खुद को असमर्थ पाता था. सदैव यही चेहरा दिखाई देता था अटल,  तल्लीन,  खोया हुआ,  विषाद युक्त,  कुछ अपने अंदर और कुछ बाहर खोजता हुआ. उनकी अपनी पीड़ा तकलीफ और ढलती उम्र को ढोती हुई अपने को विश्लेषित करती भाव भंगिमा से युक्त अपठनीय चेहरा.  साहित्यकार मूलतः अन्यों की तरह ही सामान्य प्राणी ही होता है लेकिन जब वह रचनाकार के रूप में प्रवृत होता है वह असामान्य हो जाता है. यह असामान्यता जब वह रचनाकर्म छोड़ भी देता है तब भी उसका पीछा नहीं छोड़ती है.  वह जिस दुनिया में थे वहां धोखे ने इतनी जगह घेर रखी थी कि सच के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची थी. सिर्फ भ्रम में जीते थे. और फिर वह  मन मस्तिष्क और आत्मा को झाड़पोंछ कर स्पन्दनहीन कर देने वाला वाकया-उनकी बेहद बीमार पत्नी और अपने तिमिर को ढूंढ़ती,  तलाशती,  बेचैन,  प्रतीक्षारत आँखें जब धीरे धीरे बुझ गयी तो उनके भीतर का भी सब कुछ ढह गया. . . तिमिर की अनुपस्थिति का आतंक भर गया जो उनके आवेश और आक्रोश को लील गया और उनमें भर गया था बर्फ सा गीला, चिपचिपा और सिहरा देने वाला ठंडापन.

बीच में कई हफ्ते निकल जाते वह अपने घर में कैद और मैं अपने घर परिवार और ऑफिस की दिनचर्या में अस्तव्यस्त रहता. फिर भी लगता नहीं था कि उनसे खाली दिन थे. हर समय उनकी स्थिति,  परस्थिति और अकेलापन मुझे हांट करता रहता. समय गुजरता रहता परन्तु उनकी दुनिया थमी रहती. मैं चाहकर भी उनसे बेखबर नहीं हो पाता. अक्सर एकांत में या फिर रात में उनकी पीड़ा मेरा पीछा किया करती और इनसे बचने के लिए किसी न किसी हल की तलाश में मैं बेचैन व्यग्र बेसब्र और व्यथित रहता. अपने जान पहचान के कई मित्र आते। उनसे दबे स्वर में मैं उनकी समस्या का जिक्र करता परन्तु वे चुप रहते या फुसफुसाते हुए सतही हल बताते जो मुझे अपमानजनक लगता.  किसी भी तरह के उचित और संतोषजनक हल की तलाश में मेरी चुप्पी और प्रगाढ़ हो जाती. मेरा संशय बढ़ता जाता कि क्या मैं उन्हें ख़ुशी की, सुख की एक लकीर भी मुहैया करवा पाउंगा?  उनकी अच्छी खासी लम्बी जिंदगी गुजर चुकी थी और उम्र के इस आखरी पड़ाव में क्या कुछ ऐसा हो सकता है जो कि उनमें अपनी जिंदगी के कुछ महत्वपूर्ण लमहों को समेटकर या उसका कोई अंश उनके अपने होने की सार्थकता का अहसास करा सके.

हमारी अपनी परेशानियां थी. किसी भी अधिकार के तहत मैं उन्हें किसी बात के लिए राजी नहीं कर सकता था. उनका स्वत्रंत अस्तित्व था और वह मेरे पर किसी तरह आश्रित नहीं थे. तसल्ली इसी बात की रहती थी कि वे कभी मुझसे खफा नहीं हुए या हुए भी होंगे तो प्रगट नहीं हो पाया होगा. वह सदैव शांत रहते कभी। उन्होंने किसी बात की शिकवा शिकायत नहीं की. . . . कही ऐसा तो नहीं खाली रहने से उनका मन उकता गया हो . . . एकाकीपन का बोझ काफी हो गया हो. . . . . कोई काम शुरू कर दें. . . काम इस उम्र में. . ? . . . नहीं. . अब नहीं. . कोई संगी साथी. . . ? इस उम्र में. . ? . . . उम्र के डर से तो कई साल निकल गए. . . नहीं यह बेवकूफी होगी. . ? वे हँसेगे. . बिगड़ भी सकते है. . ? उनके मन का काम ? . . . हाँ. . . लेखन शुरू कर सकते है. . ? नहीं वह छोड़े तो उन्हें वर्षों बीत गए. . . लिखना तो दूर की बात अब पढ़ना भी काफी कम हो गया है. . किताबें, अख़बार, टी. वी, रेडियो, सब के सब खाली है. लगता है रोज इन्हें भी प्रयोग में नहीं लाते. खाली घर,  रीते दिन,  खाली रातें. न कोई देखने वाला न कोई सुनने सुनाने वाला. . ? इसी तरह रोज पड़े रहते होंगे. .? कभी कुछ कहते नहीं! मुझे लगता उन्हें स्वर में कोई दबी शिकायत रहती परन्तु कभी जाहिर नहीं होने दिया. . इन्हें अकेला छोड़ना ठीक नहीं. . कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा. . !. . क्या. . ? . . . ऐसे कब तक चलेगा. ? . . कही अपने आप को कुछ कर न लें. . ?  मैं लगातार ऐसे प्रश्नों से उलझता रहता था जो कदाचित उत्तरित हो सकते थे पर उन्हें उठाने से डर लगता कि वे बिगड़ न जाएँ. . ! और मेरा आना प्रतिबंधित न कर दें. ? . . फिर भी देखते है. . ?

      अचानक मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ! अभी अभी ऑफिस में साइंस जर्नल  पत्रिका को देने प्रकाशक आया था. . . कुछ अप्रत्याशित सा कौंधा!. मैं जल्दी से उठा.  जल्दी जल्दी लम्बे लम्बे डग भरता कई चैंबरों  में उसे ढूंढता हुआ आधा सर्किल घूम आया. बिल्डिंग से बाहर निकलते हुए परिसर के गेट की तरफ वह जाता दिख गया. मैंने दौड़कर उसे गेट पार करने से पहले ही पकड़ लिया.  

“ भाटिया जी. . जी. . ई. . ! . . एक काम है. ? ” वह उत्सुक्तावश मेरी तरफ देखने लगा. मैं हिचकिचा रहा था कि यही अभी कह दें या कुछ रूककर कहें या कहीं और कहें?

“चलिए. . आपके चैम्बर में ही बात करते हैं.” उसने मेरी बेचैनी और हड़बड़ाहट को विराम दिया. मैंने अपने को शांत किया. उसके चेहरे पर अधीरता तैरने लगी थी. मैंने कभी उसे कोई काम नहीं बताया था इस कारण भी वह काफी व्यग्र था कि आज ऐसा क्या है?  मैंने भाटिया जी को बाबू जी के विषय में विस्तृत रूप से बात की. उसने ऊबाऊ और बोझिल ढंग से मेरी बात सुनी. यह मेहरबानी की कि वह मेरी बात के बीच में कुछ नहीं बोले. मुझे आशा बंधी.

“ मैं उन्हें नहीं जानता. यह मेरा फील्ड भी नहीं है. हिंदी. . और फिर हिंदी साहित्य. . ? ” एक लम्बी चुप्पी. कुछ सोचने की गंभीर मुद्रा में लगे. कुछ चिंता की गहन लकीरें उन पर आमद हुई. फिर वह बोले. -“मैं आपके खातिर निश्चित घाटा,  खतरा उठाने को तैयार हूँ यदि आप जिम्मेदारी ले. . यदि आप कहें. ?

“क्या मतलब. ? ”

“ मैं यह काम आपका काम समझ कर करूँगा. ” उन्होंने एक बहुत बड़े अहसान के बोझ की गठरी मेरे उपर लाद दी. एक अजीब तरह का बिना मतलब का गुस्सा मेरे भीतर पनपने लगा था.  गुस्से को जब्त करना ही था. जिसे मैंने यत्नपूर्वक रोका.

“ ठीक है!” हलकी मुस्कराहट से उनकी बात से सहमति व्यक्त की. उन्होंने मैंगजींस के उन पृष्ठों को फाड़कर लाने के निर्देश दिए जिन पर उनके लेख और समीक्षाएं आदि छपी थी. मेरा मन बुझ गया. .  यह कैसे होगा. . ? . .  बाबूजी अनुमति देगें? . .  बाबू जी मान जायेगें?

            वे घुटनों के बल उकड़ू बैठे थे. चुप,  निश्चल, एकदम निश्चल, जरा भी हिल नहीं रहे थे. मैं जब पंहुचा, रुक गया, कुछ बेहतर भंगिमा की तलाश करता रहा. वह शाम का समय था. सिर्फ अधेरा था. चीजों को देखने भर की उजास. मुझे देखकर वह झटके से उठे और शीघ्र पलंग पर बैठ गये. उन्हें मेरे इस तरह छुट्टी वाले दिनों के बगैर आने की उम्मीद नहीं थी.

मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा था. क्या वह मैं सब कह पायूँगा?  उनकी धरोहरित पत्रिकओं से उनके अजीज लेखों की मांग?  मैं खड़ा हुआ था, गरदन नीचे किये. कमरे की दलहीज पर. इस तरह से जैसे किसी को पता है वह अपराध करने जा रहा है फिर भी उसकी मज़बूरी है यह करने की. मैंने जी कड़ा किया और बिना किसी भूमिका के मैंने उन पत्रिकाओं को सौपने को कहा.

“क्या करोगे? ” एक मरती सी आवाज में बोले. उनका दिल बैठने लगा था.

“आप ही ने एक बार कहा था. ” उन्हें पुराना कहा याद आ गया था.

“फिर भी. . . ? ” वे बुझ से गए. उन्हें असहज वचनवध्यता के लिए विवश किया जा रहा था. वे असहमति की संभावनाएं तलाश रहे थे. चूँकि वापसी की वचनबध्यता के आश्वस्ति के बिना विचारहीन अनुमोदन उसके अस्तित्व को खतरे में डाल देता. पूर्णतः असहमति मेरे प्रति अनादर होगा. वे पशोपेश में थे. उनके इंकार के पहले ही मैंने सहमति आवाज़ में अपनी मंशा प्रगट की और अपनी बात को विस्तार देते हुए अपनी जिम्मेदारी और वचनवध्यता की पुष्टि की.

“ क्या फ़ायदा. . ? ” उन्होंने लापरवाही से कहा. यह उनकी मेरे प्रति पूर्व निर्धारित कल्पनाओं में सही नहीं बैठता था. मेरा अवमानना करने का कोई इरादा नहीं था. उन्होंने स्पष्ट इनकार नहीं किया था परन्तु इस समय वह पत्थर बन गए थे. साँस लेता हुआ बुत. मैं जिद में था और उन्ही पर अपनी दृष्टि केन्द्रित किये, उनकी भंगिमा निहार रहा था.

बुत में हरकत हुई. दो तीन बार में वह सारी की सारी मैगज़ीन ले आये थे, धूल धक्कड़ से अटी पड़ी. वे खांस रहे थे. हांफ रहे थे.  अपनी सांसों को सयंमित करने की असफल कोशिश करते हुए. मैं स्वार्थी, अविवेकी और निर्दयी बना बैठा रहा. इसी बीच मैंने तीन सौ पालीथीन पृष्ठों की एक फाइल निकाल कर अपने हांथों में ले ली थी. उसे देखते ही वह सदमे में आ गए.

“यह क्यों. . . . . ?  जीरोक्स ठीक रहती. . ?  वह उखड़ने लगे थे परन्तु कुछ बोले नहीं. सिर्फ मेरी तरफ विभ्रांत नज़रों से देखते रहे.

“आपके लेख को छोड़कर बाकी सब निरर्थक हैं. ” मेरा यह कहना उन्हें भीतर तक छील गया. यह उनके लिए असहनीय था. वह रुआँसे हो आएं.  उदासी और विषाद से घिर गए. उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि मैं ऐसा भी बोल सकता हूँ. यह उनकी मेरे प्रति स्थापित धारणाओं से अलग था. मैं पश्चाताप में डूब गया. उन्होंने मुझे कुछ कहने और सुनने का कोई और मौका नहीं दिया. वे पार्थक्यभाव से पत्रिकाओं से अपने लेख,  क्रमसूची और मुखपृष्ठ फाड़ फाड़ कर उत्तप्त आक्रोश में देने लगें. मैं उत्कट, उद्धत तीनों को समेटता फाइल में पिरोता गया. प्रत्येक पृष्ठ को फाड़ते हुए व्यथित गुमसुम और टूट टूट कर बिखरते लगे. जैसे अपनी जिंदगी के पन्ने फाड़ रहे हो.

कार्य समाप्ति पर वह मुझसे काफी नाखुश और नाराज़ दिखे. मैं आश्वस्त था कि मैं उचित कर रहा हूँ.  संभवतः बाद में वह संतुष्ट होंगे. सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा. लेकिन इस तरह से उनकी प्रछन्न वचनबध्यता को फांसना विस्मयकारी और नितांत अवसादकारी था जिसका मुझे भी मलाल था. परन्तु निश्चय ही यह कपटपूर्ण नहीं था. उनकी चिरस्थिति में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं हुआ था. वह पूर्ण रूप से सचेत थे कि मेरी मांग कहीं से भी अनुचित, घृणित, कपटी और अनैतिक नहीं थी. सिर्फ और सिर्फ उन्हें अपने संयोजन के आधार पर यह करना पसंद था जिसे उनकी अनैच्छिकता के कारण ही यह काम मैं कर रहा था. यदि यह प्रयास सफल रहा तो कितनी तेजी से वह उन्हें बदल देगा.  अन्यों द्वारा विसरित कर दिये गयों के बीच पुन:स्थापित करने का यह एक प्रयास मात्र था.

उन्होंने स्वयं को बीमार कर लिया था, तथा यह सब उनकी मानसिकता की उपज नहीं था.  परन्तु अपनी आवश्यकता को नकारना उन्हें असुरक्षित सामाजिक और कुछ हद तक आर्थिक स्थिति में डालता चला जा रहा था. वे शांत थे. उनकी शांति उथली और अर्थहीन थी. उनका इस तरह से खालीपन और अपरिपक्व एकाकीपन उन्हें कहीं न ले जाकर टूटन की कगार में ले जा रहा था. यह सब बहुत कुछ अच्छा नहीं था क्योंकि यह भी कहीं न कहीं उनके स्वाभाव के विरुद्ध था. उन्होंने जिस तरह मुझे देखा मेरे भीतर कुछ दहल सा गया. वह अन्धेरे में चुप और और निश्चल बैठे रहे –मेरे आने से बिलकुल बेखबर, खाली और खोये हुए.  शायद अज्ञात में विचरण करते हुए, समय और सीमा से परे. मैंने उनकी लेखों वाली फाइल सकुशल लौटाई. उसे देखकर वह वापस आये परन्तु कोई भाव वापस नहीं आया.

“मुझे यह बहुत अजीब लगता है कि मैंने आपकी कोई किताब और यहाँ तक कोई लेख आदि भी नहीं पढ़ा है. !” मैंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.

“ यह विचित्र है. ” उन्होंने कहा.

“क्यों. ? ”

“तब,  आप मेरे लेखन के बीच एक सेतु की तरह कार्य कर सकते थे. और अब. . . ? ”

“इस सम्बन्ध में मैं आपके किसी प्रश्न का उत्तर देने की योग्यता नहीं रखता हूँ. ”

“ फिर. . ”

“आपके आकांक्षित जीवन के रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए गयी एक तुच्छ वस्तु मात्र है. . यह. !”

यह कहते हुए मैंने अपने साथ लाये, उनके नव प्रकाशित पचास किताबों का गट्ठर खोलने लगा. मेरे स्वर में कुछ ऐसा आग्रह था कि उन्हें अपनी जिद बेमानी लगी. कुछ देर तक वैसे ही पलंग में बैठे देखते रहे.  फिर और प्रतीक्षा न करते हुए बण्डल खोलने में मेरी मदद करने में तल्लीन हो गए.

“मेरी किताबें. . . . . ? ” उन्होंने पूछा.

“ निश्चय ही. ” मैं उनकी आवाज़ में उल्लासित होने का आभास और मुंह पर खिच आई एक लम्बी मुस्कराहट भांप चुका था.

“आपका इंटरव्यू होना है. . !” उसी वक्त भीतर घुस आये भाटिया साहेब ने यह कहकर उन्हें चौका दिया.

“बिना मतलब. . ? ”. परन्तु उनके चेहरे पर उग आई अदृश्य स्वप्निल तरंगों के पूर्ण होने का अहसास तारी था. एक रुखी उदासीनता जो हर समय उन पर छाई रहती थी उसका लोप हो चुका था. . . . कुछ देर अपनी किताब के अवलोकन में खोये. . . .  खोये. .  उनकी निगाह किताब की भूमिका में टिक गयी. जो उस समय के एक आलोचक ने लिखी थी.

“कब. ? ” उनके स्वर में प्रफुल्लता थी.  यह कहकर वह हंस पड़े और उनके साथ हम सब भी.

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      राजा सिंह

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