मुंशी प्रेमचंद का समग्रता में आकलन

पुस्तक समीक्षा
रंजन ज़ैदी की किताब ‘प्रेमचंद : अपार संभावनाओं के विस्मयकारी साहित्यकार’ पर शंभूनाथ शुक्ल की टिप्पणी

हिंदी गद्य के नाम पर जो कुछ है, बस प्रेमचंद ही हैं। उनकी मृत्यु को 83 साल गुज़र चुके हैं पर लगता है, न प्रेमचंद के पहले हिंदी थी, न प्रेमचंद के बाद हिंदी गद्य साहित्य रचा गया। जबकि सच्चाई यह है, कि उनके पहले भी हिंदी गद्य लिखा जा रहा था, और बाद में भी खूब लिखा गया, लेकिन हिंदी गद्य साहित्य में जो लोकप्रियता और प्रतिष्ठा प्रेमचंद को मिली, वह किसी और को नहीं। दुनिया के साहित्य जगत में हिंदी की तरफ से प्रेमचंद हर जगह मौजूद हैं।

      प्रेमचंद के विरोधी लेखक भी उनके साहित्य को दरकिनार नहीं कर पाते। इसकी मुख्य वज़ह है, उनके साहित्य में समग्रता। प्रेमचंद समाज के हर चरित्र का वर्णन करते हैं और न्याय भी। हालाँकि कुछ दलितवादी लेखक उनको राजपूतों और रजवाड़ों का भोंपू (मुंशी) बताते हैं, तो वहीँ ब्राह्मणवादी लेखक उनको ब्राह्मण-द्वेषी। कुछ मुस्लिम आलोचकों ने उनके उर्दू को छोड़ कर हिंदी में चले जाने को उनकी ‘हिंदू-परस्ती’ बताया है लेकिन यह सिरे से ही गलत है।

      यह सही है कि बुंदेलखंड (हमीरपुर और महोबा) में रहने के कारण वे बुंदेले रजवाड़ों के प्रति मोह दर्शाते हैं, लेकिन अपने कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ में वे राय साहब की विलासिता और राजपूतों के नाच-रंग में डूबे रहने की खूब खिल्ली भी उड़ाते हैं। वे ‘कफ़न’ कहानी में घीसू और माधो के  बहाने गरीबी और दीनता का वीभत्स वर्णन भी करते हैं। ‘पूस की रात’ में हल्कू की व्यथा ज़मींदारों के अत्याचार का यथार्थ है। सच तो यह है कि वे अपने ज़माने के सत्य को सामने रखते  रहे थे।

      कोई भी सत्य समय निरपेक्ष नहीं होता। ‘गोदान’ के पंडित ओंकारनाथ कहने को ही सत्याग्रही हैं, वे खुद को सामन्तवाद के घोर विरोधी तथा किसानों के लिए समर्पित बताते हैं। मगर सत्य इसके विपरीत है। वे अपने  अखबार में कामोत्तेजना बढ़ाने के घटिया विज्ञापन छापते हैं और वे स्वयं राय साहब के समक्ष हर वक्त मदद की गुहार लगाते  रहते हैं। यह एक शहरी ब्राह्मण का चरित्र है। दूसरी तरफ़ गाँव में पंडित दातादीन का एक ओर तो महाजनी रोआब है तो दूसरी तरफ वे अपने ब्राह्मण और धर्म-रक्षक होने का रौब दिखा कर किसान को जीने नहीं देते। इसमें उनके सहायक कायस्थ लाला पटेश्वरी पटवारी भी हैं और ज़मींदार के कारिन्दा नोखेलाल भी। सब रैय्यत  का ही खून चूसने के लिए ज़मींदार की तरफ से तैनात हैं।

      सच तो यह है कि प्रेमचंद का सारा लेखन एक तरफ रख दिया जाए और गोदान दूसरी तरफ, तो भी गोदान का पलड़ा भारी होगा। गोदान मुंशी प्रेमचंद के पूरे जीवन के चिंतन का निचोड़ है। मुंशी प्रेमचंद एक सनातनी परंपरा वाले कायस्थ परिवार में पैदा हुए थे  और उनके पिता पटवारी थे। उन्होंने बचपन से पटवारी द्वारा सताए गए किसानों की पीड़ा और कातरता को देखा था। फिर स्कूली जीवन में सामाजिक सुधार आंदोलन, खासकर आर्य समाज ने उन्हें आकर्षित किया, उनकी कहानियों में रूढ़ियों का विरोध इसी वज़ह से है। उर्दू में पारंगत होना कायस्थ परिवार की ज़रूरत थी। शुरू की दर्जनों कहानियां भी प्रेमचंद ने उर्दू में ही लिखीं। प्रतिष्ठा भी उर्दू से ही अर्जित की लेकिन तब लेखन व्यवसाय में (ठीक आज की ही तरह) पैसा नहीं था, दूसरे आर्य समाजी हिंदी मोह उन्हें हिंदी की तरफ खींचता रहा था।

      ‘ज़माना’ के मालिक मुंशी दया नारायण निगम को लिखे ख़त में उन्होंने यह बात स्वीकार भी की है। इसके अलावा उर्दू वालों पर तत्कालीन अंग्रेज़ी शासन का डंडा अधिक वज़न के साथ चलता था। ‘सोज़े वतन’ की ज़ब्ती और अंग्रेज़ कलेक्टर को लिखा उनका माफ़ीनामा इसका सबूत है।

      प्रेमचंद को पैसों की बहुत जरूरत रहती थी। पिता की मृत्यु के बाद सौतेली माँ का खर्च भी काफी भारी था। ऐसे में उन्हें घर चलाने के लिए बहुत पैसों की बहुत ज़रूरत रहा करती थी । हिंदी में लिख कर ईमानदारी से वह अपनी ज़रूरतें तब पूरी कर सकते थे। हिंदी पत्रों के मालिक तब भले ही कम पैसा देने के योग्य हों, हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ से प्रकाशित रचनाओं पर लेखक को सम्मान-राशि अवश्य दी जाती थी।

      आर्य समाजी आदर्शों के चलते प्रेमचंद अपने स्वभाव के अनुसार नौकरी में रिश्वतखोरी के कट्टर विरोधी थे। इस बाबत बताया जाता है कि शिवरानी देवी से जब उन्होंने शादी की, तब एक दिन दुखी होकर उन्होंने  उनसे कहा कि वह उन्हें कहीं घुमा नहीं पाते क्योंकि पैसों का बहुत अभाव रहता है। शिवरानी देवी ने कहा, ‘क्यों, घर पर दो-दो वाहन तो हैं।’ तब प्रेमचंद (सब डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल्स) को सरकार की तरफ से एक घोडा और एक बैलगाड़ी मिली हुई थी लेकिन प्रेमचंद ने इन वाहनों को निजी कार्यों के लिए इस्तेमाल को नियम के विरुद्ध बता कर मना कर दिया था। शिवरानी देवी तब एक गुल्लक की हंडिया ले कर आईं और उसे ज़मीन पर पटक कर फोड़ दिया। प्रेमचन्द स्तब्ध रह गए। गुल्लक से शिवरानी देवी को जो 36 या 37 रूपये प्राप्त हुए, वे पति की ओर बढाकर बोलीं,’ये पैसे रिश्वत के नहीं है. मेरी जमा-पूँजी है।

      इसके बाद प्रेमचंद ने उसी पूँजी से 16 रूपये की बैलगाड़ी और इतने के ही बैल खरीदे और निजी वाहन का जुगाड़ बना लिया । आदर्श और यथार्थ से जूझते हुए ही प्रेमचंद कालांतर में गांधीवाद की तरफ मुड़े, उनका ‘कर्मभूमि’ उपन्यास इसी का प्रमाण है।

      इस बीच उन्होंने सैकड़ों कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियों में यह दुविधा साफ़ दिखाई देती है।  कभी वे आदर्शवाद की तरफ खिंचते हैं तो कभी यथार्थ की तरफ। मिस पद्मा, मनोवृत्ति, मन्त्र आदि कहानियां तथा ‘निर्मला’ उपन्यास इसका प्रमाण है। मगर अंत तक आते-आते यथार्थ की जीत हुई, और गोदान इसका सबूत है।

      मुंशी प्रेमचंद कभी मार्क्सवादी नहीं रहे। उनका यथार्थ उनके खुद के आदर्श से नहीं भटका। उन्होंने कभी जड़ मार्क्सवाद को आदर्श नहीं माना। वे मानते थे, कि भारतीय समाज समरसता को ही स्वीकार करता है। गोदान में मिर्ज़ा साहब का चरित्र इसीलिए उन्होंने गढ़ा। मिर्ज़ा साहब मस्त-मौला हैं। धार्मिक कर्मकांड से ऊपर और समरसता तथा भाईचारे के प्रतीक। होरी का बेटा गोबर जब शहर आता है, तब वह मिर्ज़ा साहब के घर ही पनाह पाता है। मिर्ज़ा एक ऐसा चरित्र है, जो उस वक़्त के मुसलमानों की एक छवि पेश करता है, जो आज नहीं मिलेगी। आज मुसलमानों में एक हीन-ग्रंथि है। इसकी एक वजह पाकिस्तान है । पाकिस्तान बनने के बाद से वे अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो गए हैं। उन्हें यह भी लगता है कि पाकिस्तान तो उन्होंने बनाया नहीं लेकिन हिंदू उन पर तोहमत लगाने से पीछे हटते नहीं हैं। उनको हिंदुओं से अब डर लगने लगा है, उनको लगता है कि हिन्दू उनसे पिछली नस्लों का कोई बदला लेने को आतुर हैं। कुछ घटनाएँ इधर हुई भी हैं । पढे-लिखे मुसलमान भले ही यह न  मानें, पर आमतौर पर मुसलमान जब अपने घर से निकलता है तो उसे यह भय सताता रहता  है कि बदले की आग उसका पीछा कर रही है । ऐसे माहौल में मस्तमौला मिर्ज़ा का कैरेक्टर एक नया रूप प्रस्तुत करता है जो आज की पीढ़ी को अलग भले लगे लेकिन सच्चाई यही है। प्रेमचंद की खूबी यही रही है कि बिना पक्षपात के उन्होंने अपने पात्रों की रचना-संरचना की और उन्हें जीवंत कर दिया।

      भले हिंदी, उर्दू का ही एक रूप हो, लेकिन हिंदी का जन्म उर्दू के समानान्तर हिंदुओं की एक अलग भाषा बनाने के लिए अंग्रेजों के प्रयासों से हुआ। यही कारण है कि हिंदी के साहित्य में हम मुस्लिम पात्र नहीं पाते हैं। अगर किसी ने उन्हें उद्धृत किया भी, तो एक क्षेपक के तौर पर। जहां वह खल पात्र है, या फिर बाजारू। एक नायक के तौर पर हिंदी में किसी हिंदू लेखक ने मुस्लिम  पात्र को नहीं गढ़ा। लेकिन प्रेमचंद ने बहुत सहज भाव से मुस्लिम पात्र गढ़े। उनकी कहानी ईदगाह इसका एक सशक्त प्रमाण है । अगर पर्व दीवाली हो, दशहरा हो और हामिद का नाम रामू हो, तो क्या कोई कह पाएगा कि यह किसी मुस्लिम पात्र की कहानी है। इस सहजता से वे बयान करते हैं गरीबी का कोई धर्म, सम्प्रदाय नहीं होता है. गरीबी के त्योहार खुशियाँ-ग़म, दर्द और आंसू  समान बांटते हैं।  फिर कैसा भेद! क्या मानवीय रिश्तों को हिन्दू-मुस्लिम में बाँटा जा सकता है नहीं, तब फिर यह भेद क्यों? ज़ाहिर है कि लेखक अपने विचार और दर्शन को रचता नहीं, गढ़ता है, उसमे भेद तलाशता है। अगर वही लेखक हिन्दी की बजाय उर्दू में लिखे, तो उसके वही पात्र बदल जायेंगे, वे हिन्दू-मुस्लमान हो जायेंगे। यह एक ऐसा बाज़ार है, जिसके चलते-बस्ते  लेखकों की मानवीय संवेदनाएँ मर जाती  हैं। हिन्दी लेखक हिन्दी का परिवेश गढ़ने लग जाता है  और मुस्लिम लेखक मुस्लिम परिवेश। साहित्यकारों द्वारा समाज को धर्म, जाति और समुदाय में बांटने की यह कोशिश अत्यंद निंदनीय है।

      प्रेमचंद ने सहज रूप में समाज को देखा, और वैसा ही जैसा कि वह है। प्रेमचंद कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं थे, न ही कोई क्रांतिकारी। वे एक लेखक थे, और इस लेखक के कैरेक्टर को उन्होंने ईमानदारी के साथ जिया। उन्होंने अपने पात्र समाज से उठाए, और उन्हें, उनकी पीड़ा, प्यार, खुशियाँ, रोग और शोक को जस का तस पेश किया। प्रेमचंद की यही विशेषता उन्हें अपने समकालीनों से अलग करती हैं। इसके लिए उन्होंने खूब आलोचनाएँ सुनीं, किन्तु वे अपनी राह चलते रहे। प्रेमचंद की यह एक ऐसी प्रतिबद्धता है, जो उन्हें सबसे अलग करती है और उन्हें जनोन्मुखी बनाती है।  इसकी वज़ह थी, कि प्रेमचंद भले मार्क्सवादी न रहे हों, किन्तु उनकी चेतना का स्तर द्वंदात्मक था। जो बाद में द्वंदात्मक भौतिकवादी में बदल गया। यही कारण है, कि समाज के बारे में प्रेमचंद की नज़र हमें मार्क्सवादी चेतना से लैस नज़र आती है। प्रेमचंद चीज़ों को प्रगतिशील नज़रिए से देखते थे, इसलिए उनकी नज़र में हम यथार्थ और देशज संस्कारों का मिला-जुला रूप पाते हैं। गोदान में प्रेमचंद प्रोफ़ेसर मेहता के हवाले से अपने विचार रखते हैं। प्रोफ़ेसर मेहता मानवीय मूल्यों के पक्षधर हैं, लेकिन वे पश्चिम के भौतिकवाद को नकारते हैं। वे समानता, समरसता और भेदभाव से परे हैं, किन्तु वे अपने देश की परंपराओं के अनुकूल ही इनका विश्लेषण करते हैं। वे मालती को अपने इन्हीं विचारों से इतना प्रभावित करते हैं, कि वे चकाचौंध की दुनिया छोड़कर प्रोफ़ेसर मेहता की सादगी पर मोहित हो जाती है। वे राय साहब को मालती के इस बदलाव के बारे में जब बता रहे होते हैं, तब लगता है, कि मेहता की नज़र कितनी व्यापक है। प्रेमचंद की यही विशेषता और खासियत उन्हें विश्व के महान लेखकों के बीच लाती है। और यही प्रेमचंद का निष्कर्ष है।

      डॉ. रंजन जैदी ने अपनी पुस्तक में प्रेमचंद के इन्हीं मनोभावों और उनके चरित्र के उजले पक्ष को पकड़ा है। किसी भी लेखक का आकलन उसके लेखन और उसके विचारों से किया जाता है। उसके निजी चरित्र से नहीं। समाज में तमाम मौके ऐसे आते हैं, जब हमारा निजी चरित्र किसी एक क्षण गिरा हुआ नज़र आता है, पर सिर्फ उस घटना से किसी व्यक्ति का पूरा आकलन करना गलत है। चूंकि हम लेखक के चरित्र से ही उसके विचारों का आकलन करते हैं, इसलिए उसे नकारने का कुत्सित प्रयास करने लगते हैं। जबकि सत्य यह है, कि चरित्र एक अलग पक्ष है, और लेखन पूरी तरह अलग। और यह भी ध्यान रखना चाहिए, कि चरित्र सदैव समय सापेक्ष होता है, जबकि लेखन कालजयी। यही सोच कर हमें किसी लेखक के अन्दर के मानवीय मूल्यों का आकलन करना चाहिए। तब ही हम उस लेखक के साथ न्याय कर पाएंगे। डॉ. रंजन जैदी ने प्रेमचंद को इसी रूप में देखा है।


यह किताब हंस प्रकाशन से आई है और इसकी कीमत 495 रुपए है।

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