ज़िन्दग़ी के बीच से निकली कहानियां

पुस्तक समीक्षा
गोविंद सेन के कहानी संग्रह ‘दसवीं के भोंगाबाबा’ पर आशा पांडेय की टिप्पणी
अच्छी कहानियां मेरे लिये गूँगे के गुड़ के समान होती हैं।मैं उन्हें जितना महसूस करती हूं उतना उनके बारे में कह नहीं पाती हूँ। कथाकार गोविंद सेन जी का दूसरा कहानी संग्रह”दसवीं के भोंगाबाबा’ को पढ़ते हुए मैंने बड़ी शिद्दत से यही महसूस किया।
 
इस संग्रह की हर कहानी जिंदगी के बीच से निकलकर जिंदगी का ही पाठ करती है। ये कहानियां किसी विमर्श के तहत तो नहीं लिखी गई हैं किंतु कहानियों से विमर्श निकलता है। बड़े सामान्य तरीके से शुरू करके अपनी कहानियों में वे एक कालखण्ड को जिंदा कर देते हैं।
 
‘लाम्बू फोतरु ‘संग्रह की पहली कहानी है। कहानी का एक पात्र गुमानसिंह यूं तो कम पढ़ा-लिखा है ,किंतु बिजली विभाग में लाइन मैन हो गया है। उसे इसका बहुत गुमान है। वह अधिक पढ़े-लिखे मास्टर को अपनी पे-स्लिप दिखाकर उसे चारों खाने चित करना चाहता है। इस कहानी में लेखक ने मनोभावों का जीवंत चित्रण किया है। कहानी की भाषा बहुत सजीव और आंचलिकता से भरी है।कई ऐसे शब्द हैं जो उस क्षेत्र को पाठकों के सामने जीवंत कर देते हैं।
 
“कृपा का अधिकार” कहानी व्यंग्यात्मक शैली में लिखी गई है और शिक्षा विभाग के काले कारनामों को खोलती है। इस कहानी के माध्यम से शिक्षा विभाग की कई कमियों पर कथाकार ने प्रश्न उठाया है।
“खुमसिंग”कहानी में एक दर्दीली पुरानी याद के उभर आने का जिक्र है। ढलती उम्र के अकेलेपन को व्यक्त करती कहानी “टापू”अपने अंत में उम्मीद से भर देती है।कहानी नायक को एक दिन राम-राम कह कर अभिवादन करने वाला एक व्यक्ति मिल जाता है जिससे उसके मन में खुशी की लहर उठ जाती है।फिर उसे याद आता है कि बिल्डिंग का चौकीदार उससे रोज गुडमार्निंग करता है, एक छोटी बच्ची ने उससे राम-राम की थी।मे ट्रो में एक छोटे लड़के ने उसके लिए अपनी सीट छोड़ दी थी। ये छोटी छोटी बातें उसे खुश कर देती हैं और इन बातों को सोचकर वह इस अनजान वीरान शहर में भी मुस्कुरा देता है।
 
“गरीबी का गोबर्धन”कहानी यात्रा वृतांत शैली में शुरू होती है और अंत तक आते आते बड़ी मार्मिक बन जाती है। कहानीकार अपनी हर कहानी में एक चित्र खींचने में समर्थ है।”स्याही कहानी”बड़े बड़े अधिकारियों नेताओं और पत्रकारों द्वारा सामान्य से इंसान को इस्तेमाल कर उसे फेंक देने की दास्तां कहती है।
 
” न्यारसिंग का नसीब” में कई प्रश्न उठाये गए हैं। यूं कहानी बड़ी बड़ी बातों को उठाने का डंका नहीं पीटती बल्कि अपने कहन में ही बहुत कुछ कह जाती है। ‘भारत की बेटी’ के अंत में बड़ा तीखा कटाक्ष किया गया है। इस कहानी को पढ़कर पाठक कुछ देर शांत बैठ कर सोचने के लिए मजबूर हो जाता है।
 
संग्रह की शीर्षक कहानी’दसवीं के भोंगाबाबा’ ऐसी कहानी है जिसका पात्र पहले हर गांव में मौजूद रहता था। इसे पढ़ते हुए कई लोग आंखों के सामने सजीव हो जाते हैं, यद्यपि अब इस तरह की मासूमियत गांवों से भी दूर होती जा रही है। इन कहानियों की विशेषता इनकी ताजगी है। भाषा और शिल्प के आधार पर ये कहानियां पाठक को ताजगी से भर देती हैं। आंचलिकता इनका दूसरा आकर्षण है। इन कहानियों को पढ़कर स्वयं को समृद्ध किया जा सकता है।
लोकोदय प्रकाशन , लखनऊ से प्रकाशित इस संग्रह की कीमत मात्र 150/है।

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