साधारण लोगों की असाधारण कहानी

नीरज नीर के कहानी संग्रह ‘ढुकनी एवं अन्य कहानियां’ पर कमलेश की टिप्पणी

मैंने नीरज नीर की पहली कहानी हंस में पढ़ी थी- कोयला चोर। उससे पहले मैं उन्हें एक बेहतरीन कवि के रूप में जानता था। उनका कविता संग्रह ‘जंगल में पागल हाथी’ और ‘ढोल’ चर्चित हो चुका था और इसको लेकर बातचीत भी चल रही थी। लेकिन कोयला चोर पढ़कर मैं हैरत में पड़ गया- जितने बेहतरीन कवि उतने ही शानदार कथाकार। इसके बाद मैंने उनकी कई कहानियां पढ़ी और उसमें से ‘ढुकनी’ जैसी कहानियां तो शायद ही कभी भूल पाउं। ‘ढुकनी’ की तो कई नाट्य प्रस्तुतियां भी हो चुकी हैं। सच है, एक कवि जब कहानी लिखता है तो मानो पाठक पर जादू कर देता है।

इस बात का उल्लेख इसलिए कि दो दिन पहले मैंने नीरज नीर का कहानी संग्रह ‘ढुकनी’ पढ़कर खत्म किया है और उसके बाद से ना तो कुछ पढ़ने की इच्छा हो रही है और ना ही लिखने की। बस उसी संग्रह में डूबा हूं। विषयों की विविधता, उसपर होम वर्क और इसके बाद कहानी की बुनावट सब कुछ लाजवाब। ठीक ही कहा है पंकज मित्रजी ने- नीरज नीर की कहानियों की डिटेलिंग चमत्कृत कर देती है। पूरे संग्रह में झारखंड के गांव- गिरांव और उन गांवों के लड़ते-भिड़ते लोग। हारने के बावजूद अगली लड़ाई की तैयारी और मरते दम तक लड़ते रहने का दम-खम। उनकी कहानियों के पात्र एकदम साधारण लोग हैं। अपनी हालत बदलने की लड़ाई लड़ते लोग। लेकिन उनकी लड़ाई कब इस दुनिया को बदलने की लड़ाई में बदल जाती है इसका पता ही नहीं चलता। गांव की गरीबी से उकता कर शहर में मजदूरी करने जाने वाले लोग जब वहां भी दुखों के पहाड़ के नीचे आकर छटपटाते हैं तो आप उनके साथ अनायास जुड़ने लगते हैं। लेखक की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वह पाठकों को अपने पात्रों के साथ जोड़ लेता है और कई बार कहानी खत्म होने के साथ पाठक यह सोचने लगता है कि यह तो उसके ही गांव-गिरांव की कहानी थी।

इस संग्रह में कुल 14 कहानियां हैं। इनमें से कई कहानियां कुछ पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के बाद चर्चित हो चुकी हैं। लेकिन संग्रह में इन्हें पढ़ना बहुत सुख देता है। संग्रह में शामिल ‘दिल्ली का धोबी’ तो अद्भुत कहानी है और गांव को लेकर आज भी अलग तरह के फैंटेसी में डूबे रहने वालों को मानो सच का साक्षात्कार कराती है। कहानी दलितों का देवता लूट के एक नये तंत्र को बेनकाब करती है तो कहीं तो होगा ऐसा देश कहानी के पात्र आपको हर जगह मिल जाएंगे। कोई कहानी ऐसी नहीं जो आपको रोकती नहीं हो।

कहानियों की भाषा एकदम सरल और सहज है। शब्दों का कोई मोह नहीं और प्रवाह ऐसा कि आप बस डूबकी लगाते रहे। कहानी खत्म होने पर आपको लगता है- थोड़ा और होना चाहिये था। नीरज नीर को इस संग्रह के लिए ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं। और हां, प्रभात प्रकाशन ने इस संग्रह को बड़े मिजाज से छापा है। साफ-सुथरी छपाई और नयनाभिराम आवरण। प्रभात प्रकाशन को भी  बधाई

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *