इश्क : छोटे कलेवर में बड़ा संदेश देता उपन्यास

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

पितृसत्तात्मक समाज की सबसे बड़ी ध्वजवाहिका स्त्री ही होती है। परंपरा, रिवाज, संस्कार के नाम पर जाने-अनजाने बेटियों से लेकर बहुओं तक पर पुरुषशासित समाज के उन नियमों को कड़ाई से पालन करने की जिम्मेदारी स्त्रियों के कंधों पर ही होती है, जो अन्तत: उन्हें बेड़ियों में जकड़ता है। पितृसत्तात्मक समाज ने औरतों के लिए जिस जेल का निर्माण किया, उसकी जेलर बन चुकी एक औरत वो सारे दुख, तकलीफ झेल चुकी होती है, जो वह दूसरी औरत को देती है या देना चाहती  है। इसलिए जिस पितृसत्तात्मक समाज का इतना हौवा है, उसमें औरतों को औरत ही बचा सकती है। आज के युग में अगर औरत ठान ले कि उसे इस समाज को ध्वस्त कर देना है और लड़कियों के लिए एक नए समाज का निर्माण करना है तो मुश्किल होने के बावजूद यह काम नामुमकिन तो नहीं ही है। इसी देश में ऐसे कई उदाहरण बिखरे पड़े हैं। वरिष्ठ कवयित्री और अब उपन्यासकार भी, के सद्यप्रकाशित उपन्यास ‘इश्क’ में एक महिला ही यातना और खौफ़ की इस जेल को तोड़ती है।

 ‘इश्क’ एक लघु उपन्यास है और गद्य विधा में शुक्ला जी की पहली किताब। कहानी एक जमींदार परिवार और चमार टोला के कुछ किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। यह टोला बिल्कुल अलग है। सबसे अलग। यहां के लोग अछूत हैं। इन्हें छुआ नहीं जा सकता लेकिन यहां की औरतों की देह के  लिए ठाकुरों की लार टपकती रहती है। ठाकुर इसी टोले में रहने वाली बल्ली की पत्नी जमनी को अगवा कर उसके साथ कई रोज तक बलात्कार करता रहा था। जमनी किसी तरह उसके चंगुल से बचकर भागी थी। ठाकुर की पत्नी सुमित्रा को तब अपने पति की करतूत की जानकारी तो थी लेकिन पति को रोक पाना उसके वश में नहीं था। तमाम सुख सुविधाओं से सम्पन्न उस महल में उसकी हैसियत एक कैदी से ज्यादा कुछ नहीं थी लेकिन वह आत्मग्लानि की आग में जलती रहती है और इसलिए जमनी के जख्म पर मरहम लगाने के लिए चमार टोला पहुंच जाती है। ठाकुर का खून खौल उठता है और वह चमार टोला में जाकर ही सुमित्रा को उसकी औकात बता देता  है।

जमनी नहीं बच पाई थी। एक बच्ची को जन्म दिया लेकिन खुद चल बची। बल्ली की आंखों की रोशनी जा चुकी है लेकिन वह अपनी बच्ची फगुनिया को हर आफत से बचाने की कोशिश में जुटा रहता है। उसकी दो आंखों की रोशनी गई है लेकिन जवान होती बेटी की रक्षा के लिए मानो अब उसके सारे शरीर में हजारों आंखें उग आई हों। ठाकुर बूढ़ा तो हुआ है लेकिन वहशी पहले जैसा ही है। तीनों बेटे भी अब ठाकुर हैं। बड़े ठाकुर, मंझले ठाकुर और छोटे ठाकुर। मां पहले बाप से डरती थी अब इन तीनों ठाकुरों से डरती है। ऐसे में वह अपनी ममता कोंदा नाम के एक नौकर पर लुटाती है, उसे पुत्र की तरह स्नेह करती है।

ठाकुर और उसके तीनों बेटों की कामुक नज़रें अब जमनी की बेटी फगुनिया पर है। वो फगुनिया को फंसाने के लिए कोंदा को मोहरा बनाना चाहते हैं। कोंदा खुद फगुनिया के इश्क में पागल है लेकिन वह ठाकुरों की चाल को नहीं समझ पाता। बात साफ तब होती है, जब मिशन में नाकाम होने पर बाप-बेटे उसे बुरी तरह पिटते हैं। सुमित्रा सब समझ रही होती है लेकिन इस बार वह पुरानी सुमित्रा नहीं है। इस बार वह ठाकुर के इस यातनागृह की दीवारों को गिराने का संकल्प कर चुकी है। वह कोंदा को पूरी सच्चाई बताती है और यह भी खुलासा करती है कि फगुनिया की रगों में असल में ठाकुर का ही खून बह रहा है।

कोंदा बेटे का फर्ज अदा करता है  और वहशी ठाकुर और उसके तीनों बेटों को सबक सिखाता है। सुमित्रा शान के साथ फगुनिया को चमार टोला से लेकर अपने महल में लौटती है। बेटी को उसकी असली जगह और अधिकार दिलाने।

उपन्यास रोचक है और बांधे रखता है। ठाकुर के बेटों का ठाकुर जैसा बनना उस घर का संस्कार था। उस संस्कार को तोड़ने वाला या चुनौती देने वाला कोई नहीं था। किसी की हिम्मत नहीं थी। बहुएं भी जमींदार परिवार के उसी पूर्वग्रह के साथ ही जीती हैं कि ठाकुरों को कुछ भी करने का हक है। आखिरकार सुमित्रा के अंदर की चेतना जागती है और वह तनकर खड़ी हो जाती है। उसके खड़े होते ही ठाकुर के खौफ, दहशत, अय्याशी, यातना का महल भरभरा कर गिर जाता है।

किताब डायमंड बुक्स  से आई है। ऐसे समय में जब हिन्दी में पाठकों का संकट चरम पर है, प्रकाशक ने क्या सोचकर 64 पन्नों की किताब का दाम 150 रुपए रखा है, यह तो प्रकाशक ही जाने लेकिन इस मूल्य की वजह से बहुत सारे पाठक इस अच्छी कहानी से वंचित जरूर रह जाएंगे।

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उपन्यास : इश्क
लेखिका : शुक्ला चौधुरी
प्रकाशक  डायमंड पॉकेट बुक्स
मूल्य 150 रुपए

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