बाज़ारवाद के घातक हमलों की कहानियां

चर्चित किताब

कहानी संग्रह : आईएसओ 9000

लेखक  : जयनंदन

मूल्य  : 380 रुपए (हार्ड कवर)

प्रकाशक  : नेशनल पेपरबैक्स, दिल्ली

सत्येंन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव

जयनंदन संघर्षशील लोगों के कथाकार हैं। जयनन्दन मज़दूरों के बीच रहे हैं। उनकी ज़िन्दगी जी है। खुद भी मजदूर रहे हैं। इसलिए उनके दर्द को उनसे बेहतर कौन समझ सकता है। इसलिए उनकी कहानियों में मज़दूरों का दर्द पूरे आवेग के साथ आता है और पाठकों को हिला कर रख देता है। जयनन्दन की खासियत है कि वो मज़दूरों के शोषण और दमन का बेखौफ़ पर्दाफाश करते हैं।

आज मैं जयनन्दन के कहानी संग्रह ‘आईएसओ 900’ की बात करूंगा। नेशनल पेपरबैक्स से प्रकाशित इस कहानी संग्रह में कुल 10 कहानियां हैं। इस कहानी संग्रह की ख़ास बात यह है कि इसमें उन्हीं कहानियों को शामिल किया गया है, जो बाज़ारवाद और उपभोक्ता संक्रमण की कथा कहते हैं। बाज़ारवाद और उपभोक्ता संक्रमण का शिकार सभी हुए हैं। दुनिया को अपनी उंगली पर नचाने की ख्वाहिश रखने वाला पूंजीपति भी और हर रोज एक एक रोटी के लिए शरीरतोड़ मेहनत करने वाला समाज का सबसे वंचित वर्ग भी। बाज़ारवाद ने उच्च वर्ग को और उच्छृंखल बनाया, मध्यवर्ग को भौतिकवाद के जाल में उलझाते हुए कर्ज के दलदल में धकेल दिया तो सबसे निचले पायदान पर खड़े वर्ग को और ज्यादा शोषण और दमन की भट्ठी में झोंक दिया। इस कहानी संग्रह में इन सारे वर्गों की कहानी है। अधिकारी भी है, मज़दूर भी है, औरत भी है और एक सामान्य परिवार भी है, जो इस संक्रमण के चलते अपनों से ही कटता जाता है। अपनी संस्कृति, रिश्तों की अहमियत भूलता जा रहा है।

संकलन का शीर्षक जिस कहानी ‘आईएसओ 9000’ पर है, वह कहानी क्रूर होते प्रबंधन और लाचार होते जाते मज़दूरों की त्रासद और मर्मांतिक कथा है। मैनेजमेंट के लिए एक मज़दूर की ज़िन्दगी किसी कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं—यह कहानी इसी सच को उद्घाटित करती है। कंपनी को पूरी दुनिया में माल बेचना है, इसके लिए विश्वस्तरीय गुणवत्ता का प्रमाणपत्र आईएसओ 9000 चाहिए और इसलिए कंपनी इस बात को दबा देना चाहती है कि संदीप नाम का एक कर्मचारी उस वेसेल में गिर कर मर गया, जिसमें 1600 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर मोल्टेन इस्पात था। एक जीता जागता आदमी देखते देखते इस्पात में तब्दील हो गया। 1600 डिग्री तापमान। संदीप का कोई अवशेष नहीं बचा लेकिन कंपनी को एक आदमी की मौत की नहीं बल्कि सिर्फ आईएसओ 9000 प्रमाणपत्र की चिन्ता है। कंपनी ने संदीप को उस दिन अनुपस्थित दिखा दिया। वो वहां कभी आया था, इसका कोई सबूत ही नहीं बचा। नौकरी बचाने के लिए सबने अपनी जुबान पर ऐसे ताले लगा लिए कि संदीप नाम एक हंसता खिलखिलाता चेहरा कभी उनकी ज़िन्दगी में आया ही नहीं था। उसका सबसे प्रिय दोस्त तरुण, जो इस अन्याय को बर्दाश्त नहीं कर पा  रहा था, वह मुंह खोलना  चाहता  था लेकिन आखिरकार उसे भी समझ में आ ही जाती है कि नौकरी ज्यादा जरूरी है। वह भी मुंह नहीं खोलता।

संदीप का बूढ़ा बाप तरूण के पास बार-बार आता है। जानना चाहता है कि उसके बेटे का क्या हुआ लेकिन तरुण चुप रहता है। चुप्पी है तो नौकरी है। नौकरी है तो रोटी है, परिवार है, बच्चों की पढ़ाई लिखाई है। दोस्त की मौत का ग़म तो है लेकिन भूख हर दुख पर भारी पड़ती है। दुख हार जाता है, भूख जीत जाती है।

आज हम सभी ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं। हमारी जुबान को काबू में करने का हुनर पूंजी को आ गया है। हम पूरी तरह गुलाम हो चुके हैं। आज संदीप की बारी है तो कल तरुण की भी आ सकती है। तरुण इसे महसूस भी करता है। वह सपना देखता है कि जिस मोल्टेन इस्पात में संदीप पिघल गया था, वह उत्तम क्वालिटी का बना है और ऐसे इस्पात की मांग पूरी दुनिया में बढ़ गई है। अब कंपनी हर रोज एक व्यक्ति को मोल्टेन स्टील के वेसेल में डालती है और एक दिन तरुण  की भी बारी आ जाती है।

इस कड़वी सच्चाई को तरुण समझता है  और इसलिए वह अंदर ही अंदर छटपटाता रहता है। वह हमेशा एक अपराध बोध में जीता है। आईएसओ 9000 सर्टिफिकेट मिलने के बाद भी कंपनी की मक्कारी जारी रहती है। ऐसे हादसों के बाद परिवार को जो मुआवजा देना चाहिए, मैनेजमेंट उसे हड़प लेना चाहता था क्योंकि हादसे वाले दिन तो उसे अनुपस्थित दिखा दिया गया है। कंपनी की इस मक्कारी के बाद अन्तत: वह जुबान खोलने का फैसला करता है। ऐसा नहीं है कि संदीप के पिता को कुछ मालूम नहीं था। वो सब समझते थे इसलिए वो कहते भी हैं, ‘मैं तो आ ही रहा था तुम्हारे घर, तुम्हारी चुप्पी को सुनने, तुम्हारी बदहवासी को पढ़ने..’

वो यह भी कहते हैं, ‘मुझे याद है, आज से 20-25 साल पहले मजदूरों में इतनी आग और एकता हुआ करती थी कि किसी भी बेईमानी और नाइंसाफी के खिलाफ लोग एक साथ आंदोलन करने पर उतारू हो जाते थे, जबकि उस समय प्राय लोग गहन अभाव और मुश्किलों में जीते थे।’

यही बात गौर  करने लायक है। लोग अभाव और मुश्किलों में होते थे, इसलिए उन्हें किसी बात की परवाह नहीं होती थी। वह गलत के खिलाफ आवाज बुलन्द करते थे। अब ऐसा हर व्यक्ति बाजारवाद के शिकंजे में  है। आर्थिक  उदारीकरण ने बाजारवाद के पंजे को और पैना बना दिया। आर्थिक उदारीकरण के रास्ते पूंजी और बाजार आदमी के दिमाग के नियंत्रित कर लिया है। अब आम आदमी का दिमाग ईएमआई के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकता है। आंदोलन, विरोध, क्रांति सब  पूंजीवाद का यह ऐसा चक्रान्त है, जिसमें पूरी दुनिया फंस चुकी है। इससे निकलना अब मुश्किल दिख रहा है।

लेखक स्वयं जमशेदपुर के टाटा स्टील प्लांट में कार्यरत रहे हैं और उनकी कहानियों में यह प्लांट बार बार आया है। यहां उन्होंने मजदूरी भी की और अफसरी भी। इसलिए उनका अनुभव क्षेत्र बहुत व्यापक है। वो खुद कहते हैं, “गांव को भी मैंने बहुत शिद्दत से देखा। मजदूरों को भी देखा। खुद भी मजदूर रहा। लेखन में जब मान्यता मिलने  लगी  तब मेरा ट्रांसफर पब्लिक रिलेशन्स डिपार्टमेंट में कर दिया गया। जब मैं मजदूर था तो मैं मैनेजमेंट को नीचे से देख रहा था और जब मैं यहां आ गया तो मैनेजमेंट को ऊपर से देखना शुरू किया। तो चकमक ऑफिस और एयर कंडिशंड ऑफिस में रहने का भी मुझे अनुभव प्राप्त है। और मजदूरों के साथ पसीने और कालिख में लिथड़ कर के जिस तरह काम होता है, वो भी मैंने किया। तो जाहिर है मेरे अनुभव का जो क्षेत्र है, उसमे बहुत विभिन्नता है।”

मज़दूरों के संघर्ष पर लिखी उनकी हर कहानी में उनका यही अनुभव झलकता है।  उनकी ऐसी ही एक कहानी है ‘विश्व बाजार का ऊंट’।

इस कहानी में आधुनिकीकरण के नाम पर मज़दूरों की छंटनी की मार्मिक दास्तान है।  जिन्होंने आधुनिकीकरण के उस दौर को देखा है, उन्हें याद होगा आधुनिकीकरण और छंटनी कैसे एक दूसरे के पूरक बन गए थे। बिना छंटनी आधुनिकीकरण की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। मशीन बनाने वाला आदमी खुद मशीन के खिलाफ मुठ्ठी बांधकर खड़ा था। मशीन ने बड़ी संख्या में लोगों के पेट पर लात मारी थी। जिस कारखाने से परिवार जैसा संबंध था, जब उसने ही जाने को कह दिया तो मज़दूर केवल आर्थिक रूप से ही नहीं टूटे बल्कि मानसिक रूप से भी बिखर गए। ‘विश्व बाजार का ऊंट’ में जयनन्दन जी ने बड़ी ही सूक्ष्मता के साथ इस टूटन को पकड़ा है और इसका बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है। कहानी का नायक सकलदेव आधुनिकीकरण के दो पाटों में पिसता है।  कारखाने में आधुनिकीकरण की वजह से वह नौकरी गंवाता है तो बाजार के चकाचौंध में पगलाए परिवार के आधुनिकीकरण की वजह से मन का सुकून। नौकरी जाने के बाद आखिरकार सकलदेव अपने आधुनिक परिवार को छोड़ हमेशा के लिए गांव चला जाता है।  किसी इंसान की जिंदगी में बाजारवाद का इससे ज्यादा क्रूरतम चेहरा और क्या हो सकता है!

‘प्रोटोकॉल’ कहानी में इस बात का चित्रण है कि मुनाफे के लिए कंपनी किसी भी हद तक गिर सकती है। वह अपनी महिला प्रोटोकॉल अधिकारी को इस बात के लिए मजबूर करने की कोशिश करती है कि इंटरनेशनल क्लाइंट को खुश करने के लिए वह उसके साथ सोने में भी न झिझके। एम डी उससे कहता है,’ जूही, आई नो यू आर ए वेरी इंटेलीजेंट गर्ल। आई बिलीव दैट यू नो योर पीआर रेस्पांसिबिलिटी वेरी वेल। इट इज योर ड्यूटी टु मेक सिचुएशन फेवरेबुल फार द सेक आफ कंपनी। यूं आर अवेयर विद आवर स्लोगन ‘कस्टमर फर्स्ट हर हाल में। ग्लोबलाइजेशन इज आवर चैलेंज, जूसी…वी मस्ट फेस इट। गो अहेड एंड विन द गोल। होप यू विल सक्सीड इन इट। ‘ यह कहानी बाजारवाद की नंगई को उजागर करती है।
‘धोखा’ कहानी जातिवाद का दंश झेल रहे एक संभावनाशील युवक के बाजार के चंगुल में फंस कर बर्बाद हो जाने की कहानी है। वह रातों-रात करोड़पति बनने के लिए ‘कौन बनेगा करोड़पति’ शो में जाने की कोशिशों में खुद को झोंक देता है। आखिरकार वह कहीं का नहीं रहता। ‘आफिसर’, ‘‌मायावी’, ‘क्षितिज’, ‘मल्टीपरपस सर्विस’ घर में बाज़ार की घुसपैठ के भयावह नतीजों की कहानियां हैं।

दो पीढ़ियों की बीच की बढ़ती खाई को उपभोक्ता संस्कृति किस तरह और चौड़ा किया है, यह ‘पेटू’, ‘अठतल्ले से गिर गए रेवत बाबू’, सूखते स्रोत जैसी कहानियों में बहुत ही मार्मिक ढंग से उभर कर सामने आया है। जिंदगी भर संघर्ष करके बाप बेटे को इस लायक बनाता है कि वह फ्लैट में रह सके, कार में चल सके लेकिन वही बेटा जब उपभोक्तावादी संस्कृति में फंसकर इस संघर्षशील अतीत से पीछा छुड़ाने की कोशिश करता है तो वस्तुत: वह अपने मां-बाप के संघर्ष, उनकी जीजीविषा को ही नकार रहा होता है। नई पीढ़ी की इस मनोवृत्ति से बूढ़ी हो रही पीढ़ी में कितना कुछ टूटता है। इतनी टूटन तो इस पीढ़ी ने तब भी महसूस नहीं की थी, जब उसे भूखों रहना पड़ा था। आज घर में खाने की कोई कमी नहीं लेकिन भोजन में वह स्वाद नहीं। अपना कुछ भी नहीं रहा।

‘पेटू’ कहानी में दरबारी प्रसाद अपनी उस बीमार दीदी के लिए 5 हजार रुपए चाह कर भी नहीं भेज पाते, जिसने अपने ससुराल वालों की तरेरती आंखों का सामना करने के बावजूद उसे भर पेट खाना खिलाया। भूखे भाई को खाता देख दीदी का हिया जुड़ा जाता है लेकिन गरीब घर की बेटी अपनी ससुराल में भाई को हर हफ्ते कैसे खाना खिला सकती है? एक दिन उसे भाई को बाहर से ही लौटाना पड़ता है। वह कहती है, ‘तुम्हारे बार-बार आने को लेकर जेठ बहुत उल्टा टेढ़ा बोल रहा था। इस बात को लेकर मुझसे कहासुनी भी हो गई। तुम आज घर मत जाओ। तुमसे भी उसने कुछ कह दिया तो मुझसे सहा नहीं जाएगा।’ यह सच्चाई हम सब जानते  हैं कि गरीब घर की बेटी बड़े घर में भी जाकर गरीब ही रहती है। उसे हमेशा उसकी हैसियत याद दिलाई जाती रहती है। उसे इतना भी अधिकार नहीं होता, कि वह अपने छोटे भाई को एक वक्त का खाना खिला सके। इसी लाचारी को जताते हुए दीदी जब कहती है, ‘मैं कितनी लाचार हूं मुन्ना कि अपने घर में तुम्हें खाने तक की छूट नहीं दे सकती। सच मेरे भाई, विधाता अगर मुझे सामर्थ्यवान और आत्मनिर्भर बना दे तो मैं पूरी ज़िन्दगी तुझे खिलाते हुए और खाते देखते हुए गुजार दूं। सच दरबारी, तू खाते हुए मुझे बहुत अच्छा लगता है रे। जब तुम खाते हो तो लगता है जैसे अन्न पूजित और प्रतिष्ठित हो रहे हों।’ मुन्ना के भूख के दर्द को दीदी ही समझ सकती थी और दीदी के दर्द को मुन्ना। उनके बच्चे दर्द की डोरी से जुड़े खून के इस रिश्ते को नहीं समझ पाते। इसलिए 6 चिट्ठी लिखने के बावजूद दीदी को 5 हजार रुपए नहीं भिजवा पाता मुन्ना। बच्चों को टोकता रहता है लेकिन बच्चे फिजूलखर्ची तो करते हैं लेकिन बुआ के इलाज के लिए पैसे देने से मना करते हैं। सिर्फ़ एक हजार रुपए भेज कर तसल्ली से बैठ जाते हैं। आखिरकार दीदी की मौत हो जाती है। ‘पेटू’ कहानी आपको रूला देगी। ‘आठ तल्ले से गिर गए रेवत बाबू’ भी एक संघर्षशील पिता की ऐसी ही मार्मिक कहानी है। बाज़ारवाद के नशे में चूर बच्चे किस तरह रिश्तों को रौंदते जाते हैं, उसे पढ़कर आपकी आंखें नम हो जाएंगी।

जयनन्दन की कहानियों को मैं अपने दिल के बहुत करीब पाता हूं। जयनन्दन जिस माहौल की कहानियां लिखते हैं, मैं उसी माहौल में पला-बढ़ा। इन कहानियों का हर किरदार पहचाना हुआ लगता है। आप पढ़ेंगे तो आपको  भी बहुत सारे किरदार जाने-पहचाने लगेंगे। इन किरदारों से अगर मिलना चाहते हैं तो ‘आईएसओ 9000’ की कहानियों को जरूर पढ़ें.

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