एकजुट चूहे तोड़ सकते हैं बिल्ली की टांग

पुस्तक समीक्षा
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव
नंदीग्राम एक बार फिर चर्चा में है। चुनाव जीतने के लिए सभी सियासी दल नंदीग्राम के 14 साल पुराने उस ज़ख्म को कुरेदने की कोशिश कर रहे हैं, जिस ज़ख्म की कहानी मधु कांकरिया ने अपनी कहानी ‘नंदीग्राम के चूहे’ में लिखी है।

इस कहानी में दीपंकर नाम के किरदार का एक संवाद है,

पहले हमारे बुद्धदेव को स्वप्न में सर्वहारा दिखते थे, अब तेज़ रफ्तार में भागती-दौड़ती बिल्ली दिखती है।…अब इस बिल्ली दौड़ में कुछेक हज़ार चूहे मर भी जाएं तो क्या हर्ज? यह तो ज़माने से ही होता आया है। नंदीग्राम के चूहे क्या कोई अनोखे चूहे हैं? देखना, बिल्ली दौड़ेगी और लाख टके की सस्ती कार में दौड़ेगी। बचे हुए भूखे-नंगे चूहे अपने बिलों में दुबके देखेंगे इस शाही नजारे को। अब चूहों का दु:ख भी भला कोई दु:ख है? दुनिया की कौन सी सियासत का आंचल भीगा है चूहों के इन आंसुओं से?”

चूहों से अभिप्राय उन किसानों से था, जो अपनी ज़मीन को अधिग्रहण से बचाने की जंग लड़ रहे थे। दीपंकर ने जो कहा था, वह नंदीग्राम के मामले में भी सच था और आज 14 साल बाद आंदोलन कर रहे किसानों के संदर्भ में भी सच है। सत्ता भले ही जनता को चूहों से ज्यादा कुछ न समझती हो लेकिन यही चूहे जब एकजुट हो जाते हैं तो बिल्ली की टांग तोड़ देते हैं। दीपंकर की बात पर रेनू ने दी तिलमिलाते हुए कहा भी था, ‘इस बिल्ली की टांग तो हम तोड़ देंगे। बस, जनता जरा सा साथ दे दे।’  

14 मार्च 2007 को नंदीग्राम में जो पुलिसिया कहर बरपा था, उसके बाद देश ने देखा था कि 34 साल की बिल्ली की टांग चूहों ने कैसे तोड़ी थी। यह कहानी केवल नंदीग्राम के किसानों तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि शिबू के माध्यम से उन मज़दूरों तक भी पहुंचती है, जिन्हें उद्योगपति चूहे से ज्यादा कुछ नहीं समझते। सरकार और उद्योगपतियों के नापाक गठबंधन को यह कहानी बड़े ही प्रभावी ढंग से बेनकाब करती है।

बोधि प्रकाशन से हाल ही में आई दस किताबों के सेट में मधु कांकरिया का कहानी संग्रह ‘नंदीग्राम के चूहे’ भी शामिल है। यह कहानी तब जितनी प्रासंगिक थी, आज भी उतनी ही प्रासंगिक है क्योंकि किसान-मज़दूरों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ, बल्कि वक्त के साथ कार्पोरेट के नुकीले दांतों ने सरकारी मदद से उन्हें और ज्यादा लहूलुहान ही किया है।

इस संग्रह की कई कहानियां पहले भी पढ़ी थी लेकिन इन्हें एक बार फिर से पढ़ना कहानियों में दर्ज उस वक्त से फिर से गुजरना है। मेरा स्पष्ट मानना है कि कथाकार अपने समय का सबसे प्रखर पत्रकार और इतिहासकार होता है। वह अपनी रचनाओं में वक्त को संवेदनशीलता के साथ दर्ज करता है। इन कहानियों से गुजरते हुए मेरा यह विश्वास और पुख्ता ही हुआ।

‘नंदीग्राम के चूहे’ के अलावा इस संग्रह में ‘…और अंत में ईशु’, ‘चिड़िया ऐसे मरती है’, ‘कीड़े’, ‘लोड-शेडिंग’, ‘युद्ध और बुद्ध’ कहानियां शामिल हैं।  ‘युद्ध और बुद्ध’ कश्मीर में सेना की यातना की ऐसी खौफ़नाक दास्तान है, जहां एक मां खुद ही अपने बेटे को मरने के लिए सेना के हवाले कर देती है। यह कहानी कई ऐसे सवाल खड़े करता है, जिनके जवाब आज भी नहीं मिले हैं।

ऐसे समय में जब हम विचारधारा के संकट से जूझ रहे हों ‘…और अन्त में ईशु’ जैसी कहानियां महत्वपूर्ण हो जाती हैं। इस संग्रह कहानियां एक तरह से मधु कांकरियां की प्रतिनिध कहानियां ही हैं। इस संग्रह में उनके लेखन की विविधता देखने को मिलती है। चाहें राजनीतिक कहानी हो या पारिवारिक या फिर प्रेम कहानी—मधु जी की हर कहानी अनुभव के एक नए सफर पर ले जाता है। इस नए संग्रह के लिए मधु जी को हार्दिक बधाई।

कहानी संग्रह : नंदीग्राम के चूहे
कथाकार : मधु कांकरिया
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

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