शनि को परास्त करने वाले नायक की कहानी

उपन्यास : प्यार पर टेढ़ी नज़र : शनि
लेखक : पंकज कौरव
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
मूल्य : 199 रुपए

 

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

ज़िन्दगी में कामयाबी के लिए क्या चाहिए? मेहनत, किस्मत या दोनों? हर आदमी की ज़िन्दगी में कभी-कभी ऐसा पड़ाव आता है, जब वह खुद से यह सवाल पूछता है। उसे लगने लगता है कि सिर्फ़ मेहनत से कुछ नहीं होता, अच्छी किस्मत होना भी जरूरी है। जब इस बात पर उसे पक्का यकीन हो जाता है तब वह एस्ट्रोलॉजी की शरण में जाता है। उंगली पर रत्न जड़ित अंगुठियों की संख्या बढ़ने लगती है लेकिन क्या इससे वाकई उसकी किस्मत चमक जाती है? ऐसे ही सवालों की पड़ताल करती है युवा कथाकार-उपन्यासकार पंकज कौरव का उपन्यास ‘प्यार पर टेढ़ी नज़र : शनि’।
मुझे नहीं पता कि ज्योतिष विद्या को केंद्र में रखकर इससे पहले हिन्दी में कोई उपन्यास लिखा गया है या नहीं? दरअसल यह ऐसी विद्या है, जिस पर लोग भरोसा तो खूब करते हैं लेकिन सार्वजनिक रुप से इसका इजहार नहीं करते, इसलिए साहित्य में यह विषय खुलकर नहीं आया। पंकज ने इस विषय को चुना, इसलिए वह बधाई के पात्र हैं क्योंकि मेरा यह मानना है कि साहित्य में वह सबकुछ आना ही चाहिए, जो समाज में विद्यमान है।

उपन्यास का नायक नीरव अपने करियर के उस पड़ाव पर है, जहां उसे मनचाही कामयाबी नहीं मिल रही। काबिल है, मेहनत करता है लेकिन जो तरक्की उसे मिलनी चाहिए, नहीं मिलती। उसका बॉस रघु न केवल तरक्की करता है बल्कि उसे एक और बड़ी कंपनी में अच्छी नौकरी मिल जाती है। इस खुशी में होने वाली पार्टी में ही यह खुलासा होता है कि उसकी तरक्की के पीछे उन अंगूठियों की भी बड़ी भूमिका है, जो उसने अपनी उंगलियों में धारण कर रखी है। यहीं से नीरव का झुकाव एस्ट्रोलॉजी की ओर होता है। ज्योतिष उसकी कुंडल बांचता है और कुछ ऐसी बातें बताता है कि उसे पूरा भरोसा हो जाता है कि केवल मेहनत से कुछ नहीं होने वाला। ग्रहों को को अपने अनुकूल करना जरूरी है। इसके लिए वह पिता के एकाउंट से एक लाख रुपए निकाल कर रत्न जड़ित अंगूठियां बनवाता है।

इसके बाद मंगल-शनि के चक्कर में वह ऐसा फंसता है कि चीजें उसके कंट्रोल से बाहर निकलती जाती हैं। ज्योतिषी के चक्कर में वह अपनी निजी और प्रोफेशनल ज़िन्दगी से खिलवाड़ भी करता है। वह उस अर्पिता से एक झटके में ब्रेकअप कर लेता है, जो सच्चे मन से उसे प्यार करती है। ऐसा वह ज्योतिषी के कहने पर कहता है। मेहनत तो वह पहले की तरह ही करता है लेकिन उसे इस बात पर पूरा भरोसा हो जाता है कि भाग्योदय शनि-मंगल के हाथ में ही है। ग्रह नक्षत्र चाहेंगे तो प्यार मिलेगा, तरक्की मिलेगी, ज़िन्दगी सुधर जाएगी। पूरा उपन्यास उसके इसी पागलपन के इर्दगिर्द घूमता है।

नीरव अपने पिता को पसंद नहीं करता। यूं कहें कि नफरत करता है लेकिन इस संबंध को पंकज इस अंजाम तक ले जाते हैं, वह इस उपन्यास को एक अलग भावनात्मक ऊंचाई देता है। केतन जैसे पिता के किरदार को पंकज ने बहुत ही प्रभावी ढंग से उकेरा है।

कहानी कहने का पंकज का अंदाज़ पसंद आता है। एक बार उपन्यास पढ़ना शुरू करेंगे तो छोड़ नहीं पाएंगे। यह शिल्प पर उनकी पकड़ का सबूत है। भाषा के मामले में भी वह बहुत समृद्ध नज़र आते हैं। कहानी के किरदार आईटी प्रोफेशन्लस हैं तो उनकी भाषा भी उसी के मुताबिक है। एक बानगी देखिए, ‘काश कि दिमाग भी कंप्यूटर होता, कोई प्रोग्राम ठीक परफॉर्म न करे तो उसे अबर्ट करना सम्भव होता…या फिर किसी एप्लिकेशन की तरह रिलेशनशिप में कॉम्प्लीकेशन आने पर उसे अन-इंस्टाल किया जा सकता।’पिता के प्रेम में प्रेम पत्र है तो बेटे के प्रेम में व्हाट्सअप मैसेज है।
बदलते वक्त के साथ प्रेम के बदलते अंदाज़ का भी अच्छा चित्रण है।

हां, एक बात और। यह उपन्यास न तो एस्ट्रोलॉजी को नीचा दिखाती है, न ही उसका महिमामंडन करती है। आदमी को मंजिल मेहनत से ही मिल सकती है, पंकज इस उपन्यास के जरिए यही संदेश देते हैं। उपन्यास का नायक अन्तत: शनि को परास्त कर ही देता है।
यह पंकज का पहला उपन्यास है। ‘होनहार बीरवान के होत हैं चिकने पात’ इसलिए इस उपन्यास को पढ़ने के बाद कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में पंकज की कलम हिन्दी साहित्य को और समृद्ध करेगी।

 

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