ग़ज़ल का क़द मनुष्यता से तो ऊँचा नहीं

ओम निश्चल

हिंदी के सुपरिचित कवि, गीतकार एवं आलोचक। ‘शब्‍द सक्रिय हैं'(कविता संग्रह) एवं ‘शब्‍दों से गपशप'(आलोचना), 

‘भाषा की खादी'(निबंध) सहित भाषा व आलोचना-समीक्षा की अनेक कृतियां प्रकाशित। अज्ञेय सहित कई कवियों के कविता-चयन, अधुनांतिक बांग्ला कविता एवं कुंवर नारायण पर केंद्रित आलोचनात्‍मक पुस्‍तक ‘अन्‍वय’ एवं ‘अन्‍विति’ का संपादन। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल आलोचना पुरस्‍कार से सम्‍मानित।

संपर्क: डॉ ओम निश्‍चल,  जी 1/506 ए, उत्‍तम नगर नई दिल्‍ली-110059

फोन 8447289976

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‘दूर घर नहीं हुआ’ के बहाने एक रम्‍य चर्चा

इक नदी बहने लगी गाती हुई भीतर मेरे,

यह महीना जेठ का मेरे लिए सावन हुआ।

कभी नीरज ने लिखा था, ”मैंने तो सोचा था अपनी सारी उमर तुम्‍हें दे दूँगा। इतनी दूर मगर थी मंजिल चलते चलते शाम हो गयी।” नीरज का यह सोचा कितना सार्थक हुआ वे जानें पर रामदरश मिश्र ने इसे सच कर दिखाया है। उम्र हो गयी उन्‍हें लिखते पढ़ते हुए। हर साल कुछ किताबें। हर साल कुछ नए मसौदे। हर वक्‍त किसी न किसी परियोजना में डूबे रहना और राइटिंग पैड पर कुछ न कुछ लिखते रहना उनकी आदत में शुमार है। हिंदी जगत को उन्‍होंने सारी उम्र दे दी।  मैं जब जब जाता हूँ, वे अपनी ताज़ा गजलें सुनाते हैं। कभी वाणी विहार में कई लेखक रहते थे, कुछ बाहर चले गए, कुछ इहलोक से विदा हो गए। सरस्‍वती के वरदपुत्रों में अब केवल वे और रमाकांत शुक्‍ल हैं जिनकी ख्‍याति दूर दूर तक फैली है। हिंदी में रामदरश मिश्र, संस्‍कृत में रमाकांत शुक्‍ल। लोग आए दिन अपने ऊपर लिखी जा रही पीएचडी से हुलसित हो उठते हैं, उसे चर्चा का विषय बनाते हैं। रामदरश मिश्र के ऊपर जहां तक मैं समझता हूँ, हिंदी के लेखकों में प्रेमचंद के बाद सबसे ज्‍यादा शोध प्रबंध लिखे गए हैं। मैंने एक दिन सहसा पूछा तो बोले, ”हां होंगे कोई पौने चार सौ के लगभग” और उनकी खुद की अस्‍सी से ज्‍यादा किताबें विभिन्‍न विधाओं में ।

अभी हाल में उनके यहां जाना हुआ तो कहने लगे ग़ज़लों की नई किताब आई है : दूर घर नहीं हुआ । तुम्‍हें देनी है। जनवरी से इंतजार कर रहे थे कि प्रकाशक प्रतियां भेजें तो वे अपने प्रियजनों को दें। वह मौका अब आया। उनकी दी हुई अनेक पुस्‍तकें मेरे संग्रह में हैं। उनकी कविताओं पर बहुधा लिखा है, कहानियों और एकाधिक उपन्‍यासों पर भी। पर मानता उन्‍हें मूलत: कवि ही हूँ। उनका स्‍वभाव कवि का ही है। कोई आया तो उसकी आवभगत में खो गए। पत्‍नी सरस्‍वती झट से चाट बिस्‍कुट लिए हाजिर। मेरे लिए तो विशेष ही। फिर चर्चा आरंभ हो तो थमने का नाम नहीं लेती। वे बोलते हैं तो लगता है साहित्‍य की एक सदी बोल रही है। कभी अपने संस्मरणों को उन्‍होंने सहचर है समय नाम दिया था। सच ही है। वे समय के सहचर हैं। विगत और इस सदी के कंधे पर हाथ रख कर साथ साथ चलते हुए। कई लोग इस बात की बड़ी नोटिस लेते हैं कि फलां ने मेरे ऊपर नहीं लिखा । रामदरश जी ने इसकी परवाह नहीं की। अपने समय के बड़े से बड़े आलोचकों के साथ रहे। आचार्य द्विवेदी जी के शिष्‍य रहे पर लिखने के लिए कभी याचना या जोडतोड़ नहीं की। छोटे बड़े सबको अपनी किताबें भेंट करते पर किसी प्रत्‍याशा से नहीं। एक दिन मैंनेपूछा डा साब , नामवर जी ने आपकेबारे में कुछ लिखा है क्‍या। बोले नहीं तो। फिर आपने तो उन पर कई कई लेख लिखे हैं। बहुवचन के नामवर सिंह केंद्रित अंक में तभी ताजा ताजा उनका आलेख आया था। वे बोले नामवर हमारे समय के एक बड़े सुपठित आलोचक हैं, वे लिखें न लिखें यह उनका मामला है। पर मुझसे किसी ने आग्रहवश कहा तो मैंने कहा जरूर लिखूंगा। और देखिए वे नहीं रहे तो उस दिन बहुत उदास हो गए। मिलने पर उसकी छाया उनके चेहरे पर देखी जा सकती थी। सामने अखबार पड़ा था और नामवर जी पर बहुत प्‍यारा मार्मिक वक्‍तव्‍य उसमें छपा था। मुझे एक शेर याद हो आया : उनका जो काम वो अहले सियासत जाने/ अपना पैगाम मुहब्‍बत है जहां तक पहुंचे।

इस बार जब उनका गजल संग्रह दूर घर नही हुआ—उलटा पलटा तो वे बहुत सारी शामें अचानक याद हो आईं जब उन्‍होंने इस पुस्‍तक की कई गजलें सुनाई हैं। आज उन गजलों से गुजर रहा हूँ तो लगता है बीता हुआ समय सामने ठिठक कर खड़ा हो गया है और वे गजल सुना रहे हैं —

पास तुम आए तो कीचड़ में कमल सा मन हुआ

लग रहा है आज सारा जग मेरा दर्पण  हुआ।

इक नदी बहने लगी गाती हुए भीतर मेरे

यह महीना जेठ का मेरे लिए सावन हुआ।

मुझे निराला याद हो आए। आज मन पावन हुआ है। जेठ में सावन हुआ है। आतिथ्‍य के लिए सदैव समुत्‍सुक रहने वाले रामदरश मिश्र 96 की इस वय में भी वक्‍त के मिजाज को शब्‍दों में उकेरते रहते हैं। बड़े उपन्‍यास या कहानियां तो अब करघे पर नहीं छेड़े जा सकते , पर कविताएं और गजलें तो लिखी ही जा सकती हैं। सो गजल, गीत और कविताओं का करघा कभी बंद नही होता। वे अक्‍सर किसी न किसी काफिए रदीफ की खोज में व्‍यग्र होते हैं । कोई गजल पूरी हो चुकी होती है कोई अधूरी अपने काफिए रदीफ के इंतजार में। किसी न किसी गीत की टेर उन्‍हें गुहारती रहती है कि मुझे पूरा करो। किसी गीत का स्‍थायी उन्‍हें एकाग्र किए रहता है कि इसे पूरा करो। अभी कल ही कह रहे थे, एक गीतों की किताब भी बन रही है। बहुत से नए गीत इकट्ठे हो गए हैं। आज जहां नई कविता के नशे में लोग अपनी छंद परंपरा को भुला बैठे, वे गाहे ब गाहे छंद का आवाहन करते रहते हैं। नई कविता ने कभी गीत का दामन नहीं छोड़ा पर आलोचकों ने ही गीत को नई कविता के नक्‍शे से काट कर कविता का आंगन छोटा कर दिया। पर किसी सच्‍चे कवि के लिए क्‍या गीत क्‍या नई कविता —सब रूप और अंतर्वस्‍तु का मामला है। छंद लिख कर तुलसी, सूर, कबीर, निराला, त्रिलोचन, नागर्जुन अमर हो गए, लोगों के कंठ में उनके लिखे की स्‍मृति है, नए कवियों को खुद ही अपनी कविता याद नहीं होती। किसी सभा समारोह में अपनी एक भी पूरी कविता वे सुना नहीं पाते। पर रामदरश जी को छेड भर दीजिए उनकी स्‍मृति लहलहा उठती है। गीतों गजलों के लच्‍छे के लच्‍छे खुलते जाते हैं।

दूर घर नहीं हुआ –पुस्‍तक में 43 नई गजलें हैं जो उन्‍होंने गजलों के समर्थ हस्‍ताक्षर वशिष्‍ठ अनूप को भेंट की है। कहते हैं ”अच्‍छी गजलों की भीड़ में इनकी जगह कहां है, है कि नहीं, मैं नहींकह सकता, किन्‍तु ये मेरी अपनी हैं, इनका अपनापन है, यह बोध तो मुझे सुख देता ही है। ” एक से एक अच्‍छी गजलें इनमें हैं। उनके उत्‍तर जीवन की संवेदना भी इनमें समाई है। इनसे गुजरते हुए लगता है कि जीवन के सभी रस इनमें समाहित हैं। एक वक्‍त था, उनके गजल का यह शेर इतना पापुलर हुआ कि लोगों की जबान पर रहता है। इस किताब से कुछ अशआर मैंने चुने हैं —

था गांव में तो देखता था शहर का सपना

लगा पुकारने सा गांव जब शहर आया ।

मेरी अजीज जिन्‍दगी मुझे दे अब आराम

मुझे दिए थे काम जो – जो वे मैं कर आया।

गजलों में उनके मन की भी बहुत सारी बातें हैं। कितने मित्र दोस्‍त थे सब एक एक कर चले गए। जो बचे हैं उनसे अक्‍सर मिलना जुलना नहीं होता। उम्र इजाजत नहीं देती। इसलिए कुछ अकेलापन सा लगता है और वे कह ही उठतेहैं —

नहीं कोई साथी नहीं कोई चेला

चला जा रहा वह अकेला अकेला।

मुहब्‍बत मिली तो गया भींग उसमें

उदासीनता को भी हँस हँस के झेला।

वो है चाहता –मैं रहूँ न  रहूँ पर

रहे जगमगाता  जमाने में मेला। 

कितने लोग जो कभी हुलस कर मिलते थे, वे नहीं आते। मुझे किसी शायर का कहा याद आता है। जो भी मिलता है न मिलने की तरह मिलता है/ कोई तो आ के कभी मिलने मिलाने आए। रामदरश जी इस भाव को कुछ इस तरह उठाते हैं —

कल तलक था अब रहा नाता नहीं

अब कोई आता नहीं, जाता नहीं।

आऊँगा आऊँगा  इक दिन ले खुशी

वक्‍त है कहता रहा,  आता नहीं।

बढ़ती उम्र के साथ अकेलापन बढ़ता है। यों तो उनसे सरस्‍वती जी बोलती बतियाती रहती है पर लेखक तो अंतत: अकेला ही होता है। कभी उन्‍हें यही प्रतीत होता है:  आज मैं घर में अकेला हो गया हूँ/ जग रहा हूँ किन्‍तु लगता सो गया हूँ।

यों तो इसकी बहुत सी गजलों के तमाम शेर बहुत अच्‍छे हैं तो कुछ सामान्‍य भी। पर जो बात इनमें महत्‍वपूर्ण है वह यह कि इनमें मनुष्‍यता का एक नैतिक प्रतिकथन समाया हुआ है। एक ऐसी ही गजल उन्‍होंने पिछली एक मुलाकात में सुनाई थी, वह मेरे सामने है :

मनुष्‍य है ,मनुष्‍यता के हक में तू विचार कर

मनुष्‍य, पशु पखेरुओं लता द्रुमों से प्‍यार कर।

वतन है दे रहा तुझे न जाने क्‍या क्‍या बाखुशी

खुशी के वास्‍ते वतन की तू भी कुछ निसार कर।

मनुज मनुज के बीच धर्म भीत है तो तोड़ दे

अगर है ये गुनाह तो गुनाह बार बार कर ।

अब गजल कितनी भी अच्‍छी हो, उसका कद मनुष्‍यता से ऊँचा तो हो नहीं सकता । इसीलिए कभी कुंवर नारायणने कहा था अब की लौटा तो मनुष्‍यतर लौटूँगा, कृतज्ञतर लौटूँगा। ये ग़ज़लें, सच कहें तो आदमी को मनुष्‍य बनने की सीख देती हैं। रामदरश मिश्र ने वकत्‍ को बहुत करीब से देखा है। आधुनिकता को सत्‍वर गति से आते हुए देखा है और अब बाजार को घरों में घुसते देख रहे हैं । पर उनकी सादगी  बाजार के प्रलोभन से विचलित नहीं होती। उनके जीने का ढंग निराला है। सबके साथ हँसी लुटाने की यह आदत शायद उन्‍होंने पंडितजी से पाई है। शिरीष के फूल की तरह सुगंध बॉंटते रहना। मुझे सहसा बशीर बद्र याद हो आए हैं — यों तो हम देने के काबिल ही कहां हैं लेकिन। हॉं कोई चाहे तो जीन की अदा ले जाए। उनसे मिल कर वास्‍तव में जीने की अदा सीखी जा सकती है।

दूर घर नहीं हुआ—चाहे जो अर्थ देता हो, उनका घर मेरे घर से कतई दूर नहीं है और मुझे सौभाग्‍य हासिल है कि उनकी एक पुकार पर पांच मिनट में उनके पास पहुंच सकता हूँ।

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दूर घर नहीं हुआ का प्रकाशन ईशा ज्ञानदीप, नई दिल्‍ली (9350544790) ने किया है। सजिल्‍द संस्‍करण की कीमत 175 रुपये है।

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