यादों का खूबसूरत कैनवास

पुस्तक समीक्षा

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

‘रवि मेरे लिए जीते-जी एक लंबी प्रेम कहानी थे। अब तो वे कथा अनन्ता बन गए हैं।’  वाणी प्रकाशन से सद्य प्रकाशित ‘अन्दाज-ए-बयां उर्फ़ रवि कथा’ में ममता कालिया ने एक जगह यह बात लिखी है। यह पुस्तक रवींद्र कालिया की इन्हीं अनन्त कथाओं में से कुछ को हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। यह जीवनी नहीं है। यादों का एक खूबसूरत कैनवास है, जहां रवींद्र कालिया-ममता कालिया की ज़िन्दगी के हर रंग बिखरे पड़े हैं। यहां सुख भी है, दुख भी, संघर्ष है तो सफलता भी, झगड़ा है तो वह असीम प्रेम भी, जो अन्तत: हर कठिनाइयों-चुनौतियों पर भारी पड़ता है।

इस संस्मरण से कथाकार रवींद्र कालिया के साथ साथ व्यक्ति रवींद्र कालिया को भी जानने-समझने में मदद मिलती है। एक व्यक्ति जो दिलदार था, दूसरों की मदद करते वक्त अपने हित-अहित तक की परवाह नहीं करता था। एक व्यक्ति को जिद्दी था, जब गुस्सा आता था तो किसी की नहीं सुनता था।  एक व्यक्ति जो अपनी धुन का पक्का था और दुनिया को ठोकरों पर रखते हुए अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जीता था। यहां तक कि बीमारी को भी अपने तरीके से ही डील किया। रवींद्र जी का यही तेवर उनकी कहानियों में भी तो दिखता है। यह किताब उनकी ज़िन्दगी और लेखन दोनों के समझने में मदद  करती है।

संस्मरण लिखना चुनौती भरा काम है। यह सिर्फ यादों के गलियारों में वापस ही नहीं ले जाता, बल्कि कई ऐसे सच से दोबारा रूबरू करता है, जिसे सार्वजनिक करना सबके बूते की बात नहीं। सच लिखने में ममता जी की कलम झिझकी नहीं है। उन्होंने रवींद्र कालिया को महामानव के रूप में दिखाने की कोशिश बिल्कुल नहीं की है। वो जैसे थे, वैसा ही दिखाया है। ममता जी ने उनकी खासियतों का जिक्र किया है तो उनकी खामियों को भी नहीं छिपाया। यहां तक कि एक जगह तो उन्होंने रवींद्र जी को ‘भक्त संपादक’ भी लिखा है। कृष्णा सोबती से जुड़ा यह प्रसंग वाकई दिल को ठेस पहुंचाता है। ‘मैंने मांडू नही देखा’ में स्वदेश दीपक ने भी कृष्णा सोबती के बारे में ऐसे ही कड़वे अनुभवों का जिक्र किया है।

रवि-कथा हंसाती है, रूलाती है। ममता जी के लिखने का अंदाज ऐसा कि जब रवींद्र कालिया खुश होते हैं तो पाठक भी  खुश होता है, जब वो हर फिक्र को सिगरेट के धुएं में उड़ाते है  तो उनकी जीजिविषा के कायल हो जाते हैं, जब वो दुखी होते हैं तो पाठक का दिल भी बैठा जाता है। रवींद्र जी के जाने के बाद ममता जी ने अपने एकान्त का जो वर्णन किया है, वो कचोट पैदा करता है। आशुतोष की कविता मानों उनके दर्द को शब्द देते है। उन्होंने किताब में इस कविता को उद्धृत किया है।

एक दिन मैं सीख लूंगा

तुम्हारे बिना रहना

एक दिन दुख भी नहीं बचेगा

दुख की एक पुरानी पड़ती याद रह जाएगी

जैसा भी होगा जीवन हमें सोख लेगा.

ममता जी ने रवींद्र जी को याद करते हुए अद्भुत संस्मरण लिखा है। अपनी कहानियों में रवींद्र  जी हमेशा अमर रहेंगे तो इस किताब में हमेशा जीवन्त रूप में मौजूद रहेंगे। वाणी प्रकाशन से छपी यह किताब अमेजन पर उपलब्ध है

अन्दाज़-ए-बयां उर्फ़ रवि कथा

ममता कालिया

प्रकाशक -वाणी प्रकाशन

मूल्य : 395 रुपए

1 Response

  1. Stuti rai says:

    बहुत अच्छी समीक्षा की गई है।

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