सामाजिक विषमताओं पर प्रहार करती कविताएं

डॉ कृष्णकान्त द्विवेदी

देश व प्रदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में  आलेख,कविताएँ व साक्षात्कार निरन्तर  प्रकाशित होते रहते हैं। आजकल, उत्तर प्रदेश, साहित्य अमृत जैसी प्रमुख पत्रिकाओं में   प्रकाशन।

   सम्प्रति-:
            सहायक प्रोफेसर    ( हिंदी)
पं.सुंदरलाल मेमोरियल परास्नातक महाविद्यालय,कन्नौज   (उ प्र)

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पुस्तक समीक्षा

कविता संग्रह- तो सुनो
रचनाकार- शिव कुशवाहा
प्रकाशन- रश्मि प्रकाशन , लखनऊ
मूल्य- 150

डॉ.कृष्ण कान्त द्विवेदी

परिस्थितियों से टकराने और संघर्ष से प्राप्त सुखद व दुखद अनुभूतियों से कवि मन आंदोलित होता है। एक सामाजिक व्यवस्था को परिवर्तित करने के लिए प्रेरित होता है। कवि उन अनुभूतियों को अपने अंत:करण में  ही छिपाकर नहीं जीना चाहता है। वह उन्हें सार्वजनिक कर जन-जन तक पहुंचाना चाहता है। 

युवा कवि शिव कुशवाहा इन अनुभूतियों को सीधा पाठकों के सामने नहीं रखते, बल्कि परिवेश के यथार्थ तथा परिस्थितियों को उनकी यथार्थवादिता के साथ चुनौती के रूप में  प्रस्तुत करते हैं, जिससे जन-साधारण से भी अति जन-साधारण पाठक उन चुनौतियों को समझ सके, जान सके और सामाजिक विषमताओं पर प्रहार करतीं कविताओं के साथ खड़े होकर समृद्ध वर्ग के खिलाफ अपनी आवाज को बुलंद कर अपनी ताकत का अनुभव कराने में समर्थ हो सके। शायद यही उद्देश्य है कवि और उसकी कविता का। 

हिंदी कविता के युवा हस्ताक्षर शिव कुशवाहा का पहला कविता संग्रह – ‘तो सुनो ‘ (2019) रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित होकर पाठक के बीच पहुँच रहा है। 51 कविताओं से सुसज्जित संग्रह सामाजिक विषमताओं व जन – साधारण के प्रति  कवि मन की अतिशय संवेदनशीलता इन कविताओं में  खूब देखने को मिलती है। वैसे भी कविता देश, समाज और व्यक्ति के लिए आईना होती है। कवि उस आईने का निर्माता होता है। कवि शिव कुशवाहा ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज के शोषित, उपेक्षित व गरीब वर्ग की वेदनात्मक जिंदगी को बहुत करीब से अनुभव करते हुए व्यक्त किया है। 
सामाजिक असंतुलन, विसंगतिपूर्ण सामाजिक ढाँचा, विडम्बनाओं, रूढ़ियों और जातीय प्रपंचों से शायद ही कोई समकालीन रचनाकार बच पाया हो। सभी ने इन परिस्थितियों पर खूब लिखा है और वर्तमान में भी ये परिस्थितियाँ कवियों की प्रमुखता बनकर वर्णित हो रहे हैं। ‘तो सुनो’ की कविताएँ इन सबसे अछूती नहीं रह पाईं हैं। 
व्यवस्थाओं और सत्ता से संघर्ष करने के लिए वातावरण में व्याप्त विसंगतियों, विद्रूपताओं  को दूर करने के लिए, नये मूल्यों एंव नये समाज की स्थापना के लिए कवि कविता को औजार के रूप में प्रयोग कर जन-मन में विश्वास पैदा करना चाहता है।  कवि पूर्ण रूप से आश्वस्त है  कि कविता ही एक ऐसा माध्यम है, जिससे सामाजिक विषमताओं को बदला जा सकता है । संग्रह की पहली कविता -‘संकल्प ‘ में कवि अपनी प्रतिज्ञा को व्यक्त करते हुए समाज के सबसे महत्वपूर्ण वर्ग के प्रति अपनी संवेदना ज़ाहिर करता है- 

“संकल्प जो
विषम परिस्थितियों में भी 
साथ नहीं  छोड़ता 
अन्नदाता है वह
जो भरता है पेट
देश के सभी जन का
नहीं करते भेद
अमीर-गरीब का
बनाते हुए श्रम -कण
करते हैं मनुजता का पोषण। 
                       (कविता -संकल्प,पृ०१२)

कवि शिव कुशवाहा की कविताओं की दुनिया  वी. आई. पी. कल्चर से दूर एक आम आदमी के दुखों से रची-बसी है क्योंकि वे स्वयं आम आदमी  के बीच ही हँसते हैं, रोते हैं, गाते हैं और थिरकते भी हैं। आज इक्कीसवीं सदी में  जहाँ हम यह ढिठोरा पीटने में लगे हैं कि अब सबको मिलने लगा समान अधिकार। अब कोई नहीं सोता भूखे पेट न ही कोई सोता फुटपाथ पर। सबको सब कुछ मिलने लगा है। किंतु कवि मन अब भी ऐसी जमात की भीड़ में खड़ा है जो आज भी अपने अस्तित्व की तलाश के लिए संघर्ष करता है। ‘मिट्टी का रंग’ कविता अस्तित्व तलाशने वाले लोगों की अंतर्भावना को शब्द देने का प्रयास करता है-

“मिट्टी पर अंकित 
कुछ अंगुलियों के निशान 
कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएं
खींच देने वाली अंगुलियाँ 
पहचान चुकी हैं
मिट्टी का रंग। “
               (कविता -मिट्टी का रंग, पृ०१५) 

‘समय रथ’ में कवि उपेक्षित समाज की उन्नति की कामना करते हुए एकलव्य को प्रतिनिधि बनाते हुए लिखता है –

“अपराजित
हो रहे युद्ध में
जब छल की भाषा ही
बन जाए  युग की प्रतिष्ठा
द्रोण हाँफने लगे
समय-रथ के पहियों को 
घुमाते-घुमाते
वक्त का पहिया
आकर ठहर गया है
इस दौर में 
जहाँ  एकलव्य 
समय से आगे निकलकर
दो-दो हाथ करने को तैयार।”
                 (कविता -समय रथ, पृ०१६) 

‘दो मुँहे’ , ‘हाशिए पर खड़े लोग’, ‘पहचान का संकट’ कविताएँ भी इसी भावभूमि पर लिखी गई हैं। एक बात कहना आवश्यक है कि एकलव्य किसी जाति या धर्म  का प्रतिनिधि नहीं है बल्कि वह उपेक्षित वर्ग का नायक है। 
कवि शिव कुशवाहा आक्रोशित हैं समाज के उस वर्ग के प्रति जो ढोंगी संतों पर अंधविश्वास कर अंधश्रद्धा को जन्म ही नहीं देते बल्कि उसके प्रति लोगों को आसक्त होने के लिए प्रेरित भी करते हैं। ‘नपुंसक श्रद्धा’ कविता में कवि ने तत्कालीन समय में कुछ तथाकथित संत समाज द्वारा घटित घटनाओं से आहत होकर अपनी चिंता व्यक्त की है।

“बाबाओं की तिलिस्मी दुनिया ने
झोंक दिया है समाज को
गहरी अंधेरी खाई में
समाज पिस रहा है 
दो पाटों के मध्य
अंधभक्ति का मायाजाल 
और नपुंसक श्रद्धा से पिसते लोग
भक्त और भक्ति के बीच
उतरा है चमत्कार
बधिया कर दी बुद्धि में 
ईश्वर छूट जाता है  पीछे
आ जाता है बाबाओं का छवि चित्र 
वे घोषित कर लेते हैं स्वयं को 
ईश्वर का अवतारी। “
              (कविता -नपुंसक श्रद्धा, पृ०२७) 

मेरा मानना है कि इस तरह की परिस्थितियों के लिए जन-साधारण भी कुछ कम दोषी नहीं है। वह भी कर्म पर विश्वास न करके ईश्वरीय चमत्कार पर आश्रित हो जाता है। आश्रित होना ही हमें कर्महीन और नपुंसक बना देता है। 
आजादी के पहले और बाद में  कोई ज्यादा बदलाव नहीं आया क्योंकि गरीब तो गरीब ही बनकर रह गया। पूँजीवादी व्यवस्था अर्थहीन और शोषित वर्ग के अस्तित्व को लगातार हाशिए पर ढकेलते जा रहा है। उपेक्षित वर्ग को हर युग में  सिर्फ इस्तेमाल किया गया है। काम होने के बाद कहाँ कोई उन्हें ढूँढता है। कवि तभी तो समाज के सर्वहारा वर्ग को जागरूक करते हुए लिखता है-

“जब तुम खोजोगे  
अपने पुरखों का वजूद
इतिहास के अंकित पन्नों में
तब तुम पाओगे
अपने पुरखों को इस
इतिहास से गायब।” 
              (कविता – पुरखों का वजूद, पृ०२९)

सामाजिक विषमताओं के दंश को कवि ने स्वयं झेला है इसलिए कवि के अंतःकरण में जबरदस्त उबाल है और वही आक्रोशित उबाल कविताओं में फूटा है। ‘नवल विहान’,  ‘पाखंड विसर्जन’,  ‘मसि की अंतिम बूंद’,  ‘कागज कोरे नहीं होते’,  ‘स्याह होती उम्मीदें ‘, ‘मानवता का रुदन’, ‘यह युद्ध’, ‘ईश्वर कैद हो’,  ‘अछूत’, ‘अपहृत संविधान’,  ‘दम तोड़ती रोशनाई’, और ‘घोषणापत्र’ जैसी प्रमुख कविताएँ सामाजिक विषमताओं व सामाजिक वर्ण व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं। 
कवि का विश्वास है कि हम पुरातन परंपराओं को ढोते हुए या उनमें बंधकर नहीं चल सकते हैं। ‘तिरस्कार’ कविता में कवि ने पुरानी परंपराओं  और संस्कृतियों के आवरण को एक विशेष वर्ग के खिलाफ साजिश मानते हुए उन्हें नष्ट करने का प्रण लिया है। जैसा कि वह लिखता है-

“किस षड्यंत्र के तहत
दी गयीं उन्हें 
अमानवीय यातनाएँ
क्यों डाला गया
उनके कान में
पिघलता हुआ शीशा
मानव-मानव समान हैं
फिर क्यों
तूने बनाया 
किसी को जन्मजात ऊँचा
और किसी को नीचा।” 
                 (कविता – तिरस्कार, पृ०८५)

कवि शिव कुशवाहा वर्तमान कविता के क्षेत्र में उभरते हुए हस्ताक्षर हैं। उनका ‘तो सुनो’ कविता संग्रह सामाजिक विषमताओं और आर्थिक विपन्नताओं की मार खा रहे वर्ग की पीड़ा को व्यक्त करने वाला महत्वपूर्ण संग्रह है। इस संग्रह की कविताएँ इस दृष्टि से भी अधिक परिपक्व हैं क्योंकि कविता के साधारण शब्द भी कहीं गहरे जाकर मर्म को छूने लगते हैं और पाठक वर्ग उसमें डूबने-खोने लगता है। 

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