दुष्प्रचारों से नहीं दब सकता गांधी का सत्य

पुस्तक समीक्षा
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

गांधी के देश में गोडसे की पूजा होने लगे, तो खुद से यह सवाल पूछना ही चाहिए कि गांधी की विरासत को संभालने में हमसे कहां चूक हो गई? गांधी को जितना समझा है, उससे मैं यह अनुमान लगा सकता हूं कि अगर आज वो जिन्दा होते तो उन्हें शायद ही गोडसे की पूजा पर कोई आपत्ति होती लेकिन चूंकि गांधी जीवित नहीं हैं, इसलिए उनके हत्यारों की पूजा और महिमामंडन पर देश को चिंतित होना ही चाहिए क्योंकि यह सच को लगातार विकृत करने और इतिहास को झूठ का पुलिंदा बनाने की जघन्य कोशिशों का नतीजा है।

गांधी के हत्यारों को गांधी से डर लगता था। सांप्रदायिकता और धर्म के नाम पर समाज को बांटने के उनके एजेंडे की राह में गांधी ही सबसे बड़ी बाधा थे। उनकी तीन गोलियों ने गांधी के शरीर को तो धराशायी कर दिया लेकिन उनके विचार और मजबूती के साथ नफरत की राजनीति करने वालों की राह में खड़े हो गए। गोडसे के उत्तराधिकारियों को गांधी के विचार जीवित गांधी से भी ज्यादा खतरनाक दिख रहे हैं। इसलिए उन्होंने झूठ को सच साबित करने के लिए दुष्प्रचार का ऐसा अभियान शुरू किया, जिसका व्यापक असर युवा पीढ़ी के एक बहुत बड़े हिस्से पर दिख रहा है। इन्हीं दुष्प्रचारों की काट है अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘उसने गांधी को क्यों मारा’।

‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ और सोशल मीडिया के दूसरे प्लेटफॉर्म पर गांधी के नाम पर दुष्प्रचार आज भी बदस्तूर जारी है। मसलन गांधी विभाजन के लिए जिम्मेदार थे, गांधी ने भगत सिंह को फांसी से नहीं बचाया, गांधी ने सरदार पटेल की जगह नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया, गांधी ने जबरन पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाए। गांधी को खलनायक साबित करने के लिए गोडसे के उत्तराधिकारियों के पास झूठ की एक लंबी सूची है। गोडसे को महान साबित करने के लिए गांधी को बदनाम करने के अलावा और कोई उपाय उनके पास नहीं है। ‘एक ही झूठ को बार-बार कहो तो वह सच मान लिया जाता है’ की तर्ज पर यह झूठ वर्षों से इतनी बार दोहराया गया है कि एक पूरी पीढ़ी का बहुत बड़ा हिस्सा इन्हें सच मानने लगी है। इसकी वजह यह भी है कि सच बिखरा हुआ था और बताने वाला भी कोई नहीं था।

इन बिखरे सच को ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ में अशोक कुमार पांडेय ने एकत्र किया है। एक ही जगह सारे तथ्य। सिलसिलेवार ढंग से। कोई हवाबाजी नहीं। झूठ को सबूत की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन सच को सबूत पेश करना पड़ता है। अशोक ने गांधी पर लगे आरोपों को सबूतों के साथ गलत साबित किया है। इस किताब को लिखने के लिए अशोक ने कितनी मेहनत की है, यह इसी बात से साफ हो जाता है कि संदर्भ ग्रंथों और पुस्तकों की सूची का ब्यौरा छापने में ही 29 पन्ने लग गए। अशोक ने गांधी की हत्या की साजिश के पीछे की वजहों, उसकी पृष्ठभूमि और गांधी के नाम झूठी बातों के प्रचार की कातिलों की मजबूरी की विस्तार से पड़ताल की है। अलग से एक खंड में एक-एक कर उन झूठे आरोपों का पर्दाफाश किया है, जो गांधी पर लगाए जाते हैं।

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के चलते जिन दिमागों में गांधी को लेकर भ्रम के जाले फैले हुए हैं, उन्हें यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। यह किताब न केवल दिमाग के जाले साफ करेगी बल्कि गांधी और गोडसे को लेकर एक साफ और सही दृष्टिकोण विकसित करने में भी मदद करेगी। अशोक का काम इस लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है।

अगर मैं सिर्फ यह लिख दूं कि यह किताब बहुत जरूरी है—तो यह सही नहीं होगा। यह बताना ज्यादा जरूरी है कि यह किताब किनके लिए जरूरी है। दवा की जरूरत उन्हें है, जो बीमार होते हैं। यह किताब गांधी को लेकर कुंठित लोगों तक जरूर पहुंचनी चाहिए। दवा कड़वी है, इसलिए इस बात की संभावना ज्यादा है कि बीमार व्यक्ति इसे लेने से बचेगा। इस किताब को लिखकर अशोक ने अपने हिस्से का बड़ा काम कर दिया है, बाकी का काम हमें करना होगा। अगर हम-आप यह किताब खरीदते हैं तो सिर्फ खुद न पढ़ें, बल्कि उसे कम से कम और पांच लोगों को पढ़ने के लिए जरूर दें। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी को सही जवाब तथ्यपरक किताब ही दे सकती है।  

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पुस्तक : उसने गांधी को क्यों मारा
लेखक : अशोक कुमार पांडेय
मूल्य : 299 रुपए
प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स

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