आग का पता बताने वाली कहानियां

पुस्तक समीक्षा

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

से वो पसंद हैं
जो मुंह नहीं खोलते
उसे वो पसंद हैं
जो आंखें बंद रखते हैं
उसे वो पसंद हैं
जो सवाल नहीं करते
उसे वो पसंद हैं
जिनका खून नहीं खौलता
उसे वो पसंद हैं
जो अन्याय का प्रतिकार नहीं करते
उसे मुर्दे पसंद हैं
वो राजा है
(लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित कविता संग्रह ‘अंधेरे अपने अपने’ से)

प्रवीण कुमार के सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह ‘वास्को डी गामा की साइकिल’ की पहली कहानी ‘एक राजा था, जो सीताफल से डरता था’ पढ़ते वक्त मुझे अपनी ही यह कविता याद आती रही। प्रवीण कुमार राजा के परिचय में लिखते हैं,  ‘उस राजा  के शासन में रात भर धूप खिली रहती थी’ लेकिन जब कहानी पढ़ेंगे तो पाएंगे कि प्रजा की ज़िन्दगी में अंधेरे के सिवाय और कुछ नहीं है। राजा से बेहतर राजा की छवि बनाई गई थी। यानि यह उस काल के राजा की कहानी है, जब इमेज चमकाने के लिए तमाम पीआर एजेंसियां जुटी हुईं थीं। इसलिए वह प्रजाप्रिय के नाम से जाना जाता था। वह न थकता था, न सोता था। यह लाइन बार-बार आती है और पाठकों को हॉन्ट करती है लेकिन राजा का यह गुण उसकी प्रजा को भयभीत भी करती है। जिस देश का राजा नहीं सोता हो, उस देश की प्रजा कैसे सो सकती है। वह भी तब जब उस राज्य से रात का खात्मा कर दिया गया हो। रात को भी धूप खिली रहती थी और प्रजा छाया तक के लिए तरस जाती थी।

कहानी संग्रह के कवर पर ही लिखा हुआ है, ‘लोककथा, मिथक और फैंटेसी  को फेंटकर विकसित हुई कथा शैली।’ इस कहानी में यही कथा शैली दिखती है। इस कहानी में लोककथा, मिथक और फैंटेसी के साथ यथार्थ को भी कुछ इस तरह फेंटा गया है कि पाठक एक दूसरी दुनिया में प्रवेश तो करता है लेकिन उसे अपनी दुनिया का सच दिखता है। वह प्रजा की त्रासदी में अपनी त्रासदी को महसूस करता है, राजा की हरकतों में वह अपनी दुनिया की सत्ता की क्रूरता और निष्ठुरता देखता है। यह कहानी जादुई यथार्थवाद की अद्भुत मिसाल पेश करती है। कहानी लंबी है लेकिन कहने का ऐसा जादुई अंदाज़ कि एक बार पढ़ना शुरू करें तो अन्त तक पहुंचे बिना छोड़ नहीं सकते।

प्रजाप्रिय बिना थके, बिना सोए इसलिए काम करता है कि उसका भेद न खुल जाए लेकिन प्रजा को हर वक्त यह बताया जाता है कि वह उनके लिए  बिना थके काम करता है, वह सिर्फ प्रजा के लिए हर वक्त जागता रहता है। लेकिन आखिरकार सीताफल राजा का भेद खोल देता है। सीताफल के बीज बगावत के बीज साबित होते हैं। बग़ावत का बीज बोता कौन है-गिलहरी। गिलहरी यानि मनुष्य की दुनिया का ही नहीं बल्कि जानवरों की दुनिया का भी सबसे कमजोर प्राणी। इसमें कहीं न कहीं यह संदेश भी छिपा है कि क्रांति की आग खाये-अघाये वर्ग नहीं बल्कि हाशिए पर पड़े समाज के सबसे शोषित-वंचित वर्ग के सीने में ही धधकता है। दुष्यन्त कुमार ने लिखा है न कि ‘हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए’। यह कहानी उस आग का पता बताती है।

राजनीति ने आम आदमी की चेतना को कितना जागृत या विकृत किया है-यह समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय है लेकिन इस कड़वी सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता कि राजधानियों से सैकड़ों किलोमीटर दूर, सुख-सुविधाओं और सरकारी योजनाओं से वंचित वर्ग की चेतना को छू तक नहीं पाने वाली इसी राजनीति ने उनकी ज़िन्दगी को बुरी तरह प्रभावित किया है। किसी समाज में आदमी की ज़िन्दगी की दशा और दिशा कैसी होगी- यह राजनीति ही तय करती है। प्रवीण कुमार की कहानियों  से साफ है कि वह इस बात को बखूबी समझते हैं। प्रवीण कुमार राजनीतिक चेतना सम्पन्न कथाकार हैं । राजनीति के खेल, उसकी साजिश, उसके साइड इफेक्ट की बारीकियों को बखूबी समझते हैं और कहानी में उसे प्रभावी ढंग से पिरोते भी हैं।

‘एक राजा था, जो सीताफल से डरता था’ में ही नहीं बल्कि वास्को डी गामा की साइकिल में भी राजनीति का यह कड़वा सच बहुत ही मुखर है। ‘रामलाल फरार है’ में राजनीति का बिल्कुल भी जिक्र नहीं है लेकिन यह भी विशुद्ध रूप से राजनीतिक कहानी ही है।

‘रामलाल फरार है’ पिछड़ी जातियों के बारे में दिलो-दिमाग में सदियों से बनी अवधारणा को चुनौती देने वाली कहानी है। कहानी में पिछड़ी जाति का रामलाल गांव से शहर आ जाता है। बचपन का उसका दोस्त प्रोफेसर बन गया है। वह उसे अपने साथ ले आता है। प्रोफेसर ऊंची जाति का है, इसलिए जाहिर है, वह बड़ा होकर दोस्ती का दिखावा भले कर ले लेकिन दोस्त नहीं हो सकता। वह मालिक ही है। रामलाल शहर से गांव तो आ जाता है, लेकिन उसकी भूमिका नहीं बदलती। दिखावे के लिए कहें तो उसकी स्थिति बदली है, उसे इज्जत मिलती है लेकिन सच्चाई क्या है यह सिर्फ रामलाल ही जानता है। उसके किरदार को गढ़ने वाले लेखक भी सदियों पुरानी  अवधारणा से कहां उबर पाता है और इसलिए रामलाल न केवल बगावत करता है, बल्कि कहानी से फरार हो जाता है।  

रामलाल कहता है, ‘रामलाल का दुख उसके रामलाल होने में है। उसे रामलाल से बाहर निकालो।’ रामलाल से रामलाल की मुक्ति आसान नहीं है। रामलाल को मुक्ति का सपना दिखाकर नेता गद्दी हासिल करते हैं, सत्ता की मलाई खाते हैं। रामलाल और विपन्न होता जाता है। रामलाल को रामलाल से मुक्त करने के लिए क्रांतियां भी कम नहीं हुईं लेकिन रामलाल जहां था, वहीं है। मुक्ति के लिए तरसता-तड़पता। वह लेखक से कहता है, ‘मैं तुम्हारा और प्रोफेसर का ग्लेडिएटर था। तुमने जो निश्चित और प्रतिबद्ध भूमिका दे रखी थी, उसमें  व्यक्तित्वांतरण का स्पेस ही नहीं था।’ कोई भी नहीं चाहता कि रामलाल का व्यक्तित्व बदले। इस साज़िश की जड़ें बहुत गहरी हैं। रामलाल समझ गया है कि अगर उसे मुक्ति चाहिए तो इसकी पहल भी उसे खुद ही करनी होगी। उसकी मुक्ति न किसी लेखक के हाथ है, न किसी नेता के। आज एक रामलाल लेखक के नियंत्रण से बाहर निकला है, कल दस रामलाल निकलेंगे। मुक्ति का द्वार ऐसे ही खुलेगा।

इस कहानी का शिल्प भी अद्भुत है। कहानी से किरदार के फरार हो जाने की फैंटेसी न केवल पाठक को बांधे रखती है बल्कि इसके जरिए कथाकार अपनी बात को प्रभावी ढंग से कह भी पाता है।

‘वास्को डी गामा की साइकिल’ कहानी में एक ऐसी साइकिल है, जो अच्छे-बुरे की समझ रखती है, अपने मालिक से संवाद करती है और उसे समय रहते हर खतरे से आगाह करती रहती है। यह दिल्ली में रोजी रोटी के लिए संघर्ष कर रहे एक मज़दूर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की कहानी है। फैक्ट्री में लोहा गलाने का काम करने वाले बजरंगी को लगता है कि उनकी बदकिस्मती का लोहा राजनीति की आग में ही गलेगा और उनके दिन संवरेंगे। इसलिए वह भाईजी का पिछलग्गू बन जाता है। भाई जी की कृपा से लुटियन्स जोन में एक मंत्री से मुलाकात के बाद तो बजरंगी को लगता है कि अब उसके अच्छे दिन दूर नहीं लेकिन भाई जी अपनी सांप्रदायिक राजनीति के लिए उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं। दिल्ली की जिन गलियों में बजरंगी रहता है, जब वहां तक दंगे की आंच पहुंचती है तो उसकी आंखें खुलती हैं और अन्तत: भाई जी से उसका मोह टूट जाता है। दंगे की आग में अपनी सियासी किस्मत नहीं चमकाने का उसका फैसला मौजूदा सांप्रदायिक राजनीति को उसका करारा जवाब है। उसका यह जवाब यह उम्मीद जगाता है कि जब तक बजरंगी जैसा एक भी किरदार समाज में है, इंसानियत सांप्रदायिकता की आग में झुलसने से हमेशा बचता रहेगा।

इस कहानी में दिल्ली के मजदूर वर्ग की त्रासद स्थिति का चित्रण बहुत मार्मिक ढंग से हुआ है। दिल्ली में रहने वाले नाइजीरियाई नागरिकों की ऐसी छवि बनी या बनाई गई है कि उनका नाम आते ही दिमाग में ड्रग्स ही कौंधता है लेकिन प्रवीण कुमार ने उनकी इस छवि को इस कहानी में तोड़ा है। इस कहानी में नाइजीरियाई नागरिकों की त्रासद और दुखद जिंदगी का दिल को छू लेने वाला चित्रण है।

इस संग्रह में कुल सात कहानियां हैं। और चार कहानियां हैं हाफ पैंट, पवन जी का प्रेम और प्रेज़ेंट टेन्स, बसई-दारापुर की संतानें और सिद्धपुरुष।

‘हाफ पैंट’ कहानी बचपन के उत्पीड़न की कहानी है। कहानी का विषय जितना संवेदनशील है, प्रवीण ने उतनी ही संवेदनशीलता के साथ लिखा भी है। छोटी सी संजू का दर्द, उसका रोना, उसका परेशान होना आपको उद्वेलित करेगा। आप न केवल यह जानने के लिए परेशान होते रहेंगे कि आखिर उसके साथ क्या हो रहा है बल्कि स्कूल की प्रिंसिपल के प्रति एक गुस्सा भी आपके मन में पनपता रहेगा। ‘बसई दारापुर की संतानें’ गांवों के उजड़ने और उसके सीने पर शहर के बसने की मार्मिक दास्तां है। यह कहानी दिल्ली की है लेकिन हर नए बसते शहर और उजड़ते गांव में यह कहानी आपको मिल जाएगी। ‘पवन जी का प्रेम और प्रेज़ेंट टेन्स’ दो बागी प्रेमियों की कहानी है लेकिन यह कहानी ऐसे मोड़ पर आकर खत्म होता है कि पाठक भौंचक रह जाता है।

‘सिद्धपुरुष’  पश्चाताप की आग में जलते एक शिक्षक की कहानी है। गोगिया जी ने इंजीनियर शर्मा के कातिलों को उनका पता बताया था। वो अगर पता नहीं बताते तो शायद उनकी हत्या नहीं होती लेकिन  गोगिया जी  तो यह बात बिल्कुल भी नहीं जानते थे कि पता पूछने वाले दोनों युवक उनका कत्ल ही कर देंगे। फिर भी वह पश्चाताप की आग में झुलसते रहते हैं और इसी कड़ी  में उनका मानसिक संतुलन भी बिगड़ता दिखता है। मरने के बावजूद इंजीनियर शर्मा उन्हें दिखाई पड़ता है, उनसे बातें करता है और यहां तक कि उनके घर भी आता है। सीसीटीवी के कैमरे में भी वह दिखता है। कहानी बांधकर तो रखती है लेकिन पाठक के मन में बार बार यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर गोगिया के अन्दर इतना अपराध बोध क्यों?  क्या इसलिए कि वह शर्मा से ज़िन्दगी भर ईर्ष्या करते रहे? गोगिया के मानिसक अन्तर्द्वन्द्व को यह कहानी बखूबी उकेरती है।

प्रवीण के किरदारों की एक और खासियत है। वो अन्याय के खिलाफ खड़ा होना जानते हैं। वो डरते नहीं बल्कि बगावत करते हैं।

प्रवीण कुमार के पास कहानी कहने का अद्भुत कौशल है। ‘कहने’ शब्द का इस्तेमाल बहुत सोच समझ कर कर रहा हूं। वो कहानी लिखते नहीं, कहते हैं और इसलिए उनकी कहानियां जिज्ञासा पैदा करती है, बांध लेती है। कहने और लिखने का क्या फ़र्क है, यह आप इस कहानी संग्रह से गुजरने के बाद खुद महसूस करेंगे। जैसा कि मैंने पहले भी बताया कि किताब के कवर पर ही लिखा है ‘लोककथा, मिथक और फैंटेसी को फेंटकर विकसित हुई शैली। इसी शैली को मैंने कौशल कहा है। ‘वास्को डी गामा की साइकिल’, ‘रामलाल फरार है’, ‘सिद्धपुरुष’, ‘एक राजा था जो सीताफल से डरता था’ जैसी कहानियां समकालीन कथाकारों के लिए ही नहीं बल्कि खुद प्रवीण के लिए भी कथा-शिल्प की एक नई ऊंचाई की चुनौती पेश करती हैं। अगर लेखक के पास भाषा, शिल्प और नजरिया हो तो वह साधारण कथ्य को भी महान कहानी में ढाल सकता है। प्रवीण के पास यह क्षमता है।

कहानी संग्रह : वास्को डी गामा की साइकिल
कथाकार : प्रवीण कुमार
प्रकाशक : राजपाल एंड सन्ज
मूल्य : 250 रुपए

 

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