साधारण में असाधारण का आलोक

पुस्तक समीक्षा
राम नगीना मौर्य के कहानी संग्रह यात्रीगण कृपया ध्यान दें पर लिखा है डॉ. अनिल अविश्रान्त ने

            कहानियाँ ‘कहन’ हैं, मनुष्य की अभिव्यक्ति की सबसे पुरातन विधा। कहने के अलग-अलग अंदाज ने किस्सा, आख्यायिका, कथा और कहानियों को जन्म दिया है। यह एक समानान्तर दुनिया रचती हैं। यह दुनिया हमारी अपनी दुनिया का ही प्रतिरूप है। सबसे प्रामाणिक कहानियाँ वे हैं जिनमें इन दो दुनियाओं के बीच निरन्तर आवाजाही होती रहे। इन्हें पढ़ते हुए पाठक कब इनकी दुनिया के नागरिक हो जायें, यह पता ही न चले।

               रामनगीना मौर्य जी की कहानियाँ कुछ ऐसी ही हैं। इन्हें पढ़ना अपने ही जीवन को फिर-फिर देखना है और यह प्रक्रिया अनायास इतने सहज-सरल ढंग से सम्पादित हो कि पाठक चमत्कृत हो जाये। उसकी चेतना साधारण में निहित असाधारण आलोक से दीप्त हो उठे।

               ‘यात्रीगण कृपया ध्यान दें’ यह रेलवे स्टेशनों पर निरन्तर गूंजती रहने वाली आवाज है। इसमें एक चेतावनी है, ध्यानाकर्षण की कोशिश है और सतर्क कराती एक मधुर ध्वनि है। यह एक भिन्न अर्थ में आत्मा की आवाज भी है। रूपक में बात करें तो जीवन भी एक यात्रा ही है और उसका भी एक प्रस्थान और समापन बिन्दु है। इन दो बिन्दुओं के बीच ही सारे सफर का आनन्द है। जिसे जीवन कहा गया है। लेखक का इस कहानी में कोई दार्शनिक आग्रह नहीं दिखता पर पाठक इसे महसूस कर सकता है,यही साहित्य की ताकत है। वह जितना कहता है उससे ज्यादा अनकहा रह जाता है और वही सबसे अमूल्य होता है। बहरहाल यह कहानी राम नगीना जी की एक महत्वपूर्ण कहानी है। पूरी कहानी पढ़ते जाइये, इस उम्मीद में कि शायद कोई ऐसी घटना घटेगी जो पाठक को हिलाकर रख देगी लेकिन ऐसा नहीं होता। कुछ भी अप्रत्याशित नहीं घटता। इस कहानी की खूबसूरती लेखक का ‘कीन आब्जर्वेशन’ है। इसे पढ़ते हुए लोकल ट्रेन के सफर का पूरा दृश्य एक बार पुन: जीवन्त हो उठेगा। अगर आपने एम एस टी के साथ डेली पैसेन्जरी की है तो आप इसका असली मजा ले सकते हैं। कहानी खत्म होते-होते भी ‘कहानी’ बना सकती है। अंतिम पैराग्राफ़ में स्टेशन से बाहर कथानायक मथुरादास दुल्हन का चेहरा देख आश्चर्य से भर उठते हैं। ‘एसिड सर्वाइवर’ का जिक्र करके लेखक कहानी को एक ऊंचाई दे देते हैं, अर्थ भी। वरना कहानी एक यात्रा के सूक्ष्म विवरण भर दर्ज कराकर खत्म हो जाती। जीवन भी तो ऐसा ही है समाप्त होने से पूर्व पग-पग पर संभावनाओं से भरा हुआ। 

           एक रोचक कहानी ‘रोटेशन सिस्टम से’ है जिसमें लेखक फैंटसी रचते हैं कि मध्यरात्रि डायनिंग-चेयर्स आपस में बातचीत कर रही हैं जिसे अचानक जागे कथा नायक सुन लेता है। यह मध्यवर्गीय जीवन की रोचक दास्तान हैं। कहीं-कहीं हल्के-व्यंग्य और कटाक्ष के साथ यह कहानी हमारे जीवन के अनन्त रंग बिखेरतीं है।

           “उन्होंने नाम नरेश ‘समथिंग’ बताया था” बहुत मार्मिक कहानी है। यह रिटायरमेंट के बाद अपने ही कार्यालय के एक पुराने कार्मिक के प्रति कार्यलयी उपेक्षा और निष्ठुर बर्ताव का वृतान्त तो है ही पर यह यहीं तक सीमित नहीं रहती। यह समग्र समाज में वृद्ध जनों की उपेक्षा और उन्हें समय न दिये जाने की समस्या की ओर संकेत करती है। नरेश जी की समस्या का एक छोर कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार, संवेदनहीनता और टालूपने से जुड़ता है तो दूसरा छोर जीवन में एकाकी पड़ते जाने की सामाजिक समस्या से, जहाँ न अपना परिवार साथ है और न ही समाज का भावात्मक सहारा ही उपलब्ध है। एक स्थान पर नरेश जी जीवन के अपने एकाकीपन पर टिप्पणी करते हुए खुद तो भावुक हुए ही हैं पाठकों को भी नम कर देते हैं-‘नहीं बेटा…दो फूल अगर एक साथ, जोड़ी में खिले हों तो उन्हें तोड़ना नहीं चाहिए।’…’तुम तो जानते ही होंगे कि फूलों की पंखुड़ियां, कितनी नाजुक, मुलायम होती हैं, जिन्हें सिर्फ देख कर ही हमारा मन प्रफुल्लित हो उठता है। फिर ये दो फूल जो एक साथ खिले हैं, इनमें से किसी एक को भी अगर तोड़ लिया, तो दूसरा उससे बिछुड़ जाएगा, जो इन फूलों के लिए असह्य होगा।’ 

            कथा नायक की यह संवेदनशीलता ही है कि बिना किसी पूर्व परिचय के वह नरेश जी की बात को सधैर्य सुनता है। समय का यह निवेश दोनों को ही अपनेपन की ऊष्मा से बर देता है। कुछ समय पूर्व उदास, हताश और थके-हारे से दिखने वाले नरेश जी नई  ऊर्जा से लबरेज़ दिखते हैं जिनके अंदर सिस्टम से लड़ने और कभी हार न मानने का जज़्बा मजबूत होता है तो कथानायक भी यकीनन अनुभव-सम्पदा से समृद्ध होता है जिसे गेब्रियल गार्सिया मार्केज के एक कथन को उद्धृत कर लेखक ने भी मुहर लगाई है। पर कहानी किसी भावुक अंत के बजाये हमारे समकाल के कठोर यथार्थ से टकराकर खत्म हुई है। अपने दूसरे सहकर्मी से नरेश जी के बारे बताते हुए कथानायक द्वारा नरेश जी का नाम भूल जाना यह बताता है कि संवेदना के क्षरण की जो दर इस समय है वह निश्चित ही चिंताजनक है।

            मध्यवर्ग के पास ढेर सारी बातें हैं, देश-दुनिया की चिंताएं हैं। कुछ गंभीर तो कुछ अगंभीर किस्म के तथ्य हैं। चाय-पान की गुमटियां और नाईं की दुकानें बतरस के जाने-पहचाने अड्डे हैं। समस्या यह है कि देश और समाज की चिंताओं पर यह वर्ग भयानक तौर पर निष्क्रिय है। इस पर राम नगीना मौर्य जी ने ‘ठलुआ चिन्तन’ कहानी लिखी है। अवध क्षेत्र के लोग ‘ठलुआ’ शब्द से बखूबी परिचित हैं। यह विशेषण बड़ा अर्थ व्यंजक है। यहाँ सिर्फ चिंतन है, कर्म में उसकी अभिव्यक्ति नहीं है। इससे हालात में बदलाव की संभावना क्षीण होती जाती है। कहानी के आरम्भ में जिस ठेलेवाली महिला का जिक्र है जो एक ट्रैफिक सिपाही राम प्रसाद जी की सदाशयता के चलते सड़क किनारे अपना ठेला लगाकर जीवन यापन कर रही है, उसका भी ठेला कहानी के अंत में अतिक्रमण विरोधी दस्ते द्वारा ट्रक में लाद लिया जाता है। जबकि ठीक उसी जगह एक भूतपूर्व मंत्री का बंगला शान के साथ फुटपाथ को निगलता जा रहा है और व्यवस्थापक चुप है।

             जीवन में कितना कुछ अलक्षित रह जाता है। यह कई बार इरादतन होता है और कई बार अनजाने ही। कितने रंग, कितने स्वाद, कितने खिलखिलाहटें और कितने ही संघर्ष हमारी नजरों से ओझल रहते हैं। कभी अनायास जब हमारी दृष्टि की परिधियां टूटती हैं, हम अपने कंफर्ट से बाहर निकलते हैं तो जीवन के अनेकानेक रंग से रूबरू होते हैं। ये अनुभव हमें समृद्ध करते हैं। इनमें जीवन के नये पाठ होते हैं, कुछ जरूरी सबक होते हैं। सब मिलकर जिंदगी के वितान को थोड़ा और विस्तारित करते हैं। ‘फुटपाथ पर जिंदगी’ ही नहीं एक पूरी दुनिया बसती है। उस ओर हम नही देखते। उसका हिस्सा नहीं बनते। वह हमारे लिए ‘अन्य’ हैं। हम कथित मुख्यधारा के लोग हाशिये को तवज्जों नहीं देते। पर जब कभी उस अन्य से परिचय का अवसर आता है, हम चकित रह जाते हैं। जीवन का ऐसा गाढ़ा रंग और जगह नहीं मिलता। हर्ष और संघर्ष के बीच ऐसी निरपेक्ष दृष्टि हमें शास्त्रों में वर्णित ‘स्थिरप्रज्ञ’ जैसी खोखली और कृत्रिम नहीं लगती, जीवन में डूबकर उसे वहन करने की जिजीविषा के बीच पनपती है। कहानी भले एक पराठेवाले के स्वाद और गंध से सुवासित हो पर यह असल में जीवन के राग से पैदा हुई सुगंध है। यह चिन्तन की धारा को मोड़ देती है। उसकी प्राथमिकताओं के क्रम को बदल देती है।

             बिडम्बनायें आधुनिक जीवन का पर्याय हैं। समर एक आधुनिक युवक है लेकिन उसके जीवन की दुविधा उसे ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ वह एक विडम्बना बनकर रह जाता है। वर्तिका और भूमिका के बीच उसका प्रेम विभाजित है। हालांकि उसकी भावना को प्रेम नहीं बल्कि आकर्षण ही कहना चाहिए। इस कहानी का सबसे अच्छा हिस्सा वह है जो वर्तिका और भूमिका के लिए लिखा गया है। ये स्त्रियों की नई छवियां हैं। वे अपने जीवन के बड़े निर्णय लेने में पर्याप्त व्यवहारिक हैं। वे भावुक किस्म की नायिकायें नहीं है। वे एक रिश्ते से निकल कर दूसरे में जाते समय ‘इमोशनल क्राइसिस’ का शिकार नहीं होतीं। उनके लक्ष्य स्पष्ट हैं। कथानायक समर को भी नये समय के हिसाब से जीने के लिए नये प्रतिमान बनाने होगें। तभी वह भविष्य का नायक बन सकता है। मूल्य संक्रमण के दौर में वैचारिक अस्पष्टता जीवन को अंधी सुरंग में ढकेल देगी। कहानी के अंत में समझ में आता है कि ‘बेचारा कीड़ा’ और कोई नहीं बल्कि अपना नायक समर ही है और उसकी इस नियति के लिए वह स्वयं जिम्मेदार भी है।

              ‘से चलकर, के रास्ते, को जाते हुए’ भी रेलवे उद्घोषणा की शब्दावली है, लेकिन इस शीर्षक की कहानी जीवन-यात्रा का संकेत करती है। रेल गाड़ियां भले ही निर्दिष्ट पथ पर चलती हों लेकिन जीवन में ऐसा होना एकरसता को जन्म देता है। इसलिए बंधी-बंधाई लीक पर चलने के बजाये नये रास्तों पर चलकर जीवनानुभव लेते रहना चाहिए। मनबोध बाबू आत्म विश्वास से भरे हुए ऐसे ही व्यक्ति हैं जो एक अवकाश के दिन इस संकल्प के साथ घर से निकलते हैं कि मोबाइल की पहुँच से दूर रहेगें। वह चूंकि एक लेखक भी हैं इसलिए जीवन की समग्रता में देखना-समझना चाहते हैं। उनकी दृष्टि-परास में पाॅपकार्न बेचते खोमचेवाले से लेकर जीवन पर बेहद दार्शनिक विमर्श करते दो सज्जन भी हैं। शहर में बेवजह घूमते हुए अनेक छोटे-मोटे कार्यकलाप करते हुए जब वे जब घर पहुँचते हैं तो पता चलता है कि उनके मोबाइल पर बाॅस की कई मिस्ड काल पड़ी हैं। यह उन्हें असहज करती हैं। वे अगले दिन आफिस में बापस के आगबबूला होने की आशंका से ग्रस्त भी होते हैं, पर उन्हें संतोष है कि उन्होने आज सचमुच एक दिन जिया है। कुछ नये अनुभव जोड़े हैं, अपनी स्वतंत्रता को महसूस किया है। वह अपने गिर्द मौजूद अदृश्य लेकिन बेहद ताकतवर श्रृखंलाओं को भले ही न तोड़ पाये हों लेकिन उन्हे थोड़ा शिथिल करने में तो कामयाब हुए ही हैं और यह कोई सामान्य उपलब्धि नही है। बेटी से उनका संवाद उन्हें एक सुलझे मनुष्य के रूप में स्थापित करता है। वह जानते हैं कि जीवन में सबको अपना स्पेस चाहिए। पारस्परिक सौहार्द के लिए निजता का सम्मान जरूरी है।

              ‘फिर जहाज पर आयो’ इसी भावभूमि का विस्तार है। एक तरफ कार्यालयी उलझनें हैं,  प्रोन्नति के पेंच हैं, बाॅस का मूड है इन सब तनावों के बीच निरन्तर छीजती जाती रचनात्मकता का संकट है। दुष्यन्त एक कार्यालय का निष्ठावान कर्मचारी है और एक संवेदनशील रचनाकार है। दोनों के बीच सन्तुलन बनाये रखने की अपनी चुनौतियां हैं। भारी व्यस्तताएं के बीच कभी-कभी ऐसा अवसर भी आता है जब कुछ भी करने का मन नहीं होता। ऐसे ही एक दिन वह अपने ही कार्यालय के रिटायर बाबू मनोहर जी के यहाँ पहुँचते हैं। मनोहर जी की अपनी समस्यायें हैं। वह ‘इम्पटी नेस्ट सिन्ड्रोम’ से पीड़ित हैं। उनके पास न बच्चे हैं और न ही उन्हें सुनने वाला कोई अन्य पारिवारिक सदस्य। यह एकाकीपन किसी को भी बीमार कर देने के लिये पर्याप्त है। दुष्यन्त और मनोहर जी की बातचीत में किसी नये लेखक के लिए जरूरी हिदायतें भी हैं। कहीं न कहीं ये लेखक के अपने मन में लेखन से जुड़े सवाल और उनके सतर्क जवाब की कोशिश है। अच्छा है कि कहानी के अंत में लेखक को अपनी प्रोन्नति की ‘गुड न्यूज’ भी मिल जाती है। कहानी मध्यवर्गीय घरों में बढ़ते टीवी के हस्तक्षेप पर भी टिप्पणी करती है। स्वयं कथानायक की पत्नी पर डेलीशोप का गहरा प्रभाव है। उनकी भाषा और देह भाषा दोनों में पर्याप्त नाटकीयता है। वह मनोरंजन की उसी फूडह परम्परा से जुड़ने की ख्वाहिश रखती है जिसे बाजार ने मीडिया के माध्यम से पैदा किया है। यह नकली दृश्यों को रिकन्स्ट्रक्ट कर उनमें छद्म सुख की तलाश का महज एक उपक्रम है।

              ‘तुमने कहा जो था’ एक पारिवारिक कहानी है। यह रिश्तों का विमर्श रखती है। कहानी की कथावस्तु अपेक्षाओं और उपेक्षाओं के बीच तनी संबंधों की डोरी पर चलती है। सामान्यतः परविवार में मानापमान का निर्धारक तत्व व्यक्ति की आर्थिक हैसियत से तय होता है। चार दामादों के बीच बड़ा दामाद इसलिए उपेक्षा का शिकार है कि उसकी आर्थिक स्थिति शेष अन्य तीन की अपेक्षा कुछ कमजोर है, दूसरे वह अपनी ही दुनिया में मगन रहने वाला एक कवि-हृदय व्यक्ति है। इससे भी दूरियां बढ़ी हैं। लगभग संवादहीनता की स्थिति है। यह परिस्थिति सुनेत्रा के लिए असह्य है। पर विवाह के अवसर पर सत्यजीत की आकस्मिक उपस्थिति बिगड़े खेल को संभाल लेती है। परिवार फिर से एक स्नेह-सूत्र में बंध जाता है। कहानी उपेक्षित होने और उपेक्षित महसूस करने जैसी दो अलहदा बातों में फर्क करना सिखाती है, यही इसकी सार्थकता है। 

              कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। यह जीवन के साथ निरन्तर चलती रहेगीं। ‘शेष भाग आगामी अंक में उनकी’ एक कहानी का शीर्षक भी है और पाठकों के लिए सूचना भी कि संग्रह की अंतिम कहानी के साथ संग्रह का अंत भले हो, कहानी का अंत नहीं होता। 

             और अंत में ‘यात्रीगण कृपया ध्यान दें’ संग्रह पढ़ना एक मजेदार अनुभव है। अधिकांश कहानियों के दृश्यों में जैसे लेखक की अप्रत्यक्ष उपस्थिति रही है क्योंकि लगभग हर कहानी लेखकीय तड़प, उसे न समझे जाने के अन्तर्द्वन्द्व, आफिस की उलझनें और घर में पारिवारिक सदस्यों के बीच समन्वय बनाने की जद्दोजहद की बात करती है। रिंग टोन्स में बजते नायाब गानों की पंक्तियाँ जहाँ चेहरे पर ‘हास’ ले आती हैं वहीं विभिन्न विद्वानों की सूक्तियो की बहुलता रस भंग भी करती हैं। इस लोभ का वह संवरण कर सकें तो कहानी का प्रवाह और बनें। कुल मिलाकर इस संग्रह को मध्यवर्गीय जीवन के कथा-वृतान्त से जुड़ने के लिए भी पढ़ना चाहिए।

कहानी संग्रह –यात्रीगण कृपया ध्यान दें
कथाकार—राम नगीना मौर्य
प्रकाशक—रश्मि प्रकाशन
मूल्य—180 रुपए

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डॉ. अनिल अविश्रान्त
हिन्दी विभाग
वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई राजकीय महिला महाविद्यालय- झाँसी
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