Category: समीक्षा

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नए विषय, नए फलक, नई दृष्टि : कहानी की नई ज़मीन

‘उद्भावना’ के कहानी विशेषांक में स्त्री कथाकारों की प्रभावशाली मौजूदगी है। इस अंक में प्रकाशित स्त्री कथाकारों की कहानियों में नए विषय हैं, नई  दृष्टि है और नए फलक हैं। इन कहानियों  पर सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की टिप्पणी साहित्यिक पत्रिका ‘उद्भावना’ के हाल ही में प्रकाशित कहानी विशेषांक में आठ...

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ज़िन्दग़ी के बीच से निकली कहानियां

पुस्तक समीक्षा गोविंद सेन के कहानी संग्रह ‘दसवीं के भोंगाबाबा’ पर आशा पांडेय की टिप्पणी अच्छी कहानियां मेरे लिये गूँगे के गुड़ के समान होती हैं।मैं उन्हें जितना महसूस करती हूं उतना उनके बारे में कह नहीं पाती हूँ। कथाकार गोविंद सेन जी का दूसरा कहानी संग्रह”दसवीं के भोंगाबाबा’ को...

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 मुंशी प्रेमचंद का समग्रता में आकलन

पुस्तक समीक्षा रंजन ज़ैदी की किताब ‘प्रेमचंद : अपार संभावनाओं के विस्मयकारी साहित्यकार’ पर शंभूनाथ शुक्ल की टिप्पणी हिंदी गद्य के नाम पर जो कुछ है, बस प्रेमचंद ही हैं। उनकी मृत्यु को 83 साल गुज़र चुके हैं पर लगता है, न प्रेमचंद के पहले हिंदी थी, न प्रेमचंद के...

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एकजुट चूहे तोड़ सकते हैं बिल्ली की टांग

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव नंदीग्राम एक बार फिर चर्चा में है। चुनाव जीतने के लिए सभी सियासी दल नंदीग्राम के 14 साल पुराने उस ज़ख्म को कुरेदने की कोशिश कर रहे हैं, जिस ज़ख्म की कहानी मधु कांकरिया ने अपनी कहानी ‘नंदीग्राम के चूहे’ में लिखी है। इस कहानी...

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साधारण लोगों की असाधारण कहानी

नीरज नीर के कहानी संग्रह ‘ढुकनी एवं अन्य कहानियां’ पर कमलेश की टिप्पणी मैंने नीरज नीर की पहली कहानी हंस में पढ़ी थी- कोयला चोर। उससे पहले मैं उन्हें एक बेहतरीन कवि के रूप में जानता था। उनका कविता संग्रह ‘जंगल में पागल हाथी’ और ‘ढोल’ चर्चित हो चुका था...

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क से कहानी : हाल फिलहाल की अच्छी कहानियां

क से कहानीसत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव 2021 में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली कहानियों में जो कहानियां अच्छी लगेंगी, उन पर संक्षिप्त टिप्पणी ‘क से कहानी ‘स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित की जाएंगी। इस अंक में सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव लिख रहे हैं लेकिन अगर आपको भी कोई कहानी पसंद आती है तो...

समय के टेढ़े सवालों से टकराती ग़ज़लें

पुस्तक समीक्षाडी एम मिश्र के ग़ज़ल संग्रह लेकिन सवाल टेढ़ा है पर लिखा है श्रीधर मिश्र ने साहित्यिक गतिविधियों की बात करें तो यह सक्रिय व सचेत साहित्यिक कर्म का प्राथमिक व सबसे जरूरी दायित्व होता है कि वह अपने समय को रचे भी व उसकी समीक्षा भी करे।  इस...

साधारण में असाधारण का आलोक

पुस्तक समीक्षा राम नगीना मौर्य के कहानी संग्रह यात्रीगण कृपया ध्यान दें पर लिखा है डॉ. अनिल अविश्रान्त ने             कहानियाँ ‘कहन’ हैं, मनुष्य की अभिव्यक्ति की सबसे पुरातन विधा। कहने के अलग-अलग अंदाज ने किस्सा, आख्यायिका, कथा और कहानियों को जन्म दिया है। यह एक समानान्तर...

रियल और अनरियल दुनिया की ‘एक सच्ची झूठी गाथा’

अलका सरावगी के उपन्यास एक सच्ची झूठी गाथा पर सुधांशु गुप्त की टिप्पणी उपन्यास का जन्म प्रश्न या प्रश्नों से होता है। तभी वह जीवन से जुड़ पाता है। व्यक्ति को समाज से प्रशन ही जोड़ते हैं और प्रश्न ही व्यक्ति में खुद को तलाश करने की जिज्ञासा पैदा करते...

इंसान की कुत्ती ज़िन्दगी की कहानी डॉग स्टोरी

पल-प्रतिपल 85 में प्रकाशित योगेंद्र आहूजा की कहानी पर एक टिप्पणी सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव “वे लोग, जो भी हैं और जहां भी हैं, जान लें कि वे केवल जिस्म को खत्म कर सकते हैं, हमारे ख्याल नहीं, खाब नहीं और न उनसे लड़ते रहने का हमारा इरादा।” इन्हीं ख्याल, ख्वाब...

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यादों का खूबसूरत कैनवास

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ‘रवि मेरे लिए जीते-जी एक लंबी प्रेम कहानी थे। अब तो वे कथा अनन्ता बन गए हैं।’  वाणी प्रकाशन से सद्य प्रकाशित ‘अन्दाज-ए-बयां उर्फ़ रवि कथा’ में ममता कालिया ने एक जगह यह बात लिखी है। यह पुस्तक रवींद्र कालिया की इन्हीं अनन्त कथाओं में...

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अच्छे और बुरे आदमी के बीच की ‘बारीक रेखा’ की कहानी

प्रज्ञा की कहानी ‘बुरा आदमी’ पर सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की टिप्पणी कबीर कह गए हैं, बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय हर भले आदमी के भीतर एक बुरा आदमी छिपा होता है। वह कब फन उठाएगा कोई नहीं जानता।...

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समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता से मुठभेड़ करतीं कहानियां

‘पहल 122′ में प्रकाशित गौरीनाथ की कहानी ‘हिन्दू’ और हरियश राय की कहानी ‘महफिल’ पर एक टिप्पणी सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ‘पहल जून-जुलाई 2020’ में प्रकाशित गौरीनाथ की कहानी ‘हिन्दू’  न केवल इस अंक की उपलपब्धि है बल्कि मौजूदा समय को बड़े प्रभावी ढंग से रेखांकित करती एक महत्वपूर्ण कहानी है।...