Category: किताबें

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स्त्री कथाकारों का ईमानदार मूल्यांकन

पत्रिका: लमही हमारा कथा समय विशेषांक, खंड एक प्रधान: संपादक विजय राय मूल्य: 50 रुपए पता: 3/343, विवेक खंड, गोमतीनगर, लखनऊ-226010 मोबाइल: 9454501011 सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका लमही का नया अंक (अप्रैल-सितम्बर संयुक्तांक) हर उस पाठक के लिए एक दुर्लभ उपहार की तरह है, जिसकी दिलचस्पी कहानियों में...

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सामाजिक विषमताओं पर प्रहार करती कविताएं

डॉ कृष्णकान्त द्विवेदी देश व प्रदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में  आलेख,कविताएँ व साक्षात्कार निरन्तर  प्रकाशित होते रहते हैं। आजकल, उत्तर प्रदेश, साहित्य अमृत जैसी प्रमुख पत्रिकाओं में   प्रकाशन।    सम्प्रति-:             सहायक प्रोफेसर    ( हिंदी) पं.सुंदरलाल मेमोरियल परास्नातक महाविद्यालय,कन्नौज   (उ प्र)     ई  मेल –  : krishnakantdubey394@ gmail. com...

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शिक्षा की दशा और दिशा पर केंद्रित जरूरी अंक

चर्चित पत्रिका कथन संपादक संज्ञा उपाध्याय सहयोग राशि 100 रुपए पता 107, साक्षरा अपार्टमेंट, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110063 फोन –011 25268341 सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव अच्छी शिक्षा और बेहतर इलाज—ये 2 ऐसी चीजें हैं, जो इस देश के गरीब और निम्नमध्य वर्ग की पहुंच से बाहर निकल चुकी हैं।...

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ग़ज़ल का क़द मनुष्यता से तो ऊँचा नहीं

ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि, गीतकार एवं आलोचक। ‘शब्‍द सक्रिय हैं'(कविता संग्रह) एवं ‘शब्‍दों से गपशप'(आलोचना),  ‘भाषा की खादी'(निबंध) सहित भाषा व आलोचना-समीक्षा की अनेक कृतियां प्रकाशित। अज्ञेय सहित कई कवियों के कविता-चयन, अधुनांतिक बांग्ला कविता एवं कुंवर नारायण पर केंद्रित आलोचनात्‍मक पुस्‍तक ‘अन्‍वय’ एवं ‘अन्‍विति’ का संपादन। उत्तर...

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जिंदगी से अथक जंग की कहानियाँ

शैलेंद्र शांत   पुस्तक समीक्षा यह कोलकाता के कथाकार उदयराज जी की किताब के बाबत चंद बातें हैं। कहानियों की किताब, जिसमें छोटी-बड़ी कुल 17 कहानियां दर्ज हैं। लेखक की किताब का नाम “आरंभ” है, जो किताब के मामले में आरंभ ही है, यानी पहली किताब। उम्मीद की जाए कि...

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मुसाफिर बैठा के कविता संग्रह ‘विभीषण का दु:ख’ से 5 कविताएं

मुसाफिर बैठा तीन स्थितियां आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता स्वाभाविक स्थिति! दलित मरने के पहले  कुछ नहीं बोलता अस्वाभाविक स्थिति ! ! दलित को आदमी नहीं भी कहा जा सकता स्वाभाविक  स्थिति ! ! ! (उदयप्रकाश की एक कविता से प्रेरित)   डर में घर जिसे तुम कहते...

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शिवदयाल के उपन्यास ‘एक और दुनिया होती’ का एक अंश

                       रात को ओढ़ने के लिए मेरे पास तो कुछ था नहीं। रात एक झोपड़ी के ओसारे में गुजारनी थी। पुआल का बिस्तर लगा और मुझे सहारा मिला बम्बइया से। उनके पास कंबल था। बीड़ी सुलगाने के पहले उन्होंने कंबल खोला और मुझ पर डाल दिया। कुछ इधर-उधर की बात...

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विमलेश त्रिपाठी की 5 प्रेम कविताएं

विमलेश त्रिपाठी विमलेश त्रिपाठी के कविता संग्रह ‘उजली मुस्कुराहटों के बीच’ को अभी किंडल से डाउनलोड करें और अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत कराएं। डाउनलोड करने के लिए नीचे की तस्वीर पर क्लिक करें। एक भाषा हैं हम शब्दों के महीन धागे हैं हमारे संबंध कई-कई शब्दों के रेशे-से गुंथेसाबुत खड़े...

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आशीष कुमार त्रिवेदी के उपन्यास ‘तुम्हारे लिए’ का एक अंश

नीचे की पुस्तकों को पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें उपन्यास अंश आशीष कुमार त्रिवेदी के उपन्यास ‘तुम्हारे लिए’ का एक अंश मदन से मिलने के बाद से जय और भी बेचैन हो गया था। मन में उथल पुथल मची थी। इतना सब कुछ होने के बाद भी क्या...

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हम सब जिसे शबाना के नाम से जानते हैं

पुस्तक समीक्षा मैं शबाना ( उपन्यास ) लेखक : यूसुफ़ रईस  प्रकाशक : नोशन प्रेस ( इंडिया, सिंगापुर, मलेशिया ), ओल्ड नं. 38, न्यू नं. 6, मैक निकोल्स रोड, चैटपट, चेन्नई – 600 013 मूल्य : ₹ 199 मोबाइल संपर्क : 09829595160 शहंशाह आलम शहंशाह आलम हम सब जिसे शबाना...

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अख़बारी नरक की आधी हक़ीक़त

लघु उपन्यास : आधी हक़ीक़त लेखक : शैलेंद्र शान्त प्रकाशक : बोधि प्रकाशन मूल्य : 80 रुपए सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव दूर से जो चीज़ बहुत खूबसूरत और आकर्षक लगती है, जरूरी नहीं कि नजदीक जाने पर भी वो वैसा ही लगे। पत्रकारिता के साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। वरिष्ठ...

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मौजूदा राजनीति पर व्यंग्यात्मक उपन्यास ‘प्रजातंत्र के पकौड़े’

किंडल ई बुक : प्रजातंत्र के पकौड़े व्यंग्यात्मक उपन्यास लेखक :  राकेश कायस्थ मूल्य :  49 रुपए सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव आधुनिक हिन्दी व्यंग्य में राकेश कायस्थ ने अपनी एक अलग और मुकम्मल पहचान बनाई है। आज जब व्यंग्य के नाम पर इतना कूड़ा लिखा जा रहा है कि इस विधा...

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उम्मीद बंधाती कविताएं

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव युवा कवि मनोज चौहान की कविताओं में एक तड़प है। समाज में लगातार बढ़ती असानता उनकी इस तड़प को बढ़ाती जाती हैं और ये तड़प उनकी कविताओं में प्रभावी ढंग से उभर कर आती है। उनके पहले कविता संग्रह ‘पत्थर तोड़ती औरत’ के टाइटल ने ही चौंकाया...

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सादगी और आत्मीयता का पारस्परिक रचाव

उमाशंकर सिंह परमार भास्कर चौधुरी छत्तीसगढ़ के हैँ, युवा कवि हैं, गद्य और पद्य दोनों में समान हस्तक्षेप रखते हैँ। मैंने उनका लिखा जो भी पढ़ा है, उस आधार पर मेरी मान्यता है कि भास्कर कवियों की भारी भरकम भीड़ में बड़ी दूर से पहचाने जा सकते हैं । वह...

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उजाले की संभावना तलाशती कहानियां

  किताब कहानी संग्रह : बबूगोशे लेखक : स्वदेश दीपक प्रकाशक :   जगरनॉट बुक्स मूल्य : 250 रुपए सत्येेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव इस साल 7 जून को कथाकार स्वदेश दीपक की गुमशुदगी के ग्यारह साल पूरे हो गए। इन ग्यारह सालों  में उन्हें चाहने वाले ठीक वैसे ही बेचैन रहे, जैसी...

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जीवन की कठोरता से साक्षात्कार

पुस्तक समीक्षा  संजीव ठाकुर कहानियों के साथ –साथ रिपोर्ताज लिखने वाले हिन्दी –लेखक सत्यनारायण के बारे में यह कहना शायद अत्युक्ति नहीं होगी कि वह अपनी कहानियों से ज्यादा रिपोर्ताजों के कारण जाने जाते हैं । समीक्ष्य पुस्तक उनके रिपोर्ताजों की पाँचवीं पुस्तक है । हालांकि ‘कथादेश’ में स्तंभ के...

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वर्जनाओं को तोड़ती कहानियों का संग्रह ‘इश्क़ की दुकान बंद है’

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव जिस्म मुहब्बत की प्रेरक तत्व है। जब किसी को देखकर दिल धड़क उठता है, उसकी मुहब्बत में पागल हो जाता है तो इसका मतलब है कि आंखों ने जिस खूबसूरती को देखा, दिल उसका दीवाना हो गया। इस बात से इनकार करना सच्चाई को नकारना...

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बेखौफ़ होकर सच बोलतीं कविताएं

पुस्तक समीक्षा सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव रोहित कौशिक के कविता संग्रह ‘इस खंडित समय में’ की समीक्षा जिस समाज में नफ़रत फैलाने वालों को सम्मानित किया जा रहा हो, वह समाज जाहिर तौर अपने पतन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा होगा। ऐसे समाज में सच बोलने वाले या तो...

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दरकते सामाजिक तानेबाने की कहानी है ‘विघटन’

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव इस ‘विघटन’ से बचना मुश्किल है हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं, जिसमें स्वार्थपरता हावी है। आदमी अपना स्वार्थ पूरा करने के इस हद तक नीचे गिरने को तैयार है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। नीचता की इस पराकाष्टा के चलते ही सामाजिक...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के आने वाले उपन्यास ‘ये इश्क बड़ा आसां’ एक अंश

उसने ध्यान से अहोना की ओर देखा। 50 फीसदी से ज्यादा बाल सफेद हो गए थे। कच्चे-पके बालों की मिलावट ने उसके व्यक्तित्व को और निखार दिया था। उम्र 55 के आसापास तो थी ही लेकिन चेहरे पर बुढ़ापे की दस्तक अभी नहीं पड़ी थी। गोरा चेहरा पहले की तरह...