Category: HINDI

0

नए विषय, नए फलक, नई दृष्टि : कहानी की नई ज़मीन

‘उद्भावना’ के कहानी विशेषांक में स्त्री कथाकारों की प्रभावशाली मौजूदगी है। इस अंक में प्रकाशित स्त्री कथाकारों की कहानियों में नए विषय हैं, नई  दृष्टि है और नए फलक हैं। इन कहानियों  पर सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की टिप्पणी साहित्यिक पत्रिका ‘उद्भावना’ के हाल ही में प्रकाशित कहानी विशेषांक में आठ...

4

देवेश पथ सरिया की कविताएं

पश्चाताप मैंने प्रेम किया जैसा साधक करते हैं अंकित किया तुम्हें हर पेड़ की हर पत्ती के हर रेशे में देखा तुम्हारा अक़्स बारिश की हर टपकती बूंद में तुम पर्णहरित थीं तुम जल का अणु हश्र मेरा हुआ वैसा जैसा हुआ करता है बाज़ार में आंखें मूंद धूनी रमाने...

2

पल्लवी मुखर्जी की कविताएं

विलुप्त होती स्त्रियाँ उसने जी लिया था अपने हिस्से का जीवन शायद… उसके पैरों के निशान पगडंडियों पर मिल जायेंगे तुम्हें उसके पंजों का छापा भी दीवार पर तुम्हें मिलेगा जिसे उसने पाथा था उपले थापते हुए बड़े प्रेम से बड़े जतन से बड़े  इत्मीनान से घर के फर्श को...

1

सरिता कुमारी की कहानी ‘चलो घर चलें’

वह आहत था। गहरे बहुत गहरे।  उसने कमरे के दरवाज़े पर पड़े ताले पर फिर से उचटती निगाह डाली। उसकी दयनीय स्थिति पर वह ताला मानो उसे मुँह चिढ़ा रहा था। उसने फिर से अपने स्मार्ट्फ़ोन के व्हाट्सएप मैसेज को नज़र भर कर देखा। मानो वह उन्हें पढ़ तो ले...

0

आलोक कुमार मिश्रा की कविताएं

  हंसो औरतों                          (1) चलो एक ऐसी दुनिया बनाएँ जहाँ औरतें हंसें तो हंसने लगें सारी दिशाएं वो बाहर निकलें तो स्वागत में खड़ी मिलें राहें जब उनके सिर में उभरें दर्द की रेखाएँ स्नेह से पगी उँगलियाँ उनके बालों में भागती दिख जाएँ जब वो साधें...

0

रामकुमारी चौहान : साहित्य के इतिहास में उपेक्षित एक सशक्त कवियत्री

शुभा श्रीवास्तव रचना कोई भी हो उसमें युगबोध और प्रासंगिकता को ढूँढना मुख्य आलोचकीय बिंदु बन जाता है। परंतु हमें यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि रचनाकार की अनुभूति समकालीन प्रासंगिकता पर सदैव फिट नहीं बैठती है। कुछ रचनाएं परंपरा और इतिहास की दृष्टि से देखने पर संस्कारित जड़ों का...

0

मोहम्मद मुमताज़ हसन की ग़ज़लें

(1) मुंह मोड़कर हम जाते नहीं, इश्क गर तुम ठुकराते नहीं! यूं किसी से दिल लगाते नहीं, मग़रूर  से रिश्ते बनाते नहीं! आंखों पे कब अख्तियार रहा, ख़्वाब लेकिन तेरे आते नहीं! वो ख़फ़ा होती है तो होने दो, हम नहीं वो  के मनाते नहीं! दिल उजड़ी हुई बस्ती लगे...

निदा रहमान की कविताएं

एक ना चाहते हुए रोज़ उग आती हैं तुम्हारे इश्क़ की ख़्वाहिशें रोज़ाना सुबह दफना देती हूँ हर वो हसरत जो मुझे तुम्हारे लिए बेचैन करती है.. रात नागिन सी हो जाती है जो डसती, तड़पाती है तुम्हारे लिए बगावती बनाती है… शामों में छाई उदासी बंजर ज़मीन सी नज़र...

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की कहानी ‘जहरा’

              मैं ठीक से नहीं बता पाऊंगा कि उसका नाम जहरा था या जहरी । इतना याद है कि गाहे  बगाहे लोग दोनों ही नाम इस्तेमाल करते थे । इस बात से कभी जहरा को भी कोई फ़र्क पड़ा हो, ऐसा मुझे याद नहीं । उस गांव-जवार में जहरा की...

रियल और अनरियल दुनिया की ‘एक सच्ची झूठी गाथा’

अलका सरावगी के उपन्यास एक सच्ची झूठी गाथा पर सुधांशु गुप्त की टिप्पणी उपन्यास का जन्म प्रश्न या प्रश्नों से होता है। तभी वह जीवन से जुड़ पाता है। व्यक्ति को समाज से प्रशन ही जोड़ते हैं और प्रश्न ही व्यक्ति में खुद को तलाश करने की जिज्ञासा पैदा करते...

राजेश ‘ललित’ की कविताएं

1. आग लगी आग लगी हैउस बस्ती मेंआग लगी है सर्दी बड़ी हैहाथ ताप लोजलती है झोपड़ीआज तुम भीताप लो आग लगी हैताप लोअब तो केवलराख बची है!!सुलगते अंगारे इस दिल मेंजीवन भरआग अभीकहां बुझी है!अंगारों संग राख बची है!! आग हमारेपेट में लगी हैरोम रोम मेंभड़की हैसुबह शामबुझाओ कितनाबार बार यहक्यों...

धर्मपाल महेंद्र जैन की कविताएं

ब्लैक होल भौतिकी अध्ययनशाला में पढ़ते हुएसुनसान रातों में ढूँढते थे चमकते सुदूर तारेजीवन की खोज में जातेअंतरिक्ष यानों पर रखते थे निगाहऔर समझना चाहते थेब्लैक होल का चुंबकीय आकर्षण।मोटी किताबों में आकाश ही आकाश थाआदमी नहीं था कहीं। फिर ऐसा कुछ हुआजैसा कहानियों में होता हैहम राजकुमार दूरबीन छोड़गाँव...

नीलिमा शर्मा की कहानी ‘लम्हों ने खता की’

रेखाचित्र : संदीप राशिनकर जिन्दगी के उपवन में हर तरीके के इंसान होते हैं। उन इंसानों में एक जात लड़की जात भी होती है । हर तरह के रंग,रूप, स्वभाव की लड़की । कच्ची उम्र में जड़ें तोड़ दी जाएँ तो पौधे की तरह पनपती नहीं है बोनसाई बन जाती...

0

दुष्प्रचारों से नहीं दब सकता गांधी का सत्य

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव गांधी के देश में गोडसे की पूजा होने लगे, तो खुद से यह सवाल पूछना ही चाहिए कि गांधी की विरासत को संभालने में हमसे कहां चूक हो गई? गांधी को जितना समझा है, उससे मैं यह अनुमान लगा सकता हूं कि अगर आज वो...

1

आलोक कुमार मिश्रा की कविताएं

बिछोह नदी और बुआ दोनों थीं एक जैसी सावन में ही हमारे गाँव आतीं थीं मंडराती थीं बलखाती थीं बह-बह जाती थीं गाँव घर खेत खलिहान सिवान दलान में  बुआ झूलती थी झूलाऔर गाती थी आशीषों भरे गीतनदी भरती थी मिट्टी में प्राणजैसे निभा रही हो रस्म मना रही हो रीतदोनों लौट जाती थीं जब जाते थे...

1

पीयूष कुमार द्विवेदी के 10 दोहे

भीषण सूखा है कहीं, और कहीं सैलाब । हमने जो दोहन किया, देती प्रकृति जवाब ।।१।। नीम कटी जो द्वार की, तरसे मेरे कान । सुनने को मिलता नहीं, मधुर कोकिला गान ।।२।। धरती छाती चीरकर, लेते जल हम खींच । लेकिन लौटते नहीं, कितनी हरकत नीच ।।३।। गंगा बस...

0

अमरीक सिंह दीप की कहानी ‘प्रकृति’

वह इतनी सुन्दर है जितनी सुन्दर यह धरती। धरती पर खड़े पहाड़ । पहाड़ पर खड़े देवदार, चीड़ , चिनार , सागवान , बुरुंश के वृक्ष। पहाड़ों से गिरने वाले झरने। झरनों के समूह गान से बनी नदियां। नदियां , जो मैदानों में आकर बाग-बगीचों और खेतों को सींचतीं हैं...

0

मधु कांकरिया की कहानी ‘जलकुम्भी’

प्रणीता की कहानी मैं लिखना नहीं चाहती थी क्योंकि उसे सम्पूर्णता में पकड़ पाना, अनंत उदासी के उसके घेरे को बेध पाना मेरे बस की बात नहीं थी. फिर भी उसकी कहानी मैं लिख रही हूँ तो महज इस कारण कि कौन जाने किन सहृदय पाठकों के हाथों में पड़कर यह...

0

बाज़ारवाद के घातक हमलों की कहानियां

चर्चित किताब कहानी संग्रह : आईएसओ 9000 लेखक  : जयनंदन मूल्य  : 380 रुपए (हार्ड कवर) प्रकाशक  : नेशनल पेपरबैक्स, दिल्ली सत्येंन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव जयनंदन संघर्षशील लोगों के कथाकार हैं। जयनन्दन मज़दूरों के बीच रहे हैं। उनकी ज़िन्दगी जी है। खुद भी मजदूर रहे हैं। इसलिए उनके दर्द को उनसे...