Category: कविता

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गुंजन श्रीवास्तव की कविताएं

ऊँचे होने का नाटक आदमी पैसों को गिनता हुआ नहीं देखता कि इससे पहले ये क्षत्रीय के हाथों में थी या किसी शूद्र के! न ही वो पूछता है एक वेश्या से उसे भोगने से पहले उसकी जात! आदमी ऊँचे होने का नाटक करता है सभी के बीच तन्हाई में...

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देवेश पथ सरिया की कविताएं

पश्चाताप मैंने प्रेम किया जैसा साधक करते हैं अंकित किया तुम्हें हर पेड़ की हर पत्ती के हर रेशे में देखा तुम्हारा अक़्स बारिश की हर टपकती बूंद में तुम पर्णहरित थीं तुम जल का अणु हश्र मेरा हुआ वैसा जैसा हुआ करता है बाज़ार में आंखें मूंद धूनी रमाने...

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पल्लवी मुखर्जी की कविताएं

विलुप्त होती स्त्रियाँ उसने जी लिया था अपने हिस्से का जीवन शायद… उसके पैरों के निशान पगडंडियों पर मिल जायेंगे तुम्हें उसके पंजों का छापा भी दीवार पर तुम्हें मिलेगा जिसे उसने पाथा था उपले थापते हुए बड़े प्रेम से बड़े जतन से बड़े  इत्मीनान से घर के फर्श को...

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संजय शांडिल्य की प्रेम कविताएं

लौटना जरूरी नहींकि लौटो यथार्थ की तरहस्वप्न की भी तरहतुम लौट सकती हो जीवन में जरूरी नहींकि पानी की तरह लौटोप्यास की भी तरहलौट सकती हो आत्मा में रोटी की तरह नहींतो भूख की तरहफूल की तरह नहींतो सुगंध की तरहलौट सकती हो और हाँ,जरूरी नहीं कि लौटनाकहीं से यहीं...

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मीरा मेघमाला की कविताएँ

कैसे मर जायें झट से! ऐसे में गर मरने को कहा जाएतो कैसे मर जायें झट से! अंतिम दर्शन के लिएआये लोग हंसेंगे,झाड़ू-पोछा नहीं लगाया हैबर्तन, कपड़े नहीं धोये हैंसाफ़ नहीं कर पाई घर का शौचालयपेड़ पौधों को भी पानी नहीं दिया हैकुत्ता और बिल्ली भूखे बैठे हैंकल के नाश्ते...

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आलोक कुमार मिश्रा की कविताएं

  हंसो औरतों                          (1) चलो एक ऐसी दुनिया बनाएँ जहाँ औरतें हंसें तो हंसने लगें सारी दिशाएं वो बाहर निकलें तो स्वागत में खड़ी मिलें राहें जब उनके सिर में उभरें दर्द की रेखाएँ स्नेह से पगी उँगलियाँ उनके बालों में भागती दिख जाएँ जब वो साधें...

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प्रशान्त गौतम की कविताएं

1. उसने कहा, मुझे यथार्थ पर भरोसा है जो दिखाई देता है धरातल पर और तुम कवि हो! तुम्हें होगा कल्पनाओं पर। मैंने कहा मुझे कल्पना और\ यथार्थ दोनों पर भरोसा है, क्योंकि कल्पना की अंशतः परिणति ही यथार्थ है। अगर मेरी सभी कल्पनाएं यथार्थ में बदल गयी, तो एक...

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विवेक चतुर्वेदी की कविताएं

पिता बार-बार दिख रहे हैं पिता आजकल रेलवे स्टेशन पर दिखे आज एस्केलरेटर की ओर पैर बढ़ाते और वापस खींचते प्लेटफार्म पर पानी की जरूरत और रेल चल पड़ने के डर के बीच खड़े… फिर डर जीत गया कल चौराहे पर धुंधलाती आंखों से चीन्हते रास्ता डिस्पेंसरी के बाहर धूप...

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निर्मल गुप्त की कविताएं

मेज पर रखा सफेद हाथी लिखने की मेज़ पर सिरेमिक का सफ़ेद हाथी हैउसके हौदे पर उगा हैहरेभरे पत्तों वाला मनी प्लांटवह तिरछी आँखों से देख रहामेरी उँगलियों से उगते कविता के कुकरमत्तेजल्द ही यहाँ उदासी की फ़सल पनपेगी. गुलाबी फ्रॉक पहने एक लड़की टहलती चली आती हैरोज़ाना मेरी  बोसीदा स्मृति  के...

अनुराग अनंत की कविताएं

तुम्हारे कंधे से उगेगा सूरज तुम्हारी आँखें मखमल में लपेट कर रखे गए शालिग्राम की मूरत है और मेरी दृष्टि शोरूम के बाहर खड़े खिलौना निहारते किसी गरीब बच्चे की मज़बूरी  मैंने जब जब तुम्हें देखा ईश्वर अपने अन्याय पे शर्मिदा हुआ और मज़दूर बाप अपनी फटी जेब मेंहाथ डालते हुए आसमान की तरफ देख कर...

निदा रहमान की कविताएं

एक ना चाहते हुए रोज़ उग आती हैं तुम्हारे इश्क़ की ख़्वाहिशें रोज़ाना सुबह दफना देती हूँ हर वो हसरत जो मुझे तुम्हारे लिए बेचैन करती है.. रात नागिन सी हो जाती है जो डसती, तड़पाती है तुम्हारे लिए बगावती बनाती है… शामों में छाई उदासी बंजर ज़मीन सी नज़र...

डॉ सांत्वना श्रीकांत की प्रेम कविताएं

मुझमें हो तुमजब लौट जाते हो तो आखिर में थोड़ा बच जाते हो तुम मुझमें। मेरी आंखों की चमक और नरम हथेलियों के गुलाबीपन में या निहारती हुई अपनी आंखों में छोड़ जाते हो मुझमें बहुत कुछ- जो एकटक तकती रहती हैं मेरे होठों के नीचे के तिल को। कभी...

राजेश ‘ललित’ की कविताएं

1. आग लगी आग लगी हैउस बस्ती मेंआग लगी है सर्दी बड़ी हैहाथ ताप लोजलती है झोपड़ीआज तुम भीताप लो आग लगी हैताप लोअब तो केवलराख बची है!!सुलगते अंगारे इस दिल मेंजीवन भरआग अभीकहां बुझी है!अंगारों संग राख बची है!! आग हमारेपेट में लगी हैरोम रोम मेंभड़की हैसुबह शामबुझाओ कितनाबार बार यहक्यों...

ज्योति रीता की कविताएं

गरीब औरत गरीबी में लिपटी औरतों की तकलीफेंतब दुगुनी हो जाती है,जब सुबह कुदाल लेकर निकला पतिशाम ढले हड़िया(देशी शराब) पीकर लौटता है,बच्चे माँ को घूरते हैंबापू आलू-चावल क्यूँ नहीं लाया?माँ बदहवास -सी घूरती हैखौलते अदहनऔर शराबी पति को… होठों पर सूखी पपड़ी कोजीभ से चाटतीहर माहबचाती है पगार से...

धर्मपाल महेंद्र जैन की कविताएं

ब्लैक होल भौतिकी अध्ययनशाला में पढ़ते हुएसुनसान रातों में ढूँढते थे चमकते सुदूर तारेजीवन की खोज में जातेअंतरिक्ष यानों पर रखते थे निगाहऔर समझना चाहते थेब्लैक होल का चुंबकीय आकर्षण।मोटी किताबों में आकाश ही आकाश थाआदमी नहीं था कहीं। फिर ऐसा कुछ हुआजैसा कहानियों में होता हैहम राजकुमार दूरबीन छोड़गाँव...

गजेंद्र रावत की कविताएं

लिबरल्स बेशक सेये पढ़े हैंदेश-विदेश की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटियों मेंहासिल हैं ऊंची-ऊंची डिग्रियाँमाहिर हैं जुबान केबात का लहजा गजब हैउस्ताद हैं अपने फन केमगर बू नहीं है पसीने की इनके जिस्म मेंकृत्रिमगंध है तीखे परफ्यूम कीभीतर से खौफ खाये हैंबदलती दुनिया देखकरऔर रंग लाल नहीं हैबल्कि उनकी नज़र भर सेकलर ब्लाइंड...

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नितेश मिश्र की कविताएं

सुविधाएं कहीं भी टिकाये रखा जा सकता है जीवन पैर कहीं भी नहीं टिकाया जा सकता रोया जा सकता है थोड़ा-थोड़ा पूरा जीवन पूरा जीवन एक साथ नहीं रोया जा सकता बढ़ता जाता है समय बैठती जाती है उम्र उम्र धकेली नहीं जा सकती समय बाँधा नहीं जा सकता। जीवन जीने की एक पूरी प्रक्रियाजीने के...

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अरविन्द यादव की कविताएं

उम्मीदें अनायास दिख ही जातीं हैं आलीशान महलों को ठेंगा दिखाती नीले आकाश को लादे सड़क के किनारे खड़ी बैलगाड़ियां और उनके पास घूमता नंग-धड़ंग  बचपन शहर दर शहर इतना ही नहीं खींच लेता है अपनी ओर चिन्ताकुल तवा और मुँह बाये पड़ी पतीली की ओर  हाथ फैलाए चमचे को...

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सारुल बागला की कविताएं

रेखाचित्र : रोहित प्रसाद पथिक ईश्वर ये दुनिया उनके लिए नहीं बनाई गयीजिनके लिए सिर्फ आसमानीपाप और पुण्य से बड़ी कोई चीज़ नहींफर्ज़ कीजिए कि ईश्वर कोईनयी दुनिया बनाने में व्यस्त हो जाता हैया फिर चला जाता है दावत पर कहींकिसी स्वाद में डूबकरअनुपस्थित हो जाता हैतो आप कितने इंसान...

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आलोक कुमार मिश्रा की कविताएं

बिछोह नदी और बुआ दोनों थीं एक जैसी सावन में ही हमारे गाँव आतीं थीं मंडराती थीं बलखाती थीं बह-बह जाती थीं गाँव घर खेत खलिहान सिवान दलान में  बुआ झूलती थी झूलाऔर गाती थी आशीषों भरे गीतनदी भरती थी मिट्टी में प्राणजैसे निभा रही हो रस्म मना रही हो रीतदोनों लौट जाती थीं जब जाते थे...