Category: कविता

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निर्मल गुप्त की कविताएं

मेज पर रखा सफेद हाथी लिखने की मेज़ पर सिरेमिक का सफ़ेद हाथी हैउसके हौदे पर उगा हैहरेभरे पत्तों वाला मनी प्लांटवह तिरछी आँखों से देख रहामेरी उँगलियों से उगते कविता के कुकरमत्तेजल्द ही यहाँ उदासी की फ़सल पनपेगी. गुलाबी फ्रॉक पहने एक लड़की टहलती चली आती हैरोज़ाना मेरी  बोसीदा स्मृति  के...

अनुराग अनंत की कविताएं

तुम्हारे कंधे से उगेगा सूरज तुम्हारी आँखें मखमल में लपेट कर रखे गए शालिग्राम की मूरत है और मेरी दृष्टि शोरूम के बाहर खड़े खिलौना निहारते किसी गरीब बच्चे की मज़बूरी  मैंने जब जब तुम्हें देखा ईश्वर अपने अन्याय पे शर्मिदा हुआ और मज़दूर बाप अपनी फटी जेब मेंहाथ डालते हुए आसमान की तरफ देख कर...

निदा रहमान की कविताएं

एक ना चाहते हुए रोज़ उग आती हैं तुम्हारे इश्क़ की ख़्वाहिशें रोज़ाना सुबह दफना देती हूँ हर वो हसरत जो मुझे तुम्हारे लिए बेचैन करती है.. रात नागिन सी हो जाती है जो डसती, तड़पाती है तुम्हारे लिए बगावती बनाती है… शामों में छाई उदासी बंजर ज़मीन सी नज़र...

डॉ सांत्वना श्रीकांत की प्रेम कविताएं

मुझमें हो तुमजब लौट जाते हो तो आखिर में थोड़ा बच जाते हो तुम मुझमें। मेरी आंखों की चमक और नरम हथेलियों के गुलाबीपन में या निहारती हुई अपनी आंखों में छोड़ जाते हो मुझमें बहुत कुछ- जो एकटक तकती रहती हैं मेरे होठों के नीचे के तिल को। कभी...

राजेश ‘ललित’ की कविताएं

1. आग लगी आग लगी हैउस बस्ती मेंआग लगी है सर्दी बड़ी हैहाथ ताप लोजलती है झोपड़ीआज तुम भीताप लो आग लगी हैताप लोअब तो केवलराख बची है!!सुलगते अंगारे इस दिल मेंजीवन भरआग अभीकहां बुझी है!अंगारों संग राख बची है!! आग हमारेपेट में लगी हैरोम रोम मेंभड़की हैसुबह शामबुझाओ कितनाबार बार यहक्यों...

ज्योति रीता की कविताएं

गरीब औरत गरीबी में लिपटी औरतों की तकलीफेंतब दुगुनी हो जाती है,जब सुबह कुदाल लेकर निकला पतिशाम ढले हड़िया(देशी शराब) पीकर लौटता है,बच्चे माँ को घूरते हैंबापू आलू-चावल क्यूँ नहीं लाया?माँ बदहवास -सी घूरती हैखौलते अदहनऔर शराबी पति को… होठों पर सूखी पपड़ी कोजीभ से चाटतीहर माहबचाती है पगार से...

धर्मपाल महेंद्र जैन की कविताएं

ब्लैक होल भौतिकी अध्ययनशाला में पढ़ते हुएसुनसान रातों में ढूँढते थे चमकते सुदूर तारेजीवन की खोज में जातेअंतरिक्ष यानों पर रखते थे निगाहऔर समझना चाहते थेब्लैक होल का चुंबकीय आकर्षण।मोटी किताबों में आकाश ही आकाश थाआदमी नहीं था कहीं। फिर ऐसा कुछ हुआजैसा कहानियों में होता हैहम राजकुमार दूरबीन छोड़गाँव...

गजेंद्र रावत की कविताएं

लिबरल्स बेशक सेये पढ़े हैंदेश-विदेश की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटियों मेंहासिल हैं ऊंची-ऊंची डिग्रियाँमाहिर हैं जुबान केबात का लहजा गजब हैउस्ताद हैं अपने फन केमगर बू नहीं है पसीने की इनके जिस्म मेंकृत्रिमगंध है तीखे परफ्यूम कीभीतर से खौफ खाये हैंबदलती दुनिया देखकरऔर रंग लाल नहीं हैबल्कि उनकी नज़र भर सेकलर ब्लाइंड...

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नितेश मिश्र की कविताएं

सुविधाएं कहीं भी टिकाये रखा जा सकता है जीवन पैर कहीं भी नहीं टिकाया जा सकता रोया जा सकता है थोड़ा-थोड़ा पूरा जीवन पूरा जीवन एक साथ नहीं रोया जा सकता बढ़ता जाता है समय बैठती जाती है उम्र उम्र धकेली नहीं जा सकती समय बाँधा नहीं जा सकता। जीवन जीने की एक पूरी प्रक्रियाजीने के...

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अरविन्द यादव की कविताएं

उम्मीदें अनायास दिख ही जातीं हैं आलीशान महलों को ठेंगा दिखाती नीले आकाश को लादे सड़क के किनारे खड़ी बैलगाड़ियां और उनके पास घूमता नंग-धड़ंग  बचपन शहर दर शहर इतना ही नहीं खींच लेता है अपनी ओर चिन्ताकुल तवा और मुँह बाये पड़ी पतीली की ओर  हाथ फैलाए चमचे को...

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सारुल बागला की कविताएं

रेखाचित्र : रोहित प्रसाद पथिक ईश्वर ये दुनिया उनके लिए नहीं बनाई गयीजिनके लिए सिर्फ आसमानीपाप और पुण्य से बड़ी कोई चीज़ नहींफर्ज़ कीजिए कि ईश्वर कोईनयी दुनिया बनाने में व्यस्त हो जाता हैया फिर चला जाता है दावत पर कहींकिसी स्वाद में डूबकरअनुपस्थित हो जाता हैतो आप कितने इंसान...

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आलोक कुमार मिश्रा की कविताएं

बिछोह नदी और बुआ दोनों थीं एक जैसी सावन में ही हमारे गाँव आतीं थीं मंडराती थीं बलखाती थीं बह-बह जाती थीं गाँव घर खेत खलिहान सिवान दलान में  बुआ झूलती थी झूलाऔर गाती थी आशीषों भरे गीतनदी भरती थी मिट्टी में प्राणजैसे निभा रही हो रस्म मना रही हो रीतदोनों लौट जाती थीं जब जाते थे...

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प्रणव प्रियदर्शी की कविताएं

अकेले आदमी की मर्जीवह वक्त की आग पर से विद्रूपता का राख हटा बढ़ता है आगे जूझने को सारी विषमताओं से। जब वह अपने भीतर उतरता है तो समाज उसे अनुपयोगी सिद्ध कर देता है देखता है वह सामने सूखे कचनार का पेड़ और ठिठक कर खड़ा हो जाता है...

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गजेन्द्र रावत की कविताएं

1. सहज कौवामेरी तरह नहीं लेतासहजमौत कोमैंने उसेएकजुट होआकाश सर पर उठाते देखा है… 2. बेरहमी अंधेराउन्हें पसंद हैवे नहीं देखना चाहतेअपना भी चेहरारोशनी जो दिखा देती हैउनके भीतर जमे हुए डर कोइसीलिएवो हर शैजो देती है रोशनीमिटा दी जाती हैबेरहमी से…. 3. खोज रहे हैं आजवे चल पड़े हैंनंगे...

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पीयूष कुमार द्विवेदी के 10 दोहे

भीषण सूखा है कहीं, और कहीं सैलाब । हमने जो दोहन किया, देती प्रकृति जवाब ।।१।। नीम कटी जो द्वार की, तरसे मेरे कान । सुनने को मिलता नहीं, मधुर कोकिला गान ।।२।। धरती छाती चीरकर, लेते जल हम खींच । लेकिन लौटते नहीं, कितनी हरकत नीच ।।३।। गंगा बस...

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राजेश’ललित’ की कविताएं

बुद्ध मैं आत्मा घर रख आया बस यूँ ही शरीर  लेकर निकल पड़ा कभी इस डगर कभी उस नगर आत्मा साफ़ हो तो ठीक बाहर रोगी हैं वृद्ध हैं बाहर निष्प्राण हैं मैं कोई बुद्ध नहीं कोई वट वृक्ष नहीं हाँ,पत्नी को बता आया वो साफ़ रखेगी आत्मा संदूक में...

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डॉ नितेश व्यास की कविताएं

शब्द का सपना कविता में जीवन के ढंग को तलाशता हूं मैं खोजता हूं शब्दों में इन्द्र धनुष के बाहर‌ का कोई रंग कोई ऐसी वर्णमाला जिसे पहनकर मैं अदृश्य हो सकूं मैं एक आरामदायक कमरा खोजता हुआ कविता की पुस्तक तक पहुंच जाता हूं मैं ढूंढता हूं एक गोद...

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बच्चों के लिए राम करन की कविताएं

बादल! आना मेरे गाँव बरगद बाबा खड़े मिलेंगे, जटा-जूट से बढ़े मिलेंगे। झुककर छूना उनके पांव, बादल! आना मेरे गाँव। पके रसीले आम मिलेंगे, लँगड़ा, बुढ़वा नाम मिलेंगे। और मिलेगी पीपल छाँव, बादल! आना मेरे गाँव। घर-घर ठाड़े नीम मिलेंगे, दातुन लिए हक़ीम मिलेंगे। चिड़ियां करती ‘ची-ची-चांव’, बादल! आना मेरे...

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स्मिता सिन्हा की कविताएं

आत्महंता वे बड़े पारंगत थे  बोलने में   चुप रहने में   हँसने में  रोने में  उन्होंने हमेशा  अपने हिस्से का  आधा सच ही कहा  और अभ्यस्त बने रहे  एक पूरा झूठ रचने में  अपनी इसी तल्लीनता में  वे अंत तक  इस सत्य से अनजान रहे की  उन्हीं के प्रहारों...

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नताशा की कविताएं

अव्यक्त मेरे आस-पास प्रेम पड़ा था रस में गन्ध में छाया में  मेरे पकड़ने की चाह में जिह्वा बेस्वाद रही श्वास बेपरवाह धूप में सारे पेड़  अन्त: झुलस गये ! छाया मेरा पता पूछती वह  थक सी गई है  साथ चलते-चलते  धूप के अन्तिम ठिकाने पर  हेरती है मचान  मुझसे...