सरिता कुमारी की कहानी ‘चलो घर चलें’

वह आहत था। गहरे बहुत गहरे।  उसने कमरे के दरवाज़े पर पड़े ताले पर फिर से उचटती निगाह डाली। उसकी दयनीय स्थिति पर वह ताला मानो उसे मुँह चिढ़ा रहा था।

उसने फिर से अपने स्मार्ट्फ़ोन के व्हाट्सएप मैसेज को नज़र भर कर देखा। मानो वह उन्हें पढ़ तो ले रहा। पर लिखे हुए का मतलब नहीं समझ पा रहा। मैसेज उसके मकान मालिक का था।

‘हमारी जान ख़तरे में मत डालिए, अभय! आप कहीं और रह लें, इस दौरान। कमरे पर ताला डालना हमारी मजबूरी है। आपका सामान एहतियात से पैक कर पोर्च के किनारे, सीढ़ियों के नीचे रखा है। वहाँ से उठा लें। किसी से भी मिलने की कोशिश न करें।’

मैसेज के अंत में नमस्कार की मुद्रा में जुड़े दो हाथ की इमोजी चिपकी थी।

‘किसी से भी मिलने की कोशिश न करें….!’

अभय इस वाक्य को बार – बार दुहराता रहा।

वह मैसेज के जवाब में लिखना चाहता था कि वह कुछ दिन क्वारंटीन रहा था। और कल ही उसकी रिपोर्ट आयी थी। वह नेगेटिव था। उससे किसी को कोई ख़तरा नहीं।

वह मैसेज टाइप करता और एक दो शब्द लिख कर मिटा देता। यह बात तो वह कितनी बार उन्हें बता चुका। फ़ोन पर बात भी की थी उनसे। उन्हें सब तो पता था। तो अब इस मैसेज के बाद उनसे इस बाबत बहस करने का कोई फ़ायदा नहीं। फ़ोन वह अब उठायेंगे नहीं। वह भारी कदमों पर भारी मन समेटे, घर के साथ गेट से लगी, उसके कमरे तक जाने वाली सर्पिल सीढ़ियाँ चुपचाप उतर गया। उसने अपने भारी – भारी दोनों सूटकेस उठाये और एक – एक कर गेट के बाहर रख दिये। ग़नीमत है कि गेट पर ताला नहीं मारा गया उसके लिए।

उसका मन भर आया। उसने डबडबाई आँखों से पोर्च के नीचे खिड़कियों के पार देखने की कोशिश की। उसे लगा दो जोड़ी बेचैन आँखें उसे हसरत से निहार रहीं। वही दो जोड़ी चंचल आँखें जिनके लिए हर शाम उमंग से भरा हुआ वह इस घर में कदम रखता था। उन मासूम आँखों में उसे घर दिखता, परिवार दिखता। सैंकड़ों मील दूर अपने घर से दूर एक घर। पर बाहर उजाला था और अंदर अँधेरा। उसे खिड़कियों के पार कुछ दिखाई नहीं दिया। उसे लगा उसे भ्रम हुआ था। यह परिवार, यह घर एक माया थी जो एक महामारी के सच के सामने धुआँ बन लुप्त हो गयी।

वह इस घर में पिछले दो साल से पेइंग गेस्ट की हैसियत से रह रहा। जिस मेडिकल कॉलेज में वह पढ़ रहा, वह बस यहाँ से डेढ़ – दो किलोमीटर की दूरी पर है। मकान मालिक को वह अंकल कहता, उनकी पत्नी को आँटी और उनके तेरह साल के बेटे अंकुर और आठ साल की बेटी मिनी का तो वह अभय भैया था। उसकी थकी शाम में आँटी के हाथ की गरम चाय और ताज़ा नाश्ता नई ऊर्जा भर देती। वह कुम्हलाए बिरवे से मज़बूत दरख़्त में बदल जाता। अंकुर अपने गणित और विज्ञान के सवाल सुलझवाता और मिनी दुनिया जहां की बातों और जिज्ञासाओं का पिटारा सिमटवाती। वह खुद को भावनात्मक सुरक्षा के मज़बूत क़िले में निशंक सुस्ताता पाता। फिर रात देर तक वह बेफ़िक्र पढ़ता रहता। इस अजनबी शहर में इस परिवार के रहते वह अकेला नहीं।  कितना बड़ा सहारा था उसके लिए यह भरोसा!

और अचानक आई इस विपदा ने सब कुछ बदल दिया। समय की धार अनजान राह पर बह निकली। वह तो मेडिकल की पढ़ाई के अंतिम वर्ष में ही था अभी।कच्चा थावह तो। पूरी तरह से डॉक्टर भी कहाँ बन पाया। औरकोविड – 19 नाम की इस महामारी का प्रकोप उन पर सहसा ही टूट पड़ा। दूसरे देशों में इसका आतंक वह दूर से ही देखते रहे थे। कहाँ सोचा था किसी ने कि इसके खूनी पंजों से वे भी दूर नहीं।

‘हमारे देश में तो कोरोना की ऐसी – तैसी हो जाएगी। ये विदेशी धरती में ही तांडव कर सकता है। यहाँ नहीं। यहाँ की गर्मी में जलकर ख़ाक हो जाएगा। फिर धूल – मिट्टी फाँकने वाले हम लोगों का ये क्या बिगाड़ पाएगा।’

लोगों केआपसी मज़ाक़ में वह भी शामिल हो जाता। औरों की तरह वह भी नहीं जानता था कि प्राकृतिक आपदाएँ और महामारियाँ उनके ऐसे उपहास पर मौन ठहाका लगाती हैं। यह महामारी भी उनके इस अति आत्मविश्वास पर क्रूरता से हंसती रही। जब इसके धीमे पदचाप का सुर बदला तो त्राहि – त्राहि मच गयी। उसे रोकने की कोशिश मज़ाक़ बन गयी। न किसी तरह का लॉक्डाउन काम आया और न ही कोई समझाइस। सबसे बुरी मार तो मेडिकल सेक्टर पर पड़ी। उन्हें न संभलने का मौक़ा मिला न ही कुछ ख़ास समझने का। वह इस महामारी का सबसे आसान निवाला बन रहे। काम का गहरा दबाव और स्टाफ़ की कमी से जूझते अस्पताल। नतीजा सबकी ड्यूटी लग रही। तो अभय की भी लगी। कोरोना के मरीज़ों की देखभाल करते हुए वह खुद कब अछूत हो गया। उसे पता ही नहीं चला। एक सप्ताह की कोरोना वार्ड में कठिन ड्यूटी करने के बाद वह कुछ दिन क्वारंटीन रहा। और तब तक वह बाहर ही किए गए विशेष इंतज़ाम में रहता रहा।

वहाँ से निकलने के बाद उसे ऐसी परेशानी झेलनी पड़ेगी, यह तो उसने सोचा ही नहीं। शुरुआती जून की झुलसती शाम में वह सड़क किनारे असहाय सा खड़ा गहरी सोच में गुम था। क्या करे, कहाँ जाए? उसका दिलोदिमाग़ सुन्न हो रहा।

सहसा उसे लगा किसी का फ़ोन बज रहा है। उसने इधर – उधर देखा कोई भी नहीं था। सड़क किनारे वह अकेला ही खड़ा था न जाने कितनी देर से। और फ़ोन भी किसी और का नहीं , उसी का बज रहा था बड़ी देर से।

उसने हड़बड़ाहट के साथ मोबाइल निकाल कर देखा। ओह!यह तोनिर्मल का नाम फ़्लैश हो रहा। निर्मल! वही उसका सहपाठी निर्मल! कोरोना वार्ड में दोनों ने साथ – साथ ही ड्यूटी की थी अभी।

ड्यूटी के बाद दोनों एक ही जगह क्वारंटीन रहे। निर्मल का अपना घर इसी शहर में है तो वह रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद अपने घर चला गया। और अभय यहाँ चला आया। कॉल रिसीव करते ही निर्मल का बेचैन स्वर गूँजा,

‘क्या करते हो, अभय! कब से फ़ोन कर रहा हूँ, फ़ोन क्यों नहीं उठा रहे?’ निर्मल की आवाज़ में बेचैनी थी।

‘कॉल सुन नहीं पाया, निर्मल!’ अभय ने उदास आवाज़ में जवाब दिया। उसकी डूबती आवाज़ ने निर्मल की छटी इंद्रिय का बटन दबा दिया।

‘क्या हुआ सब ठीक तो है, न? तेरी आवाज़ ऐसी मरी हुई क्यों है? इतना थक हुआ क्यों लग रहा?’

‘सड़क के किनारे सामान सहित एक घंटे से खड़ा हूँ, बेआसरा होने का दर्द क्या होता है, समझने की कोशिश कर रहा हूँ।’

अभय ने भरसक अपनी आवाज़ को सहज बनाए रखने की कोशिश करते हुए कहा। पर उसकी आवाज़ की रंगत में डूबते सूरज का धुँधलापन घुल गया।

‘क्या कहते हो, अभय? तुम्हें भी मकानमालिक ने कोरोना के डर से घर से निकाल दिया क्या?’ निर्मल सकते में था।

‘हाँ…!’ फ़ोन के दूसरी तरफ़ से मुचड़ते हुए काग़ज़ सी अभय की खरखराती आवाज़ आयी।

‘पर यार ये तो अच्छे लोग थे! तुम तो कहते थे, ये तुम्हें अपने परिवार का सदस्य जैसा मानते हैं। ये ऐसा कुछ कभी नहीं करेंगे।’ निर्मल ने विस्मय से पूछा।

‘हाँ, पर इन्होंने ऐसा कर दिया। कौन सा मैं इनका सगा हूँ?’ कहते – कहते अभय की आवाज़ भीग गयी। कुछ पल सन्नाटा छाया रहा। दोनों कुछ नहीं बोल पाए। सहसा निर्मल ने निर्णय के स्वर में कहा,

‘अभय जहां हो वही रुको, मैं बस दस मिनट में पहुँच रहा हूँ।’

जवाब में अभय कुछ कहता उसके पहले ही निर्मल ने फ़ोन काट दिया। वहाँ पहुँच कर निर्मल ने अभय के ना – नुकर की परवाह किए बगैर, उसका सामान उठाकर गाड़ी की डिक्की में रखा और उसे खींच कर अपने साथ की सीट पर बैठा लिया।

अभय संकोच के गाढ़े तरल में डूबता – उतराता रहा।

‘तुम्हारे घर में किसी को अच्छा नहीं लगा तो….तुमने उनसे पूछा कि नहीं।’ अभय की आवाज़ में घबराहट का दरदरा चारकोल घुला हुआ था।

‘एक अनजान शहर में, इन कठिन हालात में उनके बेटे के साथ भी ऐसा ही कुछ घट सकता है! और ऐसा हुआ तो उन्हें कैसा लगेगा?’ निर्मल ने गम्भीर आवाज़ में कहा तो अभय थोड़ी देर चुप रह गया। एक झिझक के साथ उसने फिर कहा।

‘पर एक बार पूछ तो लेना चाहिए था, पता नहीं उन्हें कैसा लगे!’ निर्मल अभय के संशय पर उस तनावग्रस्त माहौल में भी मुस्कुरा दिया।

‘यह उन्हीं की समझाइश है अभय! माँ – पापा की समझ के परे है इस मुश्किल घड़ी में लोगों का ऐसा अजीब व्यवहार। वे खुद भी तो डॉक्टर हैं, उनके लिए भी ये सब कुछ बहुतअजीब है।’ निर्मल ने बेचैन स्वर में कहा तो अभय बस इतना ही बोल पाया।

‘इसमें अजीब कैसा, निर्मल? हर कोई अपने हिसाब से अपना भला सोच रहा। समय ही ऐसा है! ऐसे में किसी को क्या कहें।’

‘हाँ, वैसे भी इंसानी फ़ितरत को समझना आसान कहाँ?’

अभय की बात सुनकर निर्मल ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा।

पल भर चुप्पी छाई रही। कुछ सोचते हुए निर्मल ने धीरे से कहा।

‘अभय जानते हो मैंने तुम्हें फ़ोन क्यों किया था?’ निर्मल के बोलने के लहजे से अभय ने सहम कर उसकी ओर देखा ।

‘क्यों किया था?’ अभय ने घबराहट में मशीनी अन्दाज़ में पूछा।

‘मीठी मैम….!’ निर्मल कहते – कहते ठिठक गया। जैसे बंजर ज़मीन में फसल – सा,उपयुक्त शब्द तलाश रहा हो।

‘हाँ…हाँ….मीठी मैम….मीठी मैम…क्या हुआउन्हें…..बोलो जल्दी!’ अभय का धैर्य जवाब देने लगा।

‘वे भी नहीं रहीं…. कोरोना उन्हें भी ले गया। अपनी मीठी मैम को भी ले गया, अभय।’ निर्मल की आवाज़, बेवक्त चलती तेज हवा में पत्ते सी फड़फड़ाती रही।

‘ओह… ओह… यह क्या हो गया? वे तो प्रेगनेंट थीं….एक साथ दो जाने गयीं! आजकल कुछ भी ठीक सुनने को क्यों नहीं मिलता, निर्मल!’

अभय की आवाज़ दर्द से उबल रही थी। निर्मल का घर आ गया। और दोनों गाड़ी में चुपचाप सन्न बैठे रहे। मीठी मैडम उन्हीं के मेडिकल कॉलेज में उनसे तीन साल सीनियर थीं। तमाम तरह के एहतियात बरतने के बाद भी यह महामारी जब चाहे, जिसे चाहे अपने चंगुल में दबोच ले रही। उन सब की चहेती मीठी मैम इसका ताज़ा शिकार थीं। वह प्रेगनेंट होने के बावजूद लगातार मरीज़ों की सेवा में लगी रहीं। उनके जाने का सदमा सब पर भारी रहा।उन दोनों पर कुछ ज़्यादा ही।मीठी मैम की स्नेहिल छाँव,सदा के लिए खो गयी। बस यूँ ही एक झटके में।इस खबर से दोनों का दिल किसी गहरे और अनजान समंदर में डूबगया। वह इससे बाहर कैसे निकलेंगे समझ नहीं पा रहे।

समय तेज़ी से बीतता रहा। अभय, निर्मल के घर पर ही ठहरा रहा। उनकी रोटेशन से कोरोना वार्ड में ड्यूटी लगती और उसके बाद वे कुछ दिन क्वारंटीन रहते। अभय कोरोना वार्ड में ड्यूटी के बाद क्वारंटीन से आज ही बाहर आया था। अगस्त महीने के ये आख़िरी दिन थे। जब – तब बारिश होती रहती। कोरोना का प्रकोप अपने उफान पर था इन दिनों। कम से कम अगले एक सप्ताह तक उसे कोरोना वार्ड में ड्यूटी लगने की उम्मीद नहीं थी। पिछली ड्यूटी बहुत भारी रही। कई लोगों को अपनी आँखों के सामने उसने मरते हुए देखा। ये सब देख – देखकर वह अंदर से खाली हो चुका था। कई बार उसे लगता जैसे उसे कुछ महसूस ही नहीं होता। वह निर्मल से पूछता। निर्मल फीकी हँसी हंस देता।

‘ज़िन्दगी जो दिखा रही है, देख लेते हैं! अपने हाथ में है ही क्या? जो कर सकते हैं, वह कर ही रहे हैं हम सब!’

‘आजकल ठीक से नींद नहीं आती, निर्मल! कितने ही चेहरे आँखों में तैरते रहते हैं। पता नहीं हम भी कब तक बचे रह पाएँगे।’ वह कुछ ज़्यादा ही उदास था।

और तभी अभय का फ़ोन बज उठा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे।

‘इस समय किसका फ़ोन हो सकता है?’

अभय चौंका। फोन उठाकर देखा तो फ़्लैश होता नाम देख कर हैरान हो गया। नम्बर उसके उन्हीं मकानमालिक शर्माजी का था। उसका मन कड़वाहट से भर गया।

उसने फ़ोन नहीं उठाया। फ़ोन बजता रहा। एक बार – दो बार – तीन बार!

निर्मल ने उससे आँखों ही आँखों में सवाल किया। अभय ने सिर झटकते हुए जवाब दिया।

‘पता नहीं किसका है। मैं इन्हें नहीं जानता।’ कहते हुए उसने फ़ोन साइलेंट पर किया और अपने कमरे में सोने चला गया। निर्मल उसे जाते हुए देखता रहा।

‘इसे सच में कुछ हो गया है!’ वह मन ही मन बड़बड़ाया। ‘हम सबको ही कुछ न कुछ हो गया है, इन हालात में!’ उसने सोचा।

सुबह उठने के बाद, अभय ने मोबाइल देखा तो चौंक गया। शर्माजी के नम्बर और उनकी पत्नी के नम्बर से दसियों मिस्ड कॉल थी। मैसेज भी थे। उनके बच्चों अंकुर और मिनी के।

‘पापा को कोरोना हो गया है, भैया! उनकी हालत बहुत ख़राब है। आपके अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने ही हमें और मम्मी को आपसे उस दिन मिलने तक नहीं दिया। न आपसे फ़ोन पर बात करने दिया। हम आपको पोर्च के साथ वाली खिड़की से जाते हुए बस देखते रह गए। मैं और मिनी उस दिन बहुत रोए। पापा को लगता था आप कोरोना फैला देंगे। उनसे भारी गलती हो गयी। प्लीज़ भैया, पापा को बचा लो। उन्हें माफ़ कर दो।

आपके अंकुर और मिनी।’

अभय अनमना सा यह मैसेज बार – बार पढ़ता रहा। उसे लगा उस दिन उसे ठीक ही महसूस हुआ। अंकुर और मिनी की बेचैन आँखें उस दिन खिड़की के पार अंधेरे में उसे सच में टटोल रही थीं।

अभय बड़ी देर तक फ़ोन लिए गुमसुम बैठा रहा। फिर कुछ सोचकर उसने अस्पताल मेंड्यूटी मैनेजर को फ़ोन लगा दिया।

‘तुम तो कुछ दिन का ब्रेक चाहते थे, अभय! ले लो, मैनेज कर लेंगे यहाँ। तुम्हारा स्वस्थ रहना भी ज़रूरी है।’ उधर से आवाज़ आई।

‘मैं ठीक हूँ, मैम! मुझे अभी ब्रेक नहीं चाहिए।’ अभय ने धीरे से कहा।

‘आर यू श्योर?’

‘यस मैम!’

अगले दिन वह उसी वार्ड में ड्यूटी पर पहुँच गया जिसमें उसके मकान मालिक शर्माजी थे। शर्माजी की हालत नाज़ुक थी। वह अस्थमा के रोगी थे। इसलिए कोरोना का प्रभाव उन पर गम्भीर था। अगले कुछ दिन अभय उनकी देख – भाल में जी – जान से जुटा रहा। उनकी हालत धीरे – धीरे सम्भलने लगी। जब वह थोड़ा सम्भल गए तो उन्होंने अपने आस – पास गौर किया। सेफ़्टी गीयर में ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी तरह ढके अस्पताल में किसी को भी पहचानना कठिन था। फिर भी उन्हें लगा कि बीच – बीच में विज़िट करने आने वाले जूनियर डॉक्टर में एक अभय भी था। पर वह निश्चित नहीं थे। और संकोचवश वह किसी से पूछने का साहस भी नहीं जुटा पाये।

एक रात, एक लम्बी और थका देने वाली ड्यूटी के बाद निर्मल और अभय आपस में मरीज़ों के बारे में बात कर रहे थे।

निर्मल ने गहरी साँस लेते हुए कहा,

‘तुम्हारे मकानमालिक शर्माजी की हालत तो अब काफ़ी नियंत्रण में है। लगता है अगले टेस्ट में इनकी रिपोर्ट भी नेगेटिव आ जाएगी।’

‘हाँ, लगता तो है।’ अभय ने गहरी सोच में डूबे हुए कहा।

‘तुमने बहुत ख़्याल रखा उनका, उसी का कमाल है!’

इस बात पर अभय हँस दिया।

‘काश की ऐसे कमाल हर मरीज़ के साथ हो पाता। ऐसी मेहनत तो हम हर मरीज़ के साथ ही करने की कोशिश करते हैं। पर कमाल हर मरीज़ के साथ नहीं हो पाता।’

अभय की इस बात पर दोनों के बीच पल भर को सन्नाटा छा गया। मानो सैकड़ों सितारे पल भर को एक साथ चमके और फिर बुझ गए।

‘हाँ शर्माजी के बचने की उम्मीद नहीं थी, पर उनके स्वास्थ्य में अब तेज़ी से सुधार हो रहा है। और वह 22 नम्बर के पेशेंट जिनका लग रहा था कि जल्द ही ठीक हो जाएँगे, उनकी हालत अचानक तेजी से बिगड़ गई और आज दोपहर वह नहीं रहे। न जाने क्या हुआ?’

निर्मल की आवाज में हताशा का धूसर रंग घुल गया।

‘हाँ, वही तो….न जाने कब तक चलेगा यह कठिन दौर। पर वह शोर- शराबा क्या था शाम को अस्पताल से बाहर? उनके रिश्तेदार अंत्येष्टि में शामिल होना चाहते थे क्या? या फिर डेडबॉडी लेने के लिए बहस कर रहे थे!’

‘अरे नहीं अभय! उनका कहना था कि उनका आदमी तो गया, अब कोरोना वाली डेडबॉडी से क्या मतलब उन्हें! वह तो परेशान थे कि पेशेंट के पास जो लेटेस्ट आइफ़ोन और सोने की चेन और अँगूठी थी, वह कहाँ गयी? उसी के लिए हड़कम्प मचा रखा था उन्होंने। मिलते ही शांत हो गए और फिर चले गए। यह समय कैसे – कैसे अजीब अनुभव से दो – चार करा रहा है।’ निर्मल इस अनुभव से विचलित था।

‘कुछ लोग कुछ ज़्यादा ही दुनियादार होते हैं, निर्मल! उन्हें लगता हैं, वे अपनी जगह सही हैं। और उन्हें लगता है – वे सही हैं, तो वे सही हैं। क्याकह सकतेहैं इस बारे में और। हम तो अपना काम जितना हो सकता है, करते चलते हैं।’

कहते – कहते अभय उठ खड़ा हुआ।

‘थोड़ा सो लिया जाए! कल फिर एक लम्बा दिन इंतज़ार में है!’

‘हाँ, कह तो ठीक ही रहे हो, अभय!’ कहते हुए निर्मल भी उठ खड़ा हुआ।

अगले दो – तीन दिन में अभय ने पाया कि शर्माजी काफ़ी हद तक स्वस्थ हो चुके थे। जब वह विज़िट पर जाता तो वह चौकन्ने हो जाते और चुपचाप घबराई नज़रों से उसे निहारते रहते। अभय तटस्थ भाव से अपना काम निपटाता रहता। और जिस दिन उनकी रिपोर्ट नेगेटिव आई, वह खासा खुश थे। अभय जब विज़िट पर आया, वह उसे निहाल होकर कुछ देर देखते रहे। फिर सेफ़्टी गीयर में ढके उसके हाथ को कस कर पकड़ कर बोल उठे।

‘अभय, बेटा माफ़ कर पाओगे मुझे? माफ़ कर दो, बेटा! मैंने तुम्हारे साथ कितना ग़लत किया था। तब भी तुमने मेरा कितना ख़्याल रखा। तुम मेरे लिए भगवान हो, बेटा।’

अभय उनकी बात पर मुस्कुरा दिया।

‘कैसी बातें करते हैं, अंकल? मुझे इंसान ही रहने दें! भगवान बनकर क्या करूँगा? बस दुआ कीजिए कि मुझ में मनुष्यता बची रहे, हालात चाहे जैसे भी हों! और मुझ में ही क्यों, हम सबमें मनुष्यता बची रहे, वक्त चाहे कितना भी मुश्किल हो!’

कहते हुए अभय ने गहरी नज़रों से शर्माजी की आँखों में झांका तोशर्माजी की आँखें स्वतः ही झुक गईं।

‘ठीक कहते हो, बेटा! इस रंग बदलती दुनिया में, मनुष्यता बची रही तो बहुत कुछ बचा रहेगा।’

अभय कुछ नहीं बोला, बस उन्हें चुपचाप देखता रहा। नर्स शर्माजी के डिस्चार्ज पेपर तेजी से तैयार करवाने लगी। अभय ने अपना मोबाइल निकालकर, अंकुर और मिनी को मैसेज टाइप कर सेंड का बटन दबा दिया।
‘तुम्हारे पापा घर आ रहे हैं!’
शर्माजी की सवाल छलकाती नज़रों से उसकी नज़रें मिली तो वह मुस्कुरा दिया।
‘अंकुर और मिनी को आपके घर वापसी की सूचना दे रहा था।’
‘देखूँ, क्या मैसेज लिखा अभय आपने?’
उत्साह से भीगे स्वर में कहते हुए शर्माजी ने अपनी हथेली फैला दी।
‘खुद ही पढ़ लीजिए!’अभय ने उन्हेंअपना मोबाइल पकड़ा दिया।
शर्माजी ने अभय का मोबाइल लेकर मैसेज पढ़ा और खुशी से काँपती अंगुलियों से टाइप करने लगे,
‘तुम्हारे अभय भैया भी सामान सहित घर वापस आ रहे हैं! मम्मी से कहो उनका कमरा ठीक कर लें!’

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सरिता कुमारी
जन्मवर्ष–1975

शिक्षा-एम.ए. (संस्कृत), इलाहाबाद विश्वविद्यालय

कृतियाँ
कहानी संग्रह – ‘उजालों के रंग’ 2018 में अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित
कविता संग्रह– ‘अनुभूति’ (वर्ष 2014), ‘एक टुकड़ा धूप का’ ( वर्ष 2015)
कहानियां परिकथा, नया ज्ञानोदय, कथादेश, इंद्रप्रस्थ भारती, पाखी, साहित्य अमृत, कथाक्रम, भवन्स नवनीत, कादम्बिनी, मधुमती, उद्भावना, निकट, आधुनिक साहित्य हिन्दी, चेतना समाचार पत्र, वार्षिक लोकमत विशेषांक, वार्षिक पुनर्नवात, दैनिक जागरण, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, प्रतिलिपि आदि में प्रकाशित
सम्मान – ‘महेन्द्र रत्न साहित्य सम्मान, 2019’

1 Response

  1. Shashi says:

    बहुत शिक्षाप्रद सामयिक कहानी ।बधाई ।

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