चन्द्र की कविता ‘दु:ख’

बहुत दुख से जब ग्रस्त हो जाता हूं मैं

तब भीतर भीतर
पसीज पसीज के
रो रो जाता हूं

तब अपनी पलकों पर
पसरी हुई कई कई दिनों की मैल को 
धो धो जाता हूं

और 
अंततः
किसी घनेरी रात की लम्बी नींद में चुपचाप 
सो सो जाता हूं

और इस तरह 
जिंदा लाश हो हो जाता हूँ …

चन्द्र के फेसबुक वॉल से साभार

 

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