धर्मपाल महेंद्र जैन की 4 कविताएं

धर्मपाल महेंद्र जैन

जन्म : 1952, रानापुर, 

जिला – झाबुआ (म. प्र.), भारत, 

स्थायी निवास – टोरंटो, कनाडा

शिक्षा : भौतिकी; हिन्दी एवं अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर

प्रकाशन :  पाँच सौ से अधिक कविताएँ व हास्य-व्यंग्य प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। दिमाग़ वालों सावधान एवं सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?” (व्यंग्य संकलन) एवं इस समय तक (कविता संकलन) प्रकाशित।

  1. मुझे तुम्हें वह लौटाना है

     

    मुझे तुम्हें वह लौटाना है

    जो मुझे मिला था।

    सूरज की किरणों के संग

    तुलसी को छू कर

    जो पत्ते-पत्ते छन कर आती थी

    हवा निर्मल

    मुझे तुम्हें वह प्राणवायु लौटाना है।

    जो कल-कल बहता था अविरल

    हिमाचल, विंध्याचल

    धरती के आँचल पर

    चट्टानों को शैव बना,

    कब मैंने उसमें घोल दिए

    क्षार-अम्ल, मारक विष

    मुझे तुम्हें वह निर्मल जल लौटाना है।

    वह अन्न-धान्य

    जो मिट्टी के उर्वर से पनपा था

    नहीं रसायन भेद सके थे जिसके तंतु

    जो प्राणी को जीवन देता था, ज़हर नहीं

    उस शस्य-श्यामला धरती माँ का

    सुख और वैभव तुमको लौटाना है।

    वह नील समुद्र अनन्त-अथाह

    जिसके मंथन से अमृत पा

    देवत्व पा गया पूर्व मनुज,

    आज समर का महाकुंभ है

    धारे है जंगी बेड़े

    कि एक प्रहार

    निर्जन कर सकता है कई देश

    ज्वालामुखी-से इस सागर की

    क्षुधा शांत कर

    मुझे तुम्हें वह नीर समुद्र लौटाना है।

    पाग़ल हाथी-सा मदोन्मत्त

    या अग्नि-सा आवारा बन

    मैंने ख़ुद ही नष्ट कर दिए सघन वन

    मैं अपने ही लोगों के

    नर-मुंडों से सुसज्जित था

    तो जीव-जंतु, जलचर-नभचर

    मेरे क्या लगते?

    मैं अहंकार के लावे में डूबा

    अब सोच रहा हूँ

    मुझे तुम्हें वह

    वसुधैव कुटुम्बकम लौटाना है।

    मुझे तुम्हें वह लौटाना है

    जो मुझे मिला था।

    2. सुबह

    ठंडे मटके में पानी चलाती 
    जब तुम्हारी चूड़ियाँ खनकती हैं माँ, 
    मैं सुनता हूँ 
    जल तरंग पर राग भैरवी, 
    माँ तब होती है सुबह।

     

    3. प्रार्थना

    श्रेष्ठतम प्रार्थना

    लिखने के लिए

    तमाम शब्द चुने

    ज़िन्दगी भर मैंने

    और लिखा ‘माँ’।

    4. शून्य को अर्थ देती हो कविता

    गिनती की तरह सरल हो कविता

    कि एक अंक बोलो तो

    अगला स्वतः आ जाए अपने क्रम में

    एक-एक को जोड़ती वह

    अनंत तक पहुँचे।

    गिनती की तरह सबको

    समझ में आती हो कविता

    कि किस अंक का मूल्य क्या है

    और हर कहीं

    वही हैं उसके मायने।

    गिनती की तरह सम और विषम को

    साथ लेकर चलती हो कविता

    कि कैसा भी हो अंक

    ऐकमेक हो जाए संख्या बनाने में।

    गिनती की तरह अपने अंकों से

    शून्य को अर्थ देती हो कविता

    कि वह सबसे आगे खड़ी हो जाए

    जब शून्य करार दिए जा रहे हों लोग।

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