धर्मपाल महेेंद्र जैन की 4 कविताएं

धर्मपाल महेंद्र जैन

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  1. संविधान

ना बाँचा, ना देखा,

सिर्फ सुना है संविधान के बारे में

पटवारी साब जानते हैं खसरा-खतौनी

दरोगा साब जानते हैं गाली-गलौच

कंपाउंडर साब जानते हैं दस रुपये वाली दवा

मास्साब को मालूम है विधायक जी का पता

पुजारी जी जानते हैं भगवान को

कोई नहीं जानता संविधान के बारे में यहाँ।

 

पास कस्बे में है कारीगर, मिस्त्री, धोबी, नाई, टेलर

हैं बहुत से लोग कामकाजी

सूरज उगते ही लग जाते हैं

अपनी दाड़की पर

उनका क्या लेना-देना संविधान से

मुझमें हिम्मत नहीं है उनसे पूछने की

ठेके के आगे नहीं जाती उनकी दुनिया।

 

ट्रॉफिक सिग्नलों, देवमार्गों पर

भीख मांगते बच्चे-बूढ़े

माफिया ने जिनकी आँखें गंगाजल से पोंछ दीं,

सफ़ेदपोश बाज़ारों में धकेल दी गईं युवतियाँ

ख़दानों में दब गए मज़दूर

पाग़लखानों की जंजीरों में जकड़े लोग

काश, मैं इन्हें सुना पाता संविधान।

मैंने सुना है, जो लोग सुन-पढ़ गए संविधान

सात पुश्तें तिर गईं उनकी।

 

 

  1. उस समय से

 

उस समय से इस समय तक

बस गड़रिए ही चले

गर्दन झुका भेड़ें जुड़ती रहीं।

 

करोड़ों भेड़ें लील गया महाभारत

कलिंग में बहीं खून की नदियाँ

धुँआ हो गया हिरोशिमा

वियतनाम, ईरान से सीरिया तक

आदमी ही कटा, गड़रिए चलते रहे

उस समय से इस समय तक।

 

राजवंशों की भृकुटियाँ झुका दीं प्रजातंत्र ने

तय था भर पेट घास मिलना भेड़ों को

सचेत हो गए गड़रिए

बदल लीं टोपियाँ, खेत और पगडंडियाँ

नहीं बदलीं भेड़ें, सिर झुका जुड़तीं रहीं       

उस समय से इस समय तक।

 

नहीं दिखी किसी को बंजर होती धरती

बिवाइयाँ फट पड़ीं उसकी छाती पर

दाने को तरसतीं

दर-दर भटकतीं

अंगूठे लगातीं भेड़ें

नहीं देख पाईं राजमार्ग की सड़क

उस समय से इस समय तक।

 

कोख में घुटे शिशु, माँ की लाश के साथ

भागते बच्चे, युवतियाँ और मर्द

नहीं लांघ पाए नक्शों की लकीरें

बस चश्मदीद रहीं भेड़ें

उस समय से इस समय तक।

 

बहुत बढ़ी दुनिया अख़बार में

चाँद, मंगल, ब्रह्माण्ड और परे

ज़हर होती हवा, फैलाती रही दमा, तपेदिक

ख़ाँसती रही बुढ़िया, तपता रहा बूढ़ा

लाचार, दवा के लिए तरसती भेड़ें

हाँकते रहे गडरिए 

उस समय से इस समय तक।

 

 

  1. नई पत्तियाँ आ रही हैं

नई पत्तियाँ आ रही हैं

सूरज, क्लोरोफिल को रंग दे रहा है

पूरा जंगल जो काठ-गोदाम सा दिखता था

आहिस्ता-आहिस्ता सँवर रहा है

बर्फ़ मिट रही है धरती को सजाने।

कोयल को सुनते हुए

वृक्ष वयस्क होने लगे हैं

उन्हें छेड़ने लगी है हवा। 

 

नई पत्तियाँ आ रही हैं

ठिठुरे किनारों पर चहल-पहल है

सुनहरी किरणों की थाप पर

झिलमिलाती जलतरंगें

बहुरंगी पंख फैलाए मोर उन्मत्त

बुलावे की बयार में हर कोई बह रहा है

किसी को नहीं जानना प्यार का अर्थ अब।

 

नई पत्तियाँ आ रही हैं

झुक रहीं कोंपल भरी डालियाँ

खुरदरी बिवाइयों से बेख़बर तना

फिर जड़ों से बात कर रहा है

लौटने को है बया, भूरी-पीली मैना

कल दिखी थी रक्तिम नीली चिड़िया

घास-फूस के तिनके समेट रहे गर्माहट

कि अंडे सेने में कर सके मदद

कल जीवंत होने को है

आ रही हैं नई पत्तियाँ।

 

  1. टेसीमेरी बिल्ली

 

प्यार की अलिखित भाषा

तुम्हारी तेज़ चमकती आँखों से तैरती

प्रकाश किरणों की तरह

सीधे दिल में चली आती है,

तुम्हारी एक छलांग में

बहुत कुछ उमड़-घुमड़ जाता है 

क्या कहूँ, कितना अच्छा लगता है तब।

 

बाहर की गर्म हवाओं के थपेड़ों से थका-थका

घर की शीतल हवा में

जब पहली साँस लेता हूँ

तुम्हारी आदिम गंध के साथ

कई बरसों की बासी यादें

ताज़ा हो उठती हैं

क्या कहूँ, कितना अच्छा लगता है तब।

 

मेरी चुटकियों के इशारों पर

भागती-नाचती

मेरे पैरों से लिपट कर

मुझे आगे बढ़ने से रोकती हो तुम

जानता हूँ

तुम्हें ऐसे ही प्यार करना आता है

कि मैं तुम्हें झुक कर उठा लूँ

तुम्हारे माथे को चूमते

क्या कहूँ, कितना अच्छा लगता है तब।

 

मेरी उंगलियाँ तो अवाक होती हैं

तुम्हारी फिसलती फलालेनी देह को थामती

तुम छूट कर भागना चाहती हो

और मैं कस कर पकड़ना,

तुम्हारे श्वेत-अश्वेत आवेशित रोवों से

मेरे भीतर मासूम-सा रोमांच बहने लगता है

क्या कहूँ, कितना अच्छा लगता है तब।

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