किसी एक पते की खोज में

डायरी के पन्ने
सोनू यशराज

गुम हुए एक दोस्त के लिए,जिसका पता भी गुम और चेहरा-मोहरा भी !

किसी एक पते की खोज में हर पते पर दस्तक देती हैं अपनी पूरी लहक के साथ हवाएं ! उड़ेल देती हैं हर मोड़ पर स्मृतियों की धुंध ..और धप से बैठ जाती हैं आँगन में ! क्या पता इस बार ले जाए इन्हें कोई ब्याह के !

एक आवाज़ मुझमें भी गूंजती है रह-रह के ,बहुत कोशिश की पकड़ने की ,पहचानने की पर सिर्फ आवाज़ और बचपन वाले हाथ से कोई कैसे बना सकता है साफ़ पूरी तस्वीर ! अलबत्ता स्मृतियों के कोने झाड़ने पर निकली एक धुंधली छवि जिसे हमारी पास आती आवाजों ने गढ़ा और दूर जाती आवाजों ने विस्मृत कर दिया !

उसके मेरे किराये के घरों के बीच की कॉमन दीवार हमारे बचपन के कद से बड़ी थी ! गेंद ने टप्पे खाए एक दूसरे के आंगन में और हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई .हमारे हाथ हमारे कद को लम्बा कर देते.हम हाथ नचाते और बात करते .वह पूछता तुम्हें मोगरे का फूल पसंद है या गुलाब का ,मैं कहती मोगरा और वह झट अपने लॉन के मोगरे झर देता दीवार के पार ,मैं झुक कर उन्हें बीनती तब तक और फूल आ जाते मेरे सर और कंधों पर! मैं पूछती काला खट्टा या आरेंज गोली। वो कहता दोनों और तब मैं  दो गोली झटपट कॉपी के ऊपर रख कॉमन दीवार पर रख देती !

हम बचपन के उस दौर में थे जब हम सिर्फ बच्चे कहलाते थे। हमारे लिए स्त्री-पुरुष खाँचें नहीं बने थे ,हमारी एक ही जात थी खिलंदड़ ! हम दोनों हद दर्जे के बातूनी !  स्कूल से घर आते ही बैग दीवार के उसी कोने के पास रखना ,बैग में से बोतल निकाल वहीं बैठ कर पानी पीना ,फिर उससे बतियाते हुए जूते टाई बेल्ट वहीं खोलना .उधर भी यही क्रम चलता ,हम माँ की एक आवाज़ पर दौड़ जाते  फिर आने के वादे लिए-दिए बिना और खा-पी कर वापस उस दीवार के पार अपनी धूनी यूँ रमा लेते जैसे उस एक ठौ में हमारे जीवन की विश्रांति.

हम दोनों तीसरी क्लास के साधारण विद्यार्थी ,बेशक हमारे स्कूल अलग थे पर भला हो सीबीएसई का। एक भी किताब में भेदभाव  न था। हम होमवर्क में मदद के लिए एक दूसरे की कॉपी लेते, टेस्ट  की तैयारी साथ करते .स्केचपेन और रंगों वाली मोम पेंसिले बदलते ,उसने मुझे बुकमार्क बनाना सिखाया ,मैंने उसकी ड्राईंग कॉपी में नदी किनारे पेड़  और पहाड़ी पर सूरज को टिकाया . उस दीवार पर रखे चार गमलों में हमने अपनी पंसद के गमले के लिए लड़ाई की . दीवाली पर रखे दीयों की कतार की बार- बार गिनती करते ,उनकी बातियाँ सही करते हमने दोस्ती के उजास को भीतर लिया होली पर गुब्बारे कैच किये , और गीले न होने पर खुद पर पिचकारियाँ मारी .दीवार कितना याद करती होगी हमें .

वह और दीवार वहीं रह गये  ,एक ही शहर के दूसरे छोर पर दूसरे किराये के घर में शिफ्ट होना था हमें …..ऐसा ही एक अप्रैल था।


कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं प्रकाशित
शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह –पहली बूंद नीली थी (बोधि प्रकाशन )  
सम्पर्क सूत्र : sonuyashraj5@gmail.com

4 Responses

  1. उमा says:

    बहुत प्यारा लिखा है

  2. Vinod Vithall says:

    आपकी तरह आपका लिखा भी कितना सुंदर है !

  3. Shashi says:

    बहुत सुंदर यादें सोनू ।मेरे विचार में हर एक के बचपन की यही कहानी होगी ।लेकिन कोई भूल गये कुछ ने अमर कर दी तुम्हारी तरह ।

  4. ज्योत्सना सक्सेना says:

    बचपन खिल उठा मन आंगन में

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