दिलीप कुमार की लघु कथा ‘चांडाल चौकड़ी’

दिलीप कुमार

पहली वो

वो स्त्रियों के सौन्दर्य का सामान, कट-पीस का ब्लाउज, पेटीकोट आदि बेचा करती थी मगर रोड पर दुकान न होने के कारण उसका माल बिक नहीं पाता था वैसे वो बहुत सी महिलाओं के घर जाकर भी कुछ न कुछ बेचने का प्रयास किया करती थी।

दूसरे वो

वो नौकरी से रिटायर थे, पेंशन पर्याप्त थी, परिवार छोटा था। व्यापार उनके खून में था, तिकड़म से पैसा कमाने का जोश बुढ़ापे में ऐसा तारी हुआ कि नौजवान भी शरमा जायें। उन्होंने जीवन बीमा की योजनाएं बेचीं, मगर बात न बनी। उन्होंने प्रकाशन का धंधा अपना लिया। वो भी साहित्य सेवा के नाम पर।

तीसरे वो

वो जिंदगी भर पढ़ाते रहे, शोध करते रहे। दिल्ली से सटे एक ऐसे कुख्यात शहर में वे पढ़ाते थे जहाँ पढ़ने-लिखने की संस्कृति न थी। बहुत सा शोध, ज्ञान, मोटी-मोटी किताबें उनके पास थीं, मगर अफसोस उनके आस-पास भी कोई न फटकता था। वो चाहते थे कि उनके शोधों पर शोध हो, मगर बहुत लुभाने पर भी उनके शोध पर शोध करने को कोई तैयार न हुआ।

चौथे वो

वो असफल कहानीकार थे। तीन पेज लिखते ही उनका दम फूल जाता था। दिल्ली के मशहूर साहित्यकारों के मोहल्ले में उनका घर था। ‘‘मार्निंग वाक क्लब’’ बनाकर पिछले तीस सालों से वे महान साहित्यकारों के साथ सुबह घूमने जाते थे, मगर बहुत बार चंदा देने के बावजूद कहानी विधा में किसी ने उन्हें घास नहीं डाली।

फेसबुक से वे चारों सम्पर्क में आये। पहली वो बोली ‘‘मैं आप तीनों को महान और आदरणीय कहूँगी और रात-दिन कहूँगी। खायी-अघायी गृहणियों का समूह मेरे पास है जो लेखन हेतु आतुर हैं’’।

दूसरा वो बोला ‘‘मैं सहयोगी आधार पर प्रकाशन का धंधा करूंगा, पहली प्रति मुफ्त दूंगा, बाकी तुम लोग बिकवा देना’’।

तीसरा वो बोला मैं मोटे-मोटे ग्रंथों का हवाला दिया करूंगा। मैं अकादमिक क्षेत्र से हूँ सो किताबी माल बढ़िया बिक सकता है मेरी अनुशंसा पर’’।

अंत में चौथा वो बोला ‘‘मैं सुबह मिलने वाले साहित्यकारों की फोटो पोस्ट कर दिया करूंगा। उन्हें आयोजन में बुलाऊँगा, जिसका पोस्टर बनेगा तो अच्छा साहित्यिक माल बिकेगा। किताबें हाथों हाथ बिकेंगी’’।

लेकिन हमारी विधा कौन सो होगी….? यक्ष प्रश्न। वे चारों कुटिलता से मुस्कराए। अब वे चारों लघुकथा के चार पाये हैं, दिन-रात लघुकथा बेचते हैं और लोग उन्हें चांडाल-चैकड़ी कहते हैं।  

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.