प्रज्ञा की कहानी ‘एक झरना ज़मींदोज़’

प्रज्ञा

प्रकाशित कृतियां

कहानी संग्रह-तकसीम, मन्न्त टेलर्स

उपन्यास—गूदड़ बस्ती, धर्मपुर लॉज

नाट्यालोचना और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर भी पुस्तकें प्रकाशित

संप्रति

एसोसिएट प्रोफेसर

किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

ई-मेल-pragya3k@gmail.com

एक प्रेम कहानी ऐसी भी!

जैसा उन्हें उस वक्त देखा, मैं वैसा ही पेश करने की कोशिश करूंगा जनाब! न कम ,न ज़्यादा। अब किस्सों में मेरी दिलचस्पी गहरी है पर इसका मतलब ये कतई नहीं है कि मैं चार आना, बारहआना का गोलमाल कर दूं। यूं करने को वो भी कर सकता हूं और ऐसा कि झूठ को सच और सच को सफेद झूठ। पर आज नहीं। ध्यान रखूंगा कि किस्से में तसव्वुर का तूमार इस कदर न बांधता जाऊं कि मेरी आंखों के सामने खुला सच गायब हो जाए और बात की जगह मैं बेबात की हांकने लगूं। इतनी नाइंसाफी… नहीं जनाब! ये गुनाह नहीं करूंगा। मैं आपको सौ फीसद सच बयान करूंगा। हां, एक-आध फीसद ऊपर-नीचे हो सकता है तो इतनी छूट तो किसी दिलचस्प किस्से के एवज में मुझे मिलनी ही चाहिए। अब इंसान हूं कोई कैमरा तो हूं नहीं कि किस्से के किरदारों का हर अंदाज़ तस्वीर में कैद कर लूं और उनकी गुफ्तगू, उनकी खामोशी, आंखों का दरिया और दश्त दोनों हू- ब -हू निकाल लाऊं। फिर भी दावा करता हूं इन आंखों ने जो देखा, कानों ने जो सुना- मैं उसे ही तवज्जो दूंगा, नाक को नहीं। नाक न जाने क्या-क्या सूंघ लेती है और नाक के इशारे पर चलने से आंख-कान की ऐसी-तैसी हो जाती है। इसलिये नाक की सुनना और सुनकर उसकी राह पर चल पड़ना बड़ा जोखिम का काम है। ऐसा कि आदमी बस पागल हो जाए। आप ये न समझें कि सच्चे किस्सों की दुश्मन एक नाक ही है। अब मेरी ज़बान को ही लीजिए, ये भी कुछ कम नहीं बल्कि नाक से इसे कुछ ज़्यादा ही समझिये। यूं भी नाक के ऐन नीचे लबों की किवाड़ में बड़ी मुस्तैदी से आंख-कान की सोच को अपने मर्ज़ी मुताबिक रंग देती है। दिमाग से इसकी बरसों पुरानी आशनाई ठहरी। उसी के दम पर जोखिम पालती है। दिमाग के हुक्म की तामील ऐसे करती है कि मैं किस्से को पेश करना चाहता हूं पर ज़बान अपनी टांग अड़ा देती है। बड़े लंबे पैर हैं इसके। बस हुज़ूर! ये जान लीजिए कि अपना किस्सा सौ फीसद बचाने में को मैं अपना जिगर लिए तलवार पर दौड़ता हूं और आप कितनी आसानी से कह देते हैं कोरी हकीकत है अफसाना कहां? क्यों जनाब हकीकतें, अफसानों की बुनियाद नहीं होतीं?

          पर आपको पहले ही बताये देता हूं ये काम इतना आसान न होगा। आप समझदार हैं इशारा ही बहुत होगा। मान लीजिए ,ज़बान रोकने के बाद भी फिसल ही गई… तो? कीड़े पड़ें इस मुई ज़बान में ,न आगा देखे न पीछा इसे किसी करवट चैन नहीं।

          तो किस्सा मुख्तसर-सा कुछ यूं है कि उस दिन मुझे कोई काम न था। वैसे तबियत का काहिल नहीं हूं पर कभी-कभी अंदाज़ काहिलाना हो ही जाता है। मेरी काहिली भी आला दर्जे की है जनाब! काम से तौबा कर लेगी पर तफरीह को चांद पर भी चली जाएगी। उस रोज़ मेरी सूरत से ही काहिली टपक रही थी, आईने ने सुबह से ही ये राज़ फाश कर दिया था। काहिली के इस आलम में मैंने सोचा क्यों न घुमक्कड़ी के शौक को परवान चढ़ाया जाये पर ज्यूं ही हाथ अलमस्त होकर जेब में पड़ा वो इस कदर कंगाल निकली कि एक ठाठदार दिन बिताने की उसकी औकात न थी। घुम्मकड़ी कहीं मेरे फक्कड़पने पर कुर्बान न हो जाए इसलिए मैं अपने कदमों का भरोसा लिए पहुंच गया अपने पुराने दिनों के भीड़ भरे उस रेस्तरां में। ये लड़कपन से मेरा पक्का यार है। मैंने यहां के किस्सों से खूब कमाया है और आप जैसे कितने ही मेहरबानों की दाद भी पाई है। न, न जनाब! इस जगह को देखकर ऐसे नाक-भौं न सिकोड़िये। हां, फर्श ज़रा चीकट परतों से सजा है , खाना भी सस्ता है, भीड़ बहुत ज़्यादा है पर है ये ज़िंदा कहानियों का अड्डा । यहां हर तरफ कहानियां बिखरी हैं । वो देख रहे हैं ,अरे ! वही आपकी नाक की सीध में, देखिये हां, वहीं उस कोने की टेबल पर। रोज़गार की तलाश में दर-दर भटकते नौजवानों ने उसे आबाद किया है। चेहरे देखिये कैसे कुम्हला रहे हैं पर उम्मीद का दामन कैसे कसके थामे हैं। ज़रा टेबल की सूरत भी देखिए जिस पर जिस्म की खुराक की बजाय उनके कागज़ात बिखरे हैं। आंखें कागज़ों पर ऐसे चिपकी हैं कि आज ही बारोज़गार होने का इल्म ढूंढ, बेरोज़गारी के सब तिलिस्म भेद लेंगी। ‘हिम्मत -ए- मरदा, मदद -ए- खुदा’- टेबल बारबार इसकी ताईद करती जान पड़ रही है। मेरी नज़रों से छिप नहीं सका लकड़ी के चार पतले पायों पर नौजवानी का सबसे भारी बोझ टिका था। लकड़ी सागवान थी या शीशम मैं क्या जानूं जनाब? इस काबिलियत से मैं ज़रा महरूम हूं।

          अब देखिए! एक तरफ उन नौजवानों का हौसला है तो ठीक उनसे दाईं ओर की चौथी टेबल पर ही ग़ौर फरमा लीजिये। जिस्म है या मांस की चलती-फिरती आलीशान इमारत। सामने रखी खुराक ऊंट के मुंह में ज़ीरा। हद है, इन्हें देखकर लगता है जिंदगी के लिए खुराक नहीं, खुराक ही जिंदगी हो चली है। देख लीजिए, तिल धरने को जगह नहीं है पर दस्तरखान पर खाना ऐसे लदा है कि जिंदगी का आखिरी खाना हो। निवाला भकोसने का ये हुनर सबके पास नहीं होता। किरदार और भी हैं, ज़रा वहां देखिए! चंद शेरदिल बूढ़े भी यहां हैं। अरे! वहां उस बाहर खुलते दरवाज़े की ओर। दिखे न अब वो पेंशनयाफ्ता बूढ़े। इनके इत्मीनान की आप न ही पूछें। इनकी बला से दुनिया वक्त से आगे कहीं भी और कितनी ही दूर भागी चली जाए। घर से बेज़ार ऐसे बैठे हैं कि रात तक कितने मुल्कों की कहानियां कह-सुन जाएंगे। घर जो इनके लिये घर नहीं रहे, ये घर तलाशते यहां जमे हैं। शरीर अधमरे हैं पर बातें सुनिये इनकी, पड़ोसी मुल्क को चुटकियों में लोहे के चने चबवा आएं। जनाब! यहां बैठे-बैठे पोपले मुंह से दुश्मन के दांत खट्टे कर आयेंगे। अब टेबल तो कई हैं जनाब ,किस- किस का किस्सा कहूं? ये सब पुराने हैं। यहां इंसान भी ज़़्यादा हैं और कहानियां उनसे भी ज़्यादा।

          जनाब! नये किस्सों का शिकार करना पड़ता है। वे आपकी झोली में यूं ही नहीं टपक पड़ते। मैं चुनकर ऐसी जगह ढूंढ निकालता हूं, जहां कुछ तीखा-तीता किस्सा मिले। मेरा दावा है हुज़ूर! बेरौनक चेहरों के पीछे भी बड़े अल्हड़ किस्से होते हैं और अल्हड़ उम्र भी खासी बेरौनक। बस नज़र होनी चाहिए उनकी दास्तां ताड़ जाने की। ये वो हुनर है जो सबमें नहीं होता। गर होता तो आप ही न भेद लेते मेरी ही तरह चेहरों के पीछे के किस्से। तो बस, मैं किसी टेबल को निशाना साधकर और अपनी टेबल को मचान बना किस्से के किरदारों की घात में बैठ जाता हूं। वक्त, घड़ी की सुइयों से नहीं मेरे किस्से की तलाश पर जाकर दम लेता है। मेरी नाक सबसे अच्छे किस्से की खुशबू सूंघ लेती है। मेरी रूह उसकी धड़कन पहचान लेती है और मैं अपनी काहिली को बेहतर अंदाज़ देकर यहां ऐसे बैठ जाता हूं कि मुझे दुनिया की कोई परवाह ही नहीं। मानो मैं हूं और मैं हूं ही नहीं और जब सबकी निगाह में मैं बेकार आदमी बन जाता हूं तो वे मेरी मौजूदगी में भी बेपरवाह अपने एहसासात की गुफ्तगू को मीलों तक दौड़ा देते हैं। बस मैं इसी मौके को आप लोगों के लिए हड़प लेता हूं। शिकार की गर्दन पर मेरी पकड़ इस कदर मज़बूत होती चलती है कि वो फौरन से पेश्तर मेरा निवाला बनने के लिए हाथ जोड़ने लगता है।

          तो लीजिए हुज़ूर! आज की मेरी खोज मुकम्मल हो गयी। शिकार मेरे ऐन सामने है। मेरे होने को न होना मानकर बेतकल्लुफ और बेफिक्र। बस मेरे मन के मुताबिक। अब मेरी करामाती नज़र किस्सा खोज लाई। यूं करामाती नज़रों की सीध में बेज़बान बैठे कानों ने भी कुछ कम कमाल नहीं किया था। अक्सर किस्सा कुरेदने के लिये ये कान कई करतब करते हैं। सबसे पहले तो मेरे कुछ लंबे और घने बालों की ओट में ये बेहद कम ही दीखते हैं। अब बेकान इंसान से किसी को कैसा खतरा? फिर मैं अपने बेहैसियत बाने  में पूरे ज़माने की काहिली उंडेलकर ऐसा जादू करता हूं कि लोगों की नज़रों से गायब ही हो जाता हूं। बस इसी पल मैं कानों को बालों के पर्दे की आड़ में शातिराना अंदाज़ में साध लेता हूं। बालों के पर्दे में एक नामालूम-सी शख्सियत में मेरे कान, मेरे किस्से के किरदारों की आवाज़ के रास्ते मुस्तैद हो जाते हैं। मजाल है आवाज़ की कोई हरकत मेरे कानों से रास्ता बदलकर कहीं और चल दे। इसके बाद कान-आंख की यारी मुझे नवाज़ती है फिर आज तो दिल से उठती शबनम ने भी जान लगा दी । मैंने इल्म से ही नहीं इश्क में भी कई बेगै़रत हादसे झेल कर जान लिया था कि मेरे सामने बैठे ये दोनों इश्क की राह पर चलकर बहुत दूर निकल आए हैं। उनके चेहरे और हरकतें उनका फसाना बयान कर रही थे। वो नये जोड़ों जैसे शर्मीले कतई नहीं थे। नये जोड़ों की कुछ न पूछिये जनाब। शुरू-शुरू में तो वक्त से वक्त चुरा लाने का ऐसा हुनर साधते हैं कि आप न ही पूछें तो बेहतर। बात नहीं, बेबात मुस्कुराते रहेंगे। ठीक यहीं कितनी टेबलों पर ऐसे-ऐसे जोड़ों के किस्से दफ्न हैं कि आपको कहां तक बतलाऊं ? वैसे इस बड़े शहर में गरीब आशिक के लिए इश्क की मनमाफिक जगह भी कहां हैं? पर जिसने इस जगह को खोज लिया उसे मुंह मांगी मुराद नसीब हुई। तो कहां था मैं? हां नए जोड़ों पर… मुस्कुराते हुए, हर पल एक-दूजे को छूने की उनकी कोशिशें। जिगरा है हुज़ूर। भरी महफिल में दिल निकालकर हथेली में सजाकर बढ़ा देते हैं। बड़े ग़ौर से देखा है हुज़ूर मैंने, मोहतरमा के बाल कायदे से बने हैं फिर भी मियां जी बार-बार लट को उलझा समझ, सुलझाने पर आमादा हैं और कुछ ही देर में मोहतरमा भी खुल जाती हैं। अब सबके सामने पाकीज़गी भी निभानी है और इश्क भी लड़ाना है तो इठलाती हुई मियां के दिल, नहीं- नहीं जेब के पास न जाने कौन-सी गर्द हरदम झाड़ती ही रहती हैं। कभी-कभी तो मैंने देखा है इतना सारा खाना मंगवाने पर भी घण्टों बैठकर खाने को चुभलाकर सब बिगाड़ देते हैं। प्याले में चम्मच चक्कर खाती है और खाती ही चली जाती है। प्याला उठाने की एक हरकत होती है और अगले ही लम्हे कुछ ऐसी हंसी की बात होती है कि चम्मच फिर प्याले में पसर जाती है। मैं बदनसीब उसे ताकता चला जाता हूं। नदीरों की तरह उनकी चाय और निवालों पर मेरी आंखें घंटों लगी रहती हैं और मैं मन मसोसकर चचा की याद कर लेता हूं-‘ गो हाथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है…’

          तो अब इस नए किस्से पर लौट आइये । उनके इश्क की बात मेरे लिए काफी सुकून से भरी थी। जो खुशी मुझे कभी नसीब न हुई इन लोगों को तो हुई। उनका पैरहन उनकी खुशी का अफसाना बयां कर रहा था। कोई हीरे-पन्ने, नीलम-जवाहिरात उनमें न जड़े थे। न ही सोने-चांदी के तारों की बुनावट  उस पर थी। मुझ कमनसीब की तेज़ आंखों ने पकड़ लिया कि ये रेस्तरां किसी टाट की मानिन्द था और उनकी पोशाकें उसमें रेशम का पैबन्द। चेहरों पर भी खाए-पिए का नूर टपक रहा था। मेरे दिल पर दिमाग का हथौड़ा टन्न-टन्न  बजने लगा – ये रेशम किसी रेशमी जगह न होकर इस टाट में आखिर क्यों अटका? और मेरे मन की आवाज़ ने मुझसे कहा इश्क के दिनों का मौसम उनके लिये शायद यहां अब तक रुका खड़ा है। दोनों उसके गुलमोहर में बैठने फिर चले आये हैं यहां। पहले भी यहां आते रहे हैं ऐसे आशिक।  यूं समझिये किस्से का सिरा मेरे हाथ प्यासे को दरिया-सा लगा। अब तो मान जाइये मेरी काबिलियत का लोहा। न भी मानें पर अब सिरे से सिरे और रेशे से रेशे जोड़कर मुझे अफसाना बुनना है। यानी अब मैं अपने काम को अंजाम देने वाला हूं। मैं उनके उस गुलमोहर को जीने की उम्मीद में लग गया जो मेरी ज़िंदगी में बहार बनकर कभी नहीं उतरा था। उसके चटख लाल अंगारे मेरी शाख पर कभी न खिले थे। नन्हीं-नरम पत्तियों से भरी उसकी मज़बूत डालें मेरे यहां कभी न झूमी थीं। फिर शाख के छाते के नीचे कोई शोख किस्सा भी कहां इठलाया था? प्यार हरेक की ज़िंदगी का सच कहां होता है? हां कई बार इश्क-सा मुझे ज़रूर महसूस हुआ था पर वो इ- श्- क की तरह था कभी पूरा इश्क नहीं।

तो अब मेरे आंख-कान-नाक ने उनके गुलमोहर का रुख किया।

‘‘याद है बहार! कितनी बेताबी से यहां तुम मेरा इंतज़ार करती थीं । कितना खिल जाती थीं तुम यहां मुझे देखकर। जानती हो इस जगह का नाम सिर्फ गुलिस्तां ही हो सकता है जिसमें आज भी मेरी बहार रुकी है। ये गुलस्तं जो पतझड़ में भी बहार था। बेइंतहा गर्मी में भी तुम ही मेरी ठंडक थीं। उदास अंधेरे में तुम मेरी रौशनी। मुझे यकीं दिलाओ न आज फिर बहार। फिर से अपने सारे रंग और रौशनी लिए तुम मेरे बरामदे में दाखिल हो जाओ।’’

आह! बहार…क्या नाम था। हो न हो इस बहार के आशिक का नाम गुल ही होना था। कुछ और हो भी कैसे सकता था? उसके लबों से निकले अल्फाज़ मेरा कलेजा निकाले लिए जा रहे थे। उस बहार का ये गुल कितना शीरीं था। ये बहार कितनी खुशनसीब थी। किस कदर शबनमी था ये गुल। कलेजा चीरकर उसके एहसास सारी फिज़ा में तैरने लगे। एक नज़्म थी जो माहौल में धीमे-धीमे गूंज रही थी। कोई इतना दिलकश भी होता है भला? अब मैंने जाना बहार का रंग इसी गुल से बरकरार है। गुल के एहसास की गहराई पाने मेरी नज़र ने बहार की आंखों में झांका। पर ये क्या जनाब! आप भी वही देख रहे हैं जो मैं देख रहा हूं? या मेरी आंखों का धोखा है। मैं हैरान हूं। ज़रा देखिए तो हुज़ूर! उसकी बहार को। चलिए मैं ही दिखाता हूं आपको। बहार के आंगन में एक कली न चटखी। उसके कानों ने ये नज़्म सुनी ही नहीं। एक बेहरकत खामोशी। हैरान था मैं, ये गुल की बहार हो सकती है भला? माना कि मेरी नज़रों का धोखा हो पर जनाब! उसकी नज़रों में कोई गहरा समंदर न दिखा। कहां डूब रहा था ये गुल? मेरी हैरानी ने मेरी दिलचस्पी को हज़ार गुना बढ़ा दिया था। मेरी नाक कुछ सूंघने को बेताब हो उठी।

 ‘‘याद है तुम्हें घंटों हमारा यहां बैठना? वक्त की हर बंदिश से परे…वक्त ही क्यों ज़माने की हर बंदिश से परे। हम थे और हमारा मौसम था। तुम्हें बाहों में भर लेने का जुनून था। तुम फौलाद थीं और मैं चट्टान था। मेरी जान! उन दिनों तसव्वुर में भी बस प्यार ही था। मेरा एक दिन भी तुम्हारे प्यार के बिना न गुज़रा था। मेरा तसव्वुर भी मुझे अक्सर यहीं पहुंचा देता था। रोज़ नींद में चलकर मैं यहां तुमसे मिलने चला आता। नींद थी या खुमार था पर ये गुलिस्तां हमेशा मुझे महकता मिलता था।’’

          अर्से बाद किस कदर ये गहरा प्यार मुझे बहाए ले जा रहा था। ओह! आज हीर-रांझा, शीरीं-फरहाद, चक-हब्बा, सोहणी-महिवाल का बरसों का अधूरा फसाना गुल की शक्ल में पूरा हुआ जान पड़ रहा था। कोई नज़्म महकने लगी। इस गुल पर मेरा दिल आ गया। ऐसे गुल चमन में अब कितने कम ही खिलते हैं। बहार नोंचते हाथ यहां ज़्यादा हैं। पर ये क्या, गुल के हाथों ने बहार का हाथ थामा ही था कि उसने हाथ खींच लिया। धीमे से नहीं झटके से। इतनी बेरुखी? इश्क की बेकायदा दुनिया ने कबसे कायदा सीख लिया? हाय! ये बहार शबाब पर होकर भी अधूरी थी। मेरा शक यकीन में बदल रहा था। गुल, गुल था, बहार बदली हुई थी। उसके लिए इश्क की किताब बंद होकर दुनिया के फलसफे में आखिर क्यों ढलने लगी? बहार की हर हरकत बयां कर रही थी कि ये गुलिस्तां अब उसे रास न आ रहा था। उसकी आंखें गुल पर नहीं इधर-उधर लगी थीं। शायद इस चमन में उसे दूसरी आंखों की परवाह हो चली थी। गुलिस्तां का अंधेरा ही नहीं आज उस पर चढ़ी ज़माने की गर्द भी उसने देख ली। अब न उसे नज़्म सुनाई दे रही थी न माहौल की खुशबू उसे दीवाना बना रही थी। दिल ने बड़ी साफगोई से कहा- हाय! मेरा गुल,किस कदर बेखबर था। उसके इश्क का गुलिस्तां मुरझाकर सूखने को था। उसकी आंखों को अपनी तबाही दीख नहीं रही थी जिसे मेरी नाक ने अब तक सूंघ लिया। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगा- बहार! तुम इतनी जल्द बदल गईं? तुम क्या गुल को भी बदल डालोगी? कितनी बेदर्द हो बहार…प्यार को प्यार न रहने देने पर आमादा। मेरे कानों ने गुल की फरियाद सुनी-

          ‘‘कुछ बोलो न बहार? आज फिर से खोल दो शायरी का पिटारा। ज़बानी याद है तुमको वो नगमें जो हम साथ गुनगुनाया करते थे। आज फिर मेरी फरमाइशें हों और तुम्हारी आवाज़। आज भी फिक्र न हो ज़माने की, न कोई पर्दादारी हो। दोहरा दो-‘चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार सजे… ज़िंदगी-सी प्यारी वो गज़ल, हमारी मोहब्बत की पहचान ।’’

  आह! क्या याद दिला दिया प्यारे गुल! बहार के सच्चे आशिक। सारे चमन में तुम-सा कोई दीवाना नहीं। पर अब भी बहार, गुल से उखड़ी और बेज़ार। ओ! बहार के आशिक, हाय!हाय! गुल, तुम्हारा इश्क अपने उरूज़ पर है। तुम्हारी यारी आज भी गुलशन से है पर बहार तो होंठ सिए बैठी है। यूं मुस्करा भी रही है जैसे एहसान किए जाती हो। मैंने भांप लिया हुज़ूर! आप माने न माने इस लम्हे में पुरानी मोहब्बत की तासीर बाकी नहीं है। बहार, बहार ही थी पर नज़ाकत कुछ ज़्यादा थी। गुल को अपनी खूबसूरती का एहसास कराती नज़ाकत। वो खूबसूरती जिसके आगे अब ये गुलिस्तां फीका था। गुल अपनी रौ में था नहीं तो एहसास- ए -कमतरी में ख़ाक हो जाता। पर जनाब, मेरा पुराना तजुर्बा है। जान लीजिए, ये गुल आखिर कब तक गुल रह सकेगा? बहार की मोहब्बत में दिखावे का बारीक रेशा मैंने देख लिया है। दुनियादारी का रेशा। वो प्यार जो दुनिया के डर से महफिलों में लड़खड़ाए, प्यार कहां रहता है? इश्क के बीच ये नज़ाकतें गुलिस्तां खाक करती हैं। मैंने देख लिया ज़माने की दीवारों ने बहुत जल्द बहार को कैद कर लिया। तेज़ी से भागते वक्त को उसका घड़ी-घड़ी देखना। कुछ कहने को होना और अचानक खामोश हो जाना। गुल की बातों में उसका दीदा न लगना हाय! हाय!… बहार कैद है और गुल आज़ाद पंछी। उफ्फ…पर सुनिये तो सही कुछ कह रही है-

‘‘ वक्त बदला, उसके साथ ज़माने का चलन भी करवटें ले गया पर तुम न बदले गुल। आज भी बिल्कुल वही। राई-रत्ती का फर्क नहीं। उस वक्त भी तुम्हें माज़ी कितना सुकून देता था । हरदम उसमें गाफिल रहते। मैं आज की बात करती तुम फौरन अपने कल में छलांग लगा देते। तुम्हारा सुरमई माज़ी, तुम्हारे इश्क के फसाने, तुम्हें दिलोजान से चाहने वाली दिलकश और मासूम माशूकाएं। याद हैं मुझे ख्वाब की आगोश में जाती मेरी सारी शामें जहां तुम थे, कुछ गजलें थीं रटी-रटाई जिन्हें मौका-बेमौका तुम किसी रस्म-सा निभा देते थे और तुम्हारी खुशी के लिए मैं भी उनमें डूबती चली जाती थी। पर मेरे आगे ज़िंदगी की चट्टानी असलियतें थीं और तुम्हें हवा में उड़ते बुलबुले पसंद थे। उनके छिटककर बिखरने का लुत्फ उठाते थे तुम। मैं तुम्हारे संग मुस्कुराती थी पर कमाल है वो बुलबुले मुझे तो कभी नहीं दिखे। तुम्हारी खुशी की खातिर ही मैं उन्हें न देखते हुए भी खुश हुआ करती थी ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी बातों में सामने बैठी मैं तुम्हें कम ही दिखाई देती थी।’’

ये क्या हुज़ूर? मेरे शौक और आदत को जिसे मैं अपना पेशा बना चुका था इन लफ्ज़ों ने एक झटके में चूर-चूर कर डाला। मेरा प्यारा गुल और बहार की जानलेवा बातें। यकीं की हद से बाहर। एक तरफ फिरनी की मिठास और दूसरी तरफ नीम चढ़ा करेला। कौन गलत ? कौन सही? ये सवाल हल करना मेरे लिए बवाल- ए -जान । पर मैं कोई मुंसिफ तो था नहीं और किस्से में किसी की तरफदारी से बचना भी था। माना मुंसिफ नहीं पर मैं इंसान तो हूं। इंसान जिसके पास एक दिल है और ईमान से कहूं तो मेरा दिल गुल के संग धड़क रहा था जनाब। इधर हंसते हुए अपनी बात कहते-कहते बहार बहुत संजीदा हो गई। उसे सुन और देखकर मैं भी हैरान-परेशान था। मन अभी भी अपने गुल की ओर भाग रहा था। उसकी मुलायम बातों का जादू मेरे सर चढ़कर बोल रहा था। उफ! सुनिये,उसने जैसे अपना दिल निकालकर रख दिया हो –

          ‘‘तुम्हें याद है उस साल की वो आखिरी शाम। हमारी वो मुलाकात। वो ढलता साल, नई ज़िंदगी का आगाज़ था। वो फव्वारा यहां से कुछ दूर ही है। सांझ के साथ उस फव्वारे की सतरंगी रौशनी में भीगते हुए हम नहा गये थे। याद करो तुम उसे झरना कहती थीं। सतरंगी झरना। फव्वारे के बीच बनी  नुमाइशी चट्टानों पर पानी सरगम की तरह उछलता था। बड़ी से छोटी चट्टान पर गिरता पानी और उसकी बौछारें तुम्हारे चेहरे पर जमती जा रही थीं। सर्द रात में ठंडी बूंदों की बारिश और तुम्हारे चेहरे का नूर। अपने हुस्न से बेपरवाह तुम्हारा बूंदों को उचककर अपने चेहरे पर रच लेने का जज़्बा। मेरी हथेलियों में भर गईं थीं वो सब बूंदें। चलो न आज फिर वही नूर लौटा लाएं।’’

          गुल अपनी आदत से मजबूर प्यार में गले नहीं सर तक डूब चला था। मेरा बरसों का तजुर्बा यों ज़ाया न गया। गुल हर हाल में प्यारा था। ग़ौर से देखिए उसके चेहरे को, आज भी उस शाम का जादू बरकरार है। उसकी आंखें चमक रहीं हैं, वह बेताब है बहार को अपनी आगोश में लेने के लिए। पर बहार की नज़रें हर असर से बेखबर। बेखबर न कहिए बेअसर कहना ही मुनासिब होगा। बड़ी सख्त जान है जनाब। माशूक के दिल को जैसे जानती ही नहीं। इतना संगदिल होना भी क्या ठीक है? अरे! अरे सुनिए कुछ कह रही है। ध्यान से देखिए उसके चेहरे को उसने ठीक अभी-अभी गुल पर एक चुभती-सी हंसी फेंकी है। ऐसी कि कलेजा दोफाड़ कर दे।

‘‘ वो इश्क का मौसम था। तुम्हें नादानियां रास आती थीं और मेरी उम्र ही नादान थी। नादान बने रहने के सुकून के क्या कहने फिर नादान साथ मिल जाए तो और भी मज़ा। तुम्हारी आदत में मेरी उम्र घुल चुकी थी। तुम पहले से जानते थे नादानी को मखमली एहसास बनकर बहना खूब आता है। मैं बहती रही, दूर तक बहती चली गई। पीछे तैरना सीख गई। बहना तुम्हारे संग था और तैर मैं खुद रही थी।’’

    बहार के इस तंज़ ने मेरी अब तक की खोज पर पानी फेर दिया था। क्या करता जनाब?  मेरे कानों को कुछ और सुनाई दे रहा था और आंखें कहीं और देख रही थीं। नाक कुछ समझने में नाकाम थी। अचानक कान बहार पर लग गए थे और आंखें गुल के मासूम, प्यार भरे चेहरे से हटने का नाम नहीं ले रही थीं। कितना सुकून था बहार की खामोशी में और बहार के बोलने से गुलिस्तां तबाही की हद तक जाने लगा। ज़बान ऐसी कि कोई कोई तेज़ कटार सीने में दर्द देती उतरती ही जा रही हो।

‘‘सच कहो बहार! तुम्हें वो झरना ज़रा भी याद नहीं आता?’’

बहार के तूफान खड़ा करने पर भी गुल अपनी बात से डिगा नहीं। क्या जिगरा पाया है, भई वाह। अब तो पत्थर का मोम होना तय था। अरी! मान भी जाओ बहार। मैं जैसे उसकी चिरौरी करने लगा। पर मेरा होना तो उसके लिए न के बराबर था। मुझे फ़कत एक किस्सा चुराना था उनके वक्त से और मेरे होने को उसने जान लिया तो फिज़़ू़ल है मेरी कलाकारी।

‘‘ जो तुम्हें झरना दीखता था उसमें मैं अपना घर देखती थी गुल…मैं घर चाहती थी। घर जो हमारा ठिकाना हो। जिसका एक पुख्ता पता दर्ज हो। पता, जिसकी पक्की गली हो किसी मोहल्ले की। मोहल्ले का कोई शहर भी ज़रूर हो। और तुम अक्सर मेरे हाथ पर जन्नत लिखकर चूम लेते थे। बहुत दिनों तक अपनी अल्हड़ उम्र में उस जन्नत को घर समझकर हथेली को गाल से सटाए मैं पूरी रात गुज़ार देती थी। डरती थी गोया हाथ हटाते ही मेरा घर तबाह हो जाएगा और मेरी जन्नत, दोज़ख हो जाएगी। मैं बिल्कुल तुम जैसी हो चली थी । जैसा तुम रंगते वैसी हो जाती थी। नीली,लाल, गुलाबी, पीली…. सतरंगी झरने-सी।  ’’

   हुज़ूर! अब मैं ठिठका। मेरे कानों तक आती बहार की बातों को मेरी आंख-नाक नहीं मेरा दिल ज़रा-ज़रा तवज्जो दे ही बैठा। मैंने ग़ौर किया कि बहार की इस शिकायत में एक सादगी तो थी जो हुस्न बनकर उस पर छाई थी। जिसे मैं अब तक गुल का करिश्मा समझे बैठा था। उसके प्यार का जादू… मैं अचानक भीतर तक हिल गया। क्या मैं भी तो बहार को अपनी ही तरह रंगने की कोशिश नहीं कर रहा था? यानी गुल का होकर बहार के खिलाफ खड़ा था। ये सोचकर मेरे के रोंगटे तक झनझना गए।

‘‘चलो न बहार! लौटा लाते हैं हम फिर अपने गुलमोहर को। तुम फिर बहार बनकर इस गुल को खिला दो। देखना, फिर से इश्क का मौसम चला आएगा।’’

गुल की आवाज़ लरज़ रही थी। उसकी पेशानी पर दर्द की लकीरें सिकुड़ रही थीं। पर बहार को उसकी बातों से ज़रा मसर्रत न हुई।

‘‘ याद है तुम कहा करते थे-गुल खिलता है तो बहार आती है। यानी बहार का वजूद गुल से था। कितने दिन मैंने इसे सच माना। पर मेरा वजूद? ‘चंद सिक्कों की चांदनी ने तुमको जला डाला है ’-यही कहा था तुमने? पर तुम्हारे अरमानों के आसमान को मेरा वजूद, वो मेरे सिक्के ही तो पूरा करते आए थे। मेरे पसीने की चमक से चमके वो सिक्के ही तो तुम्हारे हर आराम का सामान थे। याद है न तुम्हें? तुम्हारे लिए इश्क कोरी लफ्फाज़ी था। सच से आंखें मिलाने का वो एक लम्हा मेरी ज़िंदगी का कुल हासिल बन गया। मैंने झूठ को झूठ कहना और मानना सीख लिया। फिर झूठ की स्याह चादर हटते ही बाहर का पूरा आसमान मेरे इंतज़ार में मिला। वहां खुली हवा थी, फूलों की खुशबुएं थीं। सब साफ देख पाने की रौशनी थी और ढेर सारे सपने थे जिन्हें सच होना था। न वहां फरेब की जगह थी और न मैं अधूरी थी। लेकिन देख रही हूं तुम्हारे लिए आज भी कुछ भी नहीं बदला। आज भी सब वैसा ही है। तुम काफी हुनरमंद थे । तुम्हारी लफ्फाज़ी ने देर से ही सही पर मुझे उन मासूम माशूकाओं के चेहरे दिखा दिए थे जिन्हें तुम्हारे मुताबिक मेरी ही तरह चांदनी ने कभी खा़क किया होगा। हम सब बहार थीं गुल, तुम जिनसे आबाद थे।’’   

     मेरे आगे दिल का आईना चूर-चूर हो गया। इश्क की किताब में रखे ताज़ा गुल सूखकर झड़ने से लगे। उनका रंग लाल न था। वे काफी काले नज़र आ रहे थे। अचानक उनके झड़ने से पहले मुझे बहार के सूखे ज़ख्म का रंग दिख गया। दोनों रंग किस कदर मिल रहे थे कि अलगाना नामुमकिन। मेरी आंखों  से मानो एक झूठ का परदा उठ चला। उस वक्त बहार पर गजब निखार था। गुल सबसे बेज़ार, हवा में बुलबुले टटोल रहा था। बहार ने अब चलने का मन बना लिया था। मुझे उसकी हरकतों से साफ पता चल रहा था। उसे चले ही जाना चाहिए था। गुल वहां से उठा ही नहीं। उसकी ज़बान से अलविदा का हर्फ भी न फूटा। उसकी नज़रों से मिन्नत का जादू एकदम काफूर हो चला। उसके चेहरे पर इश्क के तमाम फसाने जो अभी तक मुझे खींच रहे थे वहां अचानक मैंने एक ठंडा आदमी पाया। जो सच की आग से बचने के लिए पहले ही बर्फ हो गया था। अलविदा ,बहार ने भी नहीं कहा। पर जो कहा वो अलविदा ही था- 

‘‘ मैं कोई परी नहीं थी गुल! हाड़-मांस की औरत थी। मेरे पास अपने ख्वाबों की तामीर के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं थी। मेरे ख्वाब तुम्हारे संग पूरे होने थे… पर तुम कलाकार आदमी थे ज़िंदगी में डूबकर नहीं सीखी थी तुमने जीने की कला। याद है न तुम कोहनी के सहारे आसमां तकते थे और मैं घुटनों के बल धरती देखा करती थी। तुममें फनकारों की गजब अदाएं थीं, कितने ही शायरों के अल्फाज़। मुझे तसल्ली देने को तुम्हारे पास किसी और से चुराया हुआ फलसफा था पर मैं ज़िंदगी के सच की तलाश में थी। वो तुम्हारे झूठ पर एतबार का मौसम था…बीत गया। सोचा था तुमसे कभी न मिलूंगी …पर आज तुम्हारे शहर में होने और तुम्हारे इसरार पर यहां हूं…सोचती आई थी तुम अब तक माज़ी से निकल आए होगें। हमसफर नहीं पर हम दोस्त तो रह ही जाएंगे। अफसोस! जब मैं थी तब तुम्हारी बातों में माज़ी था आज तुम हो और तुमने मुझे माज़ी बना डाला। खुश रहो गुल मैं अपने आज संग जाती हूं। ’’ 

           गुल कहीं खोया-सा था। शायद उसने बहार को सुना ही नहीं। पर मैं देख रहा था, बहार की आंखों में- एक झरना उठा और ज़मींदोज़ हो गया। उसके चेहरे पर अपने फैसले का नूर था। बहार अकेली नहीं गई दरवाज़े के बाहर। मैं भी उसके साथ निकल आया।

यहां दर्द, ज़ख्म हो रहा था सब देखते-सुनते, और आप! आपका क्या आप तो यही कहेंगे कि किस्सा बढ़िया था।

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2 Responses

  1. Mona jakhar says:

    “पहले जब मैं थी तब तुम माज़ी में जीते थे और अब जब मैं हूँ तो तुमने मुझे माज़ी बना डाला”

    मैम इस किस्सागोई की तारीफ में मेरे पास शायद शब्द कम है। मैं पहले भाषा की बात करूँ तो जिस आला दर्जे की उर्दू भाषा के शब्दों को आपने करीने से पिरोया है वह बेमिसाल है। भाषा इतनी समृद्ध है कि पाठक उसकी मिठास में एकदम घुल जाता है। मैं इस कल्पना में थी की यह किस्सा सुनाने वाला इंसान अभी लखनऊ में हो और वहाँ के किसी “चलत मुसाफ़िर” में यह अपना किस्सा कह रहा हो जहाँ आलम अपने सुरूर में खूबसूरती के चरम पर हो और बारिश होने वाली हो और उससे पहले जो हवाएँ चलती है और मौसम होता है वैसा हो।

    किस्सा और उसके पात्र हमें सिर्फ किस्सा कहने वाले की काफ़िली और उसके अंदाज़ से पता चलते है और उसने ही उनका नामकरण किया है परंतु गुल और बहार से पाठक सीधे तौर पर जुड़ता है और ऐसा लगता है जैसे वे खुद अपनी कहानी हमें कह रहे हो।

    किस्से में इतनी जीवंतता है कि मैं तो जैसा आपने वातावरण रचा उसी में चली गयी और पूरी तरह खो गयी। शायरी जैसे “चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले ” मुझे पहले से बहुत पसंद है और आज फैज़ साहब को इसके लिए फिर शुक्रिया कहना चाहा।

    वो सतरंगी फव्वारा इन वास्तविक लगा कि क्या ही बताऊँ और अल्हड़पन या लड़कपन में प्रेम को जैसे आपने बयाँ किया वो मन को छू गया। गुल और बहार की मनोदशा और संवाद भी दिल छू लेने वाले थे।

  2. Anamika says:

    ”एक झरना जमींदोज ”
    इस कहानी को पढ़ने के उपरांत मेरे विचार कुछ इस प्रकार…..
    जैसा उन्हें देखा, मै वैसा ही पेश करने की कोशिश करूँगा जनाब !न कम न ज्यादा !
    मैं लेखक की इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ क्योंकि यदि किसी कहानी के आकर्षण को बढ़ाने के लिए उसमे बढ़ाचढ़ाकर कुछ बाते लिखी जाये या कहानी से उस सच को छुपाया जाये जिस कारण कुछ लोगो द्वारा कहानी की अवहेलना हो सकती है ! तो यह कहानी का अस्तित्व छिपाने जैसा होता है…!
    आज इस कहानी के लिए लेखक अपने उस पुराने रेस्टोरेंट में पहुंच जाता है जहा उसने कई मनमोहक कहानियाँ गड़ी इसलिए इस रेस्टॉ को कहानियो का अड्डा भी कहा है !लेखक ने, रेस्टॉ में एक प्रेमी जोड़े को देखते हुए गुल बहार के नाम से सम्बोधित किया !जहाँ एक तरफ गुल के बातें सुनकर लेखक की सोच एक तरफ़ा हो रही थी वही बहार की ख़ामोशी देखकर और तीव्र बाते सुनकर उसकी रचनात्मक काबिलीयत डगमगा रही थी |
    यह प्रेमी जोड़ा एक वर्तमान जोड़ा नहीं बल्कि भूतकाल प्रेमी जोड़ा था जिसने कभी साथ में कई सपने संजोये थें, पर आज गुल उन्ही पुरानी यादो के जरिये बहार को मनाने की कोशिश कर रहा था वहीं बहार अपनी ख़ामोशी और तीव्र शब्दो के जरिये गुल को कल्पनाओ से दूर ज़िन्दगी के हकीकत से रूबरू करा रही थी | *याद है तुम कहा करते थें –“गुल खिलता है तोह बहार आती है !”यानी बहार का वजूद गुल से था?
    *मेरे अनुसार यह कथन सिर्फ मौसम पर ही लागु होता है क्योंकि आज के दौर में बहार (लड़की )अपना वजूद खुद बना सकती है उसे किसी पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं |
    “”मैं कोई परी नहीं थी गुल |हाड़ -मास की औरत थी !मेरे पास अपने ख्वाबो के तामीर के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं थी |मेरे ख्वाब तुम्हारे संग पूरे होने थें………
    बहार जहाँ खुद को गुल की कल्पनाओ में जी रही थी उसके हर बात को सच मानते हुए उसी के रंग में रंगी हुई थी जिसमे उसके खुद के सपने को कोई मोल नहीं था खुद के सपनो के सच करने के लिए गुल की कप्लनाओ से हटकर ज़िन्दगी की हकीकत से सामना किया और आज उसे अपने फैसले पर फ़क्र है |बहार के इस निर्णय से मैं सहमत हूँ |किसी और के कल्पनाओ से हटकर खुद का वजूद बनाना ही ज़िन्दगी है |
    ***इस कहानी में कुछ काव्य और शब्द बहुत खूबसूरती से संजोये गए है |

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