अनु चक्रवर्ती की ग़ज़ल

मुसल्सल  एक ही बात पर जान निकलती रही
भीड़ में भी वो निग़ाह देर तलक मुझे तकती रही

तूने क्या मंतर पढ़ा ,जाने कौन सी बांधी तावीज 
रफ़्ता -रफ़्ता मैं तेरे निगाहे -तिलिस्म में बंधती रही

शोर बरपा -सा क्यों है , तेरे बज़्म में यूँ सरासर  
उफ़्फ़! हाथ जो पकड़ा तूने ,बर्फ़ की मानिंद मैं पिघलती रही

अब शम्मां ना करो रौशन ,ना हटाओ रुख से नकाब  
हिजाबों में भी खूब रानाइयां पलती रही

गुफ़्तगू हर बार  हो सरे -शाम ये ज़रूरी तो नहीं 
दिल की अनकही बातें निगाहों से बयां होती रही 

नफ़े -नुकसान की अब फिक्र किसे हमनफस!
खुशबू – ए- विसाल में रातभर मैं महकती रही ..


अनु चक्रवर्ती 
वॉइस आर्टिस्ट , स्क्रिप्ट राइटर , रंगकर्मी , तीन हिंदी फ़ीचर फ़िल्मों में अभिनय, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित ।

संपर्क : C/o  एम. के. चक्रवर्ती 
C- 39 , इंदिरा विहार सरकंडा
बिलासपुर ( छ. ग )
पिन – 495006
मोबाइल – 7898765826 
antarac76@gmail.com

1 Response

  1. वेद प्रकाश गोरखपुर says:

    वाह अनु जी , आप ने अपनी बात इतनी सफाई से कही
    कि अर्थ दर अर्थ बेपर्द होते गए, बधाई, मैं और पढ़ना चाहूँगा

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