बलजीत सिंह ‘बेनाम’ की तीन ग़ज़लें

1
प्यार का मतलब बताती इक कहानी दे गया
इक पतंगा हँसते हँसते ज़िंदगानी दे गया

शख्स जाने कौन था पर दर्द में मसरूर था
अपने हिस्से की मुझे बाकी जवानी दे गया

ज़िन्दगी के जब सभी अल्फ़ाज़ थे बिखरे पड़े
तब ख़ुदा सपने में लफ़्ज़ों को मुआनी दे गया

इस ज़मी से दूर शायद था कहीं उसका मकां
प्यास से मरते परिंदों को जो पानी दे गया

शेर तो कहता हूँ लेकिन मीर सा लहज़ा कहाँ
क्यों नहीं मुझको वो लहज़ा ख़ानदानी दे गया

2
हर समय क्यों बदगुमानी चुप रहो
क्या वही फिर बदज़ुबानी चुप रहो

रूखे सूखे हो रहे हैं लब मेरे
आँसुओं में है रवानी चुप रहो

ज़ुल्म वो करते हुए ये कह रहा
शख्स मैं हूँ ख़ानदानी चुप रहो

इश्क पर बस अब कभी चर्चा नहीं
खाक़ अपनी ही उड़ानी चुप रहो

आज तो दुनिया नहीं या हम नहीं
दाँव पर दुनिया लगानी चुप रहो

3
हम उसे देख कर गए खिल से
आँख में ख़्वाब भी हैं झिलमिल से

आपका ख़त मुझे मिला लेकिन
हाथ मेरे गए थे कुछ छिल से

ख़ुद को उसके हवाले कर के मैं
दोस्ती कर रहा हूँ क़ातिल से

मौत क्या रास उनको आएगी
ज़िन्दगी से फिरे  जो ग़ाफ़िल से

दर्द उसका वहाँ भी क़ायम था
लौट कर आ गया वो मंज़िल से

बलजीत सिंह बेनाम
जन्म तिथि:23/5/1983

शिक्षा:स्नातक
सम्प्रति:संगीत अध्यापक
उपलब्धियां:विविध मुशायरों व सभा संगोष्ठियों में काव्य पाठ
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
सम्पर्क सूत्र: 103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी
हाँसी:125033
ई मेल- baljeets312@gmail.com

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