मोहम्मद मुमताज़ हसन की ग़ज़लें

(1)
मुंह मोड़कर हम जाते नहीं,
इश्क गर तुम ठुकराते नहीं!

यूं किसी से दिल लगाते नहीं,
मग़रूर  से रिश्ते बनाते नहीं!

आंखों पे कब अख्तियार रहा,
ख़्वाब लेकिन तेरे आते नहीं!

वो ख़फ़ा होती है तो होने दो,
हम नहीं वो  के मनाते नहीं!

दिल उजड़ी हुई बस्ती लगे है,
तूफां से लोग डर जाते नहीं!

राह में हम अगर ठहर जाते,
ख़्वाब मेरे बिखर जाते नहीं!

             ( 2 )

यूं भी मुझे  कोई  बे – ज़ार कर गया!
बिला – वजह  ही  तक़रार  कर गया!

खुला रक्खा था दर मैंने भी अपना,
खड़ी कोई  यहां  दीवार  कर  गया!

बिना आंगन के कैसे घर में रहें नस्लें,
यही इक मसअला बीमार कर गया!

मिलती है मौत जिंदगी से  सस्ती यहां,
सौदा इंसानियत का बाज़ार कर गया!

आकर झूठी ख़बरों से आजिज़ इंसान,
ख़ुद को हवाले – अख़बार कर गया!

            ( 3 )
हाल बन्दों का जान लेता है,
ख़ुदा जब इम्तिहान लेता है!

ख़ौफ़ दुश्मनों का है शायद,
मकां में वो  अमान लेता है!

चीखता  है  सन्नाटा  शहर में,
जान किसकी इंसान लेता है!

ज़मीं पे लड़खड़ाते हैं कदम,
और सर पे आसमान लेता है!

             (4)
सुर्ख़ हाथों से तेरा नाम लिखता हूं,
रस्मे-उल्फ़त का पैग़ाम लिखता हूं!

वो लिखती है तन्हा रात का मंज़र,
मैं सुरमई सी कोई शाम लिखता हूं!

जो कह सका न  हाले-दिल अपना,
किस्से वो ख़त में तमाम लिखता हूं!

मेरी रुसवाई काश समझ लेती  वह,
मोहब्बत न होती नाकाम लिखता हूं!

क़ातिलों की बस्ती में है बेबस दिल,
ये इश्क़ नहीं है कत्लेआम लिखता हूं!

                (5)
याद रह रह के कोई मुझको आता बहुत है!
प्यार उसका मेरे दिल को तड़पाता बहुत है!

कह हवाओं से चरागों ने खुदकुशी  की है,
अंधेरा सियासत का अब डराता  बहुत है!

टूटकर जिस को कभी मैंने चाहा था बहुत,
नज़र से बेवफा हुआ दूर जाता  बहुत है!

इश्क़ का यही अक्सर अंजाम हुआ साकी,
जिंदा रखता ये मुख्तसर मार जाता बहुत है!

तमाम रात मैं उसके ख्वाबगाह में रहा लेकिन,
खुली जो आंख हर ख़्वाब सताता बहुत है!

            (6)
मैं जब भी पुराना मकान देखता हूँ।
थोड़ी बहुत ख़ुद में जान देखता हूँ।

लड़ाई वजूद की वजूद तक आई,
ख़ुदा का ये भी इम्तिहान देखता हूँ।

उजड़ गया आपस के झगड़े में घर,
गली-कूचे में नया मकान देखता हूँ।

तल्ख़ लहज़े में टूट गई रिश्तों की डोर,
दीवारें आँगन के दरमियान देखता हूँ।

लगी आग नफ़रत की ऐसी जहाँ में,
हर शख़्स हुआ परेशान देखता हूँ।

ज़ख्म गहरा दिया था भर गया लेकिन,
सरे-पेशानी पे मेरे निशान देखता हूँ।

किसी सूरत ज़मीर का सौदा नहीं किया,
ईमान से रौशन मेरा जहान देखता हूँ।

            (7)
दिल तोड़ कर दिल लगाना बुरा है!
नज़र से नज़र फिर मिलाना बुरा है!!

वक़्त की नज़ाकत है फ़ासले रक्खो,
चलना संभल कर ज़माना बुरा है!

करो इश्क़ यूँ के अंज़ाम तक पहुँचे,
दिल में रह कर दिल दुखाना बुरा है!

दहलीज़ पे घर की दस्तक रख दो,
ख़ामोशी से घर में आ जाना बुरा है!

रिश्ता दर्दमन्दों से रखना सदा क़ायम,
रिश्ते ज़ुबाँ से महज़ निभाना बुरा है!

मुहब्बत दिल में किसी के जगा के,
नज़र से दूर फिर हो जाना बुरा है!!

             (8)
हमने जारी ये सिलसिला रक्खा!
आपसे हर- वक़्त राब्ता रक्खा!

क़रीब और क़रीब होता रहा था मैं,
उसी ने जाने क्यूँ  फासला रक्खा!

क़दम-क़दम पे ठोकरें लगी हमको,
चलने का हमने मगर हौसला रक्खा!

ज़ख्म देती रही ये दुनिया मुझको,
दर्द सहने का दिल में माद्दा रक्खा!

मैं जानता था वो इतना बुरा भी नहीं,
ज़माने ने जिसे बहुत बरगला रक्खा!

उसने सोचा ‘मुमताज़’ ख़फ़ा है उससे,
पास आया तो गले से लगा रक्खा!!

( 9 )
देखना इक दिन हथेली पे जान रख देंगे!
ज़मीं पे सर कदमों में आसमान रख देंगे!

धुआं हो जाएंगे सब नफ़रतों के बादल,
बंदों के हाथ में गर गीता-क़ुरान रख देंगे!

मिट जाएगा झूठ सियासत से इक रोज़,
तेरे मुंह में हम जो अपनी ज़बान रख देंगे!

घर होगा ऐसा बहेगा जहां इश्क़-ए-दरिया,
और नाम उसका फिर हिंदुस्तान रख देंगे!

मंदिर -मस्जिद में मिला क्या ख़ुदा कभी,
अब दिलों में हम सभीकेभगवान रख देंगे!

ग़म की धूप में हो उदासी के जब बादल,
आंगन में खुशियों का गुलदान रख देंगे!

आंच आ सकती है कैसे मुल्क को मेरे,
सरहद पे जांबाज़ जब निगहबान रख देंगे!!

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मोहम्मद मुमताज़ हसन
रिकाबगंज, टिकारी, गया
बिहार-824236
मोबा.- 7004884370

                                           

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