शहाब उद्दीन शाह की ग़ज़लें

एक

किरदारों से बौने लोग
छोटे औने  पौने ‌ लोग

पैसा  रुत्बा रूप नशे के
पागल और खिलौने लोग

इन्सानों  में   शैत्वां  जैसे 
झूठे  और  घिनौने   लोग

ख़ुश फहमी से फूले लोग
ख़ुद  से  गोल नमूने लोग

चमचे ढक्कन पेंदी लोटा
करछी और भगौने लोग

जगह जगह पर पीकदान से
मुंह से लार थुकौने लोग

तन गोरे मन काले शाह जी
रूप  के  जैसे‌  सोने   लोग

दो

यूं तो सामाने मुख़्तसर  पर हूं
ज़िन्दगी के अभी सफ़र पर हूं

काटना  है  वही  दरख़्त  मुझे
शाख़ पर जिसकी मैं शजर पर हूं

नींद ग़ायब है मेरी आंखों से
मैं अगरचे ख़ुद अपने घर पर हूँ

आईने सा नहीं हूं मैं लेकिन
पत्थरों की सदा नज़र पर हूं

नग़्मग़ी ये नहीं तो और है क्या
सांस की तुक हूं मैं बहर पर हूं

ज़िन्दगी  चल रही  है  एसे तो
इस सफ़र पर मगर क़सर पर हूं

आदमी बन गया हूं तब से शाह
जब से मैं अपने बालों पर पर हूं

तीन

हमीं जब ग़मों से न मारे गये
दरख़्तों  से  पत्ते  उतारे  गये

कभी हम ज़्यादा कभी बस यूं ही
ज़रुरत  के  जैसे  दुलारे गये

हरे खेत पेड़ों की फैली क़बा
ज़मीं से ही  चादर उतारे गये

हमें जो गवारा  नहीं थे कभी
वही नाम क़सदन पुकारे गये

मुझे दस्तरस भी है ऐसे मिली
बहुत  दूर  तक तो सितारे गये

तमाशा न ए शाह इसको समझ
किया इश़्क़ जिसने कंवारे गये


शहाब उद्दीन शाह  क़न्नौजी
संपर्क : हाउस नं 224, हाजीगंज
क़न्नौज, यूपी
मोबाइल-8299642677

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