गोपाल मोहन मिश्र की एक ग़ज़ल

गोपाल मोहन मिश्र
लहेरिया सराय, दरभंगा
9631674694
 
 


हराया है तूफ़ानों को, मगर अब ये क्या तमाशा है,
हवा करती है जब हलचल, बदन ये कांप जाता है।

है सूरज रौशनी देता, सभी ये जानते तो हैं,
है आग दिल में बसी कितनी, न कोई भाँप पाता है।

है ताकत प्रेम में, पिघला दे पत्थर लोग कहते हैं,
पिघल जाता है जब पत्थर,जमाना तिलमिलाता है।

कहाँ से नफ़रतें आ के, घुली हैं उन फ़िजाओं में
जहाँ पत्थर भी ईश्वर है, जहाँ गैया भी माता है।

चला जाएगा खुशबू लूटकर,हैं जानते सब फूल,
न जाने कैसे फिर भँवरा,कली को लूट पाता है।

फतिंगे यूँ तो दुनियाँ में हजारों रोज मरते हैं,
शमाँ पर जान जो देता,वही सच जान पाता है।

बने इंसान अणुओं के, जिन्हें यह तक नहीं मालूम,
क्यूँ ऐसे मूर्खों के सामने, तू सर झुकाता है।

दीवारें गिर रही हैं और छत की है बुरी हालत,
शहीदों का ये मंदिर है,यहाँ अब कौन आता है।

 

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