मनोज झा की पांच कविताएं

चाँदनी को बहकते देखा

चाँदनी को बहकते देखा

ये किस आसमान में
कि ढल रही है रात
किस बियाबान में
तुझसे नहीं मुलाक़ात
इस जहान में
कि मरता रहा मैं
किस घमासान में

क्या-क्या बदलते देखा
चाँदनी को बहकते देखा

 

कोयलिया नहीं गाती

बस पल-दो पल का है 
इंतज़ार

ये तुम्हारा वहम भी हो सकता है
पर क्या करोगे
जी लो जब तक मौत नहीं आ जाती
इसी वहम के साथ

सारी ज़िन्दगी तो ग़ुजार दी
अब रहा क्या
अब कुछ भी नहीं रहा

अब ठूँठ रह गए हो
फ़िर ठूँठ पर कोयलिया नहीं आती
नहीं गाती

धीरे-धीरे तुम्हें तोड़ा जाएगा
झोंक दिया जाएगा आग़ में
ये जो डालियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद 
टूट-टूट कर गिर रही हैं

एक भी पत्ता तो हरा नहीं रहा
तेरी जड़ों में जीवन अब नहीं रहा।

नींद के वन में

नींद के बन में 
भटकता 
जागरण के स्वप्न में डूबा
कई युगान्तों से गुज़रता
बस तेरी छाया ही
देख पाता हूँ…

यह कैसी नींद है
कैसा है स्वप्न ये
कहाँ हो तुम…

गहन तम में
किस कन्दरा में
जलती आग़ ये
धधकती है
खींचती है मुझको
कैसे जलाती है…

तेरी छाया तो किसी आलोक से ही
प्रकाशित है

छूने दो छाया को
छूने दो मन

अब तो
अब तो
साकार करो स्वप्न
नींद से निकालो
पकड़ लो मेरा हाथ !!!

इक दिन ऐसा आएगा

इक दिन ऐसा आएगा
जब हम तुम नहीं रहेंगे
न कोई निशानी
फ़िर कौन किसे याद करेगा
ना कोई तड़प होगी

और अभी है जो तड़प तो
सब होते हुए भी कुछ तो है ऐसा
जो मिलने की कोई सूरत नहीं
या ये बेख़ुदी है
कुछ तो कहना होगा।

 

Email – manojkumarjhamk@gmail.com

Mobile – 9309664223/7509664223

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *