क से कहानी : हाल फिलहाल की अच्छी कहानियां

क से कहानी
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

2021 में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली कहानियों में जो कहानियां अच्छी लगेंगी, उन पर संक्षिप्त टिप्पणी ‘क से कहानी ‘स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित की जाएंगी। इस अंक में सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव लिख रहे हैं लेकिन अगर आपको भी कोई कहानी पसंद आती है तो उस पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखकर आप हमें भेज सकते हैं। आप अपनी टिप्पणी literaturepoint@gmail.com पर भेजें। कोशिश होगी कि किसी रविवार को इसका प्रकाशन किया जाए। हर रविवार इसका प्रकाशन हो पाएगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आपकी ओर से कितनी टिप्पणियां आ रही हैं।

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जनवरी में जो कहानियां पढ़ीं,  उनमें जो कहानियां अच्छी लगीं, उस पर एक संक्षिप्त टिप्पणी। ध्यान रहे कि जो कहानियां मुझे अच्छी लगीं, उन पर यह टिप्पणी हैं। अभी कई पत्रिकाओँ के जनवरी अंक की कहानियां पढ़नी बाकी हैं। उन पर भी जल्द ही लिखूंगा।

सुभाष पंत की कहानी एक का पहाड़ा : कामयाबी का पुल पार करने के लिए एक का पहाड़ा आना जरूरी

क्या आपको एक का पहाड़ा आता है?
ठीक से सोचिए और जवाब देने में जल्दबाजी मत कीजिए।
आप सोच रहे होंगे कि भला यह कैसा सवाल है? भला एक का पहाड़ा किसे नहीं आता? अगर आप इस सवाल से हैरान हैं तो आपको ‘परिकथा’ के ‘जनवरी-फरवरी 2021’ (नववर्ष विशेषांक) में प्रकाशित वरिष्ठ कथाकार सुभाष पंत की कहानी ‘एक का पहाड़ा’ जरूर पढ़नी चाहिए।

इस कहानी में पुत्र अपने पिता की कहानी बता रहा है। पिता ज़िन्दगी में सफलता का पुल इसलिए पार नहीं कर सके क्योंकि उन्हें एक का पहाड़ा नहीं आता था। जी तोड़ मेहनत के बाद अभाव हाथ धोकर पीछे पड़ा रहा। न तरक्की मिली, न गरीबी से पीछा छूटा। चुपचाप दुख की मार झेलते-झेलते पिता इतने थक गए थे कि यह जानना चाहते थे कि आखिर वह सफलता का पुल पार क्यों नहीं कर सके?

इसका जवाब बेटे ने दिया। पिता ने ही कभी बताया था।
‘आपको एक का पहाड़ा नहीं आता, इसलिए आप पुल पार नहीं कर सके।’ पिता को याद आता है कि वह कितने मेधावी छात्र थे। 20 तक का पहाड़ा याद था उन्हें लेकिन स्कूल में इंस्पेक्शन के दौरान जब उनसे एक का पहाड़ा पूछ लिया गया तो वह नहीं बता पाए थे। ठीक उसी तरह, जैसे सिनेमा ऑपरेटर पद के लिए इंटरव्यू के दौरान जब उनसे पूछा गया था कि अगर आग लग जाए तो आप क्या करेंगे। उन्होंने सही जवाब दिया था, ‘भाग खड़े होंगे।’ इस जवाब पर उन्हें जूनियर ऑपरेटर का दर्जा दिया गया था और उन सबको सीनियर ऑपरेटर का दर्जा, जिन्हें पिता ने ही काम सिखाया था।

पिता को तसल्ली होती है कि पुत्र को अगर वजह पता है तो वह जरूर पुल पार कर लेगा। वह पुत्र से जानना चाहते हैं कि क्या उसे एक का पहाड़ा आता है। पुत्र हां में जवाब देते हुए पहाड़ा सुनाता है, ‘एक इकम एक, एक दून दो, एक तीए तीन…’ लेकिन पिता सावधान करते हैं कि यह तो गिनती है। एक की गिनती। पहाड़ा नहीं। एक का पहाड़ा किसी किताब में नहीं। कोई शिक्षक इसे सिखाता नहीं। भोले भाले लोग एक का पहाड़ा नहीं सीख पाते, जैसे पिता नहीं सीख पाए। जो एक का पहाड़ा नहीं सीख पाता, वह जिंदगी में तरक्की नहीं कर पाता।

फिर एक का पहाड़ा है क्या? कहानी पढ़ते हुए जो बात समझ में आती है, वह यह कि एक का पहाड़ा तिकड़म है। जिसने तिकड़म सीख लिया, वह पुल पार कर लेगा। तरक्की पाएगा। गरीबी को हराएगा।

कहानी बहुत मार्मिक। गरीबी का ऐसा चित्रण है कि आंखें भर आएंगी। गरीबी में छोटी से छोटी बात और छोटी से छोटी चीज भी कितनी अहम हो जाती है, इसका बहुत प्रभावी चित्रण है। ‘एक का पहाड़ा’ अद्भुत कहानी है।

‘परिकथा’ ने इसे ‘कथाभूमि’ स्तम्भ के अंतर्गत छापा है। इस स्तम्भ के अंतर्गत उन पुरानी कहानियों को प्रकाशित किया जाता है, जो अपने समय में विभिन्न कारणों से अचर्चित रह गईं महत्वपूर्ण कहानियां प्रकाशित की जाती हैं।

गांधी की प्रासंगिकता को साबित करती हरियश राय की कहानी मोबाइल

ऐसे समय में जब सत्य को हाशिये पर ढकेलने की कोशिशें सम्मानित हो रही हैं, गांधी पहले से भी ज्यादा प्रासंगिक हो चुके हैं। ‘परिकथा’ के जनवरी-फरवरी 2021 (नववर्ष अंक) में प्रकाशित वरिष्ठ कथाकार हरियश राय की कहानी ‘मोबाइल’ बड़े ही प्रभावी ढंग से यह संदेश देती है।

कोरोना महामारी और उसकी वजह से होने वाले लॉकडाउन ने विकास की दौड़ में काफी पीछे छूट चुके गरीबों की ज़िन्दगी को किस तरह तबाह किया है, वह इस कहानी में बड़े मार्मिक ढंग से आया। स्कूल बंद हुए तो ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हो गई लेकिन जिनके पास दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं, उन बच्चों के पास कम्प्यूटर, लैपटॉप, इंटरनेट, महंगे स्मार्ट फोन कहां से आएंगे?  इस पहलू पर पर सरकारों ने सोचा ही नहीं। यह संघर्ष उनका निजी है, जिनका नाम विकास की सूची में कहीं दर्ज नहीं है। यह सिर्फ भारत की ही बात नहीं है, पूरी दुनिया की है। यूनेस्को के मुताबिक पूरी दुनिया में करीब 135 करोड़ बच्चों की पढ़ाई इस वजह से प्रभावित हुई है। इस कहानी में हरियश राय ने इस समस्या को उठाया है।

टेलरिंग का काम करने वाले मास्टर अच्छे लाल की बेटी को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन चाहिए, लेकिन ऐसे समय में जब खाने के लाले पड़े हुए हैं, मास्टर छोटेलाल के लिए नया मोबाइल खरीदना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। जितनी उनकी महीने भर की कमाई नहीं, उससे ज्यादा रुपए स्मार्ट फोन खरीदने के लिए चाहिए। बच्ची किसी तरह छोटेलाल के पुराने कम स्मार्टफोन से काम चलाती है।

महीनों बाद जब छोटेलाल अपनी दुकान खोलता है तो कोई महिला अपना महंगा स्मार्टफोन उसकी दुकान पर भूल जाती है। अभाव आदमी की नीयत बिगाड़ता है, मोबाइल फोन देखकर छोटेलाल की नीयत भी बिगड़ गई और उसने मोबाइल फोन को स्विच ऑफ कर छिपा लिया। वह अपनी बेटी को यह मोबाइल देना चाहता था। वह दुकान बंद कर घर पहुंच जाता है ताकि कोई मोबाइल ढूंढता हुआ दुकान न पहुंच जाए।

घर पहुंचता है तो वहां गांधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ उसे दिखती है। लॉकडाउन से पहले बेटी यह किताब स्कूल लाइब्रेरी से लेकर आई थी। उस किताब को उठाते वक्त उसके हाथ कांपते हैं क्योंकि उसके मन में चोर था, वह झूठ के साथ खड़ा था लेकिन अन्तत: गांधी जी ने उसे बचा लिया। सत्य अभाव पर भारी पड़ा। उसने तय कर लिया कि वह मोबाइल बेटी को नहीं देगा बल्कि जिसका है, उसे लौट देगा।

इस कहानी का क्लाइमेक्स इसकी ताकत है। अभाव आदमी की अग्निपरीक्षा लेता है। गांधी के सच की प्रेरणा से छोटेलाल इस इम्तिहान में पास हो जाता है। उसका पास होना इस बात की तसल्ली है कि झूठ चाहें लाख इतरा ले, सच के आगे उसकी कोई औकात नहीं।

पंकज सुबीर की कहानी डायरी में नीलकुसुम : प्रेम ही नहीं, प्रतिरोध की भी मुकम्मल कहानी

‘वसंत किसी मौसम का नाम नहीं है, वसंत जीवन की एक अवस्था का नाम है’ इस कोटेशन के साथ शुरू होती है ‘वागर्थ’ के ‘जनवरी-फरवरी अंक’ में प्रकाशित पंकज सुबीर की कहानी ‘डायरी में नीलकुसुम’। इस कहानी में ऐसे कई अद्भुत कोटेशन हैं। कोटेशन उपशीर्षक की तरह आते हैं और उनके खुलते अर्थ के साथ कहानी भी परत दर परत खुलती जाती है।

यह शुभ्रा के ‘वसंत जीवन’ की कहानी है, जिसमें प्रेम तो है लेकिन वह प्रतिरोध से उपजता है। प्रतिरोध उस व्यवस्था का, जिसमें अस्पृश्यता एक बहुत बड़ी आबादी को इंसान की सामान्य जिंदगी जीने से वंचित कर रही है। इस व्यवस्था के प्रतिरोध के रूप में प्रेम की कल्पना हैरान कर सकती है लेकिन यह प्रेम इतने सामान्य ढंग से आता है कि पाठक उसमें बहने से खुद को रोक नहीं पाता।

कहानी के केंद्र में सुखिया और उसका बेटा हरिया हैं। वो शुभ्रा के ननिहाल में सफाई कर्मचारी हैं। सुखिया शौचालय और स्नानागार की सफाई करती है। वो अछूत हैं, इसलिए घर में वो कहां तक जा सकते हैं, क्या-क्या छू सकते हैं—इन सबकी सीमा तय है। शुभ्रा जब छोटी थी और छुट्टियों में ननिहाल जाती थी तो अपने खेल में हमउम्र हरिया को भी शामिल करना चाहती थी लेकिन जाति की लक्ष्मण रेखा इसके आड़े आ जाती थी। वह उसे अपने खेल में शामिल करने में कभी कामयाब नहीं हो पाई। तब वह इसका कारण नहीं समझ पाती थी लेकिन जैसे-जैसे बड़ी होती गई सबकुछ साफ होता गया।

वक्त गुजरता गया। शुभ्रा और हरिया दोनों उस अवस्था में पहुंचे, जहां वसंत बस आने-आने को ही था। इसी दौरान शुभ्रा के सामने सुखिया और हरिया की दयनीय और अपमानजनक जिंदगी का सच खुलता जाता है। ये दोनों अछूत हैं लेकिन सुखिया का शरीर उसके छोटे मामा के लिए भोग्य है। देह अछूत नहीं है। लंबे समय से सुखिया इस यौन उत्पीड़न का शिकार होती रहती है। उसका मामा किशोर वय के हरिया के सामने ही स्नानागार में घुसकर दरवाजा बंद कर लेता है, जहां सुखिया सफाई कर रही होती है। जवान होते किसी बेटे के लिए इससे अपमानजनक और क्या हो सकता है कि उसके सामने उसकी मां का बलात्कार हो और वह कुछ न कर पाए। ऐसी ही घटनाओं से शुभ्रा के अंदर विद्रोह की आग सुलगने लगती है। यह गुस्सा केवल मामा के लिए नहीं है बल्कि उस व्यवस्था के लिए है, जहां जाति के नाम पर कुछ लोग अय्याशी कर रहे हैं तो कुछ लोग जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

हरिया के ज़ख्म पर वह अपने प्रेम का मरहम लगाती है। हरिया ने तो कभी इस प्रेम की कल्पना भी नहीं की थी, इसलिए उन दोनों के बीच एक मौन बरकरार रहता है लेकिन जब भी दोनों के होंठ मिलते हैं तो संवेदी तंत्रिकाओं के तंतु जितने उद्दीपित होते हैं, उससे कहीं ज्यादा सदियों से चले आ रहे जातिवाद के तंत्र के परखच्चे उड़ रहे होते हैं।

यह प्रेम की ही नहीं बल्कि प्रतिरोध की भी एक मुकम्मल कहानी है। बावजूद इसके मुहब्बत पूरी मासूमियत के साथ आती है और इसे केवल शुभ्रा या हरिया ही नहीं बल्कि पाठक भी महसूस करता है। इस प्रतिवाद में जितना आनंद शुभ्रा को आता है, उतना ही आनन्द पाठक को भी आता है। शुभ्रा के होंठ जब हरिया के जख्म को मुहब्बत के फाहों से सहलाते हैं तो सुकून पाठकों को भी मिलता है। यही इस कहानी की सफलता है। इस अच्छी कहानी के लिए पंकज सुबीर को बहुत बधाई।

चांडालों को बेनकाब करती अशोक शाह की कहानी

“प्लेटफार्म पर डिब्बे के सामने बैठी हिन्दुस्तान की एक औरत हसरत भरी निगाहों से उतरते मुसाफिरों को देखे जा रही है। उसका बेटा रात भर रोया है। अगले दिन के सुबह पांच बजे तक उसे पिछले दिन के पहले कौर का इंतजार है। उसे देखते ही काठ मार दिया। अपने तथाकथित बड़प्पन में हमने किसका पेट भर दिया था?  हम जिस प्लेटफार्म पर उतरे, वह अभी बहुत भूखा है। पर चांडाल को लेकर समूची भारतीय रेल हमारे जीवन के भविष्य की पटरी पर आगे निकल चुकी है।”

‘परिकथा’ के नववर्ष अंक (जनवरी-फरवरी 2021) में प्रकाशित अशोक शाह की कहानी ‘चांडाल’ का यह क्लाइमेक्स पैराग्राफ है। इस अनुच्छेद के साथ ही कहानी खत्म हो जाती है। पूरी कहानी एक ट्रेन में चलती है। ट्रेन में एक ऐसा यात्री सवार होता है, जो सोने से लदा-फदा है। अपनी सीट पर आते ही बिना किसी के पूछे ही अपने रूतबे, रौब, ऊंची पहुंच का बखान करने लगता है। सबूत के तौर पर मोबाइल में मौजूद तस्वीरें, वीडियो दिखाता है। मोबाइल पर भी धौंस जमाने वाली बातें कर सहयात्रियों को प्रभावित करने की कोशिश करता है। इसका असर भी दिखता है। वह दूसरे सहयात्रियों का ही भोजन भी साफ करता है।

अशोक शाह ने इस यात्री को चांडाल नाम से पुकारा है। ऐसे यात्रियों से हम सबका पाला कभी न कभी पड़ा है या पड़ेगा। भारतीय रेल हमेशा से ही भारतीय समाज का वास्तविक प्रतीक रहा है। हर जनरल डिब्बा या स्लीपर क्लास एक मिनी भारत है। इस कहानी का चांडाल उस वर्ग का प्रतीक है, जो दूसरों का हक मारते हैं। अपने भाषण और व्यक्तित्व से गुमराह करते हैं और दूसरों का हिस्सा हड़प जाते हैं। यह कहानी ऐसे ही चांडालों को बेनकाब करती है। ऐसे चांडाल केवल ट्रेन के एक सफर में ही मौजूद नहीं हैं बल्कि हमारी ज़िन्दगी के हर सफर में हमारे पीछे लगे हुए हैं। आप ठीक से खोजिए ये मिल जाएंगे। ऐसे चांडालों को बेनकाब करने के लिए अशोक जी बधाई के पात्र हैं।

 

1 Response

  1. Alok Kumar Mishra says:

    बेहतरीन विश्लेषण किया है आपने ।

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