कैलाश मनहर के दोहे

कैलाश मनहर

आधी रोटी नभ में चमके, आधी मेरे पास |
आधी रात राजधानी में, भूत कर रहे रास ||१||

आधी साँस अधूरे सपने,अधसुलगी-सी आग |
आधी नींद अँधेरा गहरा, आधी मेरी जाग ||२||

आधी हिम्मत आधी दहशत,बातें आधमआध |
आधे मन में आधी खुशियाँ, आधे हैं अपराध ||३||

आधी आज़ादी में खोया, है आधा जनतंत्र |
आधा देश रटे जीवन का,आधा आधा मंत्र ||४||

आधा दिन दुविधा में बीता,आधे दिन में ऊब |
आधे लोग समझते हैं बस, आधे को ही खूब ||५||

नदियाँ सारी पी गया, लील गया सब खेत |
खाने लगा मनुष्यता, यह विकास का प्रेत ||६||

धरती बंजर हो गई, जंगल सारे नष्ट |
इस विकास के नाम पर, देश हो रहा भ्रष्ट ||७||

आदिवासियों के सभी, छीन लिये अधिकार |
दमन कर रही न्याय का, पाखण्डी सरकार ||८||

शोषण औ” अन्याय के, चलते हैं जब दांव |
भर उठते आक्रोश में, जंगल भीतर गाँव ||९||

सब सत्ता का छद्म है, चौतरफ़ा है क्लेश |
ले विकास का नाम वे, बेच रहे हैं देश ||१०||

अन्तर्मन में रात भर, कवि कर रहा विलाप |
कविता का वरदान है, जीवन का अभिशाप ||११||

शब्द शब्द जल बूँद है, शब्द शब्द  है आग |
क्षण भर पहले राग था, क्षण उपरांत विराग ||१२||

न आँखों में नींद है, न मन में है चैन |
कवि के हित अमृत बनी, कालकूट-सी रैन ||१३||

लगी हृदय पर चोट तो, मुख से निकली आह |
कविता को भी मिल गई, इक संवेदित राह ||१४||

चकाचौंध है रोशनी, भरे भरे बाज़ार |
कवि जी अब करने लगे, कविता का व्यापार ||१५||

पूँजी के बाज़ार में, मानवता है नष्ट |
मालिक तनिक न जानते, मज़दूरों के कष्ट ||१६||

शोषण में शामिल बनी, छली-क्रूर सरकार |
छीन रही मज़दूर से, जीवन का अधिकार ||१७||

रेल पटरियों पर मरे, कुचल कई मज़दूर |
शासक भाषण दे रहा, हो घमण्ड में चूर ||१८||

बिखरी बिखरी रोटियाँ, छितरे कुचले अँग |
जीवन हारा मौत से, मानवता की जँग ||१९||

धनपशु पापी हैं सभी, पापी यह सरकार |
नहीं सुन रहे देश के, श्रमिकों की चीत्कार ||२०||

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