कथा-कहानी की 13वीं गोष्ठी

कथा- कहानी की ओर से दिनांक 31 अगस्त 2019 को गांधी शांति प्रतिष्ठान में कहानी पाठ का आयोजन किया गया। यह गोष्ठी इस मायन में महत्वपूर्ण थी कि यह दूसरे साल की पहली गोष्ठी थी। पिछले साल कथा कहानी ने बारह गोष्ठियों का आयोजन किया जिसमें पच्‍चीस कथाकारों ने अपनी कहानियों का पाठ किया. इन कहानियों को एक किताब की शक्ल में प्रकाशित किया गया है. कथा कहानी के संयोजक हरियश राय ने कहा, ‘हमारी कोशिश यह रहेगी कि इस साल भी जो कहानियां पढ़ी जाये उन्हें भी साल के आखिर में एक किताब की शक्ल में छापा जाये’

इस गोष्ठी वरिष्‍ठ कथाकार व फिल्‍मकार सुरेन्‍द्र मनन ने अपनी कहानी ‘काया – परकाया’ व युवा कथाकार सिनेवाली शर्मा ने अपनी कहानी ‘अतिथि ’ का पाठ किया। सुरेन्‍द्र मनन की कहानी ‘काया परकाया’ पर बोलते हुए वरिष्‍ठ कथाकार नूर जहीर ने कहा कि सुरेन्‍द्र मनन शब्‍दों के ब्रश से तस्वीरें बनाते हैं. ऐसा सभी कथाकार करते हैं लेकिन सुरेंद्र मनन के ब्रश से निकली हर तस्‍वीर बहुत ज्यादा तकलीफदेह है और यह तकलीफ सलाख़ों के उस पार भी है और इस पार भी है. काया के साथ जबरदस्ती की गई है और उसका उभरा पेट उस जबरदस्ती का नतीजा है. कहानी में उभरे पेट को सहलाती हुई गर्भवती और उसके भीतर एक सरसराहट की छुअन बेहद तकलीफदेह है. कहानी में बार- बार यह सवाल उभरता है कि इस व्‍यवस्‍था से लड़ना तो है लेकिन जो डर भीतर बैठा हुआ है उसका क्या ? जैसा कि अगस्त मील ने कहा था कि ‘रेप एक हादसा नहीं एक दुःख है’ और यह दुःख लगातार चोट मारता रहता है और रेप पीड़ितों को इसी दुःख के साथ जीना होता है . उन्‍होंने कहा कहानी के अंत में काया एक सवाल बन जाती है और जब महिला सवाल बन जाती है तो समाज के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह उसका हल निकाले.

सिनेवाली शर्मा की कहानी ‘अतिथि’ के बारे में नूर जहीर का मानना था कि कहानी का अंत मुझे इसलिए अच्‍छा लगा कि कहानी के अंत तक यह बात साफ नहीं होती कि कहानी के किरदार को सुबह खुशी होती है या नहीं. उसे शक होता है कि आने वाला अतिथि कुछ गलत कर सकता है. उन्‍होंने कहा कि दरअसल आज पढ़ी गई दोनों कहानियों में एक भय है और इस भय के कारण हम आज किसी पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है.

दोनों कहानियों पर विस्तार से बोलते हुए युवा आलोचक राकेश कुमार ने कहा कि आज पढ़ी गई दोनों कहानियां हमारे समय का आईना हैं। ये आईने दो अलग-अलग कोणों से समय को दिखाने की कोशिश करते हैं। सुरेंद्र मनन जी की कहानी बाहर जीवन में साक्षात घटित होती है तो सिनेवाली की कहानी अतिथि में प्रोटेग्निस्ट का द्वंद्व भीतर चलता है। अतिथि का आना उन सवालों से वह को घेर देता है जिन्हें सम्भवतः वह अभी तक अखबार के पन्नों या टीवी की स्‍क्रीन पर देखती रही थी। सुरेन्‍द्र मनन की कहानी ‘काया परकाया’ के बारे में राकेश कुमार का मानना था कि यह अपने समय में रची गई कहानी लगती है। जब भी आप अखबार पढ़ते हैं तो अक्सर इस तरह की घटनाओं से अवश्य रू-ब-रू होते हैं। अनेक आंकड़े आपकी आंखों में नश्तर की तरह गड़ जाते हैं।

इन दोनों कहानियों पर बोलते हुए जाने माने आलोचक जानकी प्रसाद शर्मा ने कहा कि सिनेवाली शर्मा ने एक मुश्किल कथ्य को अपनी कहानी में उठाया है. कहानी की नायिका में एक तरफ तो संस्‍थागत मजबूरी है और दूसरी तरफ आज के हालात के मंजर है .यह कहानी एक बहुत बड़ा इशारा करती है . उन्‍होंने मख़दूम मोहिउद्दीन की कविता ‘सुर्ख सवेरा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि रात के बाद कभी रात नहीं आती. इस कहानी में जो सुबह वाली बात आती है.

उनका मानना था कि दरअसल तमाम तरह की हताशाओं के बावजूद कहानीकार कहानी में मनुष्यता की तलाश करता है. उन्‍होंने कहा कि इस कहानी की सबसे बड़ी ताकत दृश्‍यात्‍मकता है. इस कहानी में ऐसे दृश्य है जिसे देखकर आपके रोंगटे खड़े हो जाते है. कहानी में जो दृश्य है वह मनुष्यता के लिए स्पेस रखते हैं.

परिकथा के संपादक शंकर ने कहा कि दोनों कहानियां बाहर की दुनिया के विषय को उठाती हैं लेकिन ये दोनों कहानियां मन के भीतर की कहानियां हैं. सुरेन्‍द्र मनन की कहानी के तीन भाग हैं. पहले भाग में काया और उसके परिवार के बीच का चक्रवात है और सब उसी में तिनके की तरह घूम रहे हैं. दूसरे भाग में एन जी ओ, पुलिस इंस्पेक्टर है .इन सबकी उपयोगिता कहानी में हैं. कहानी तीसरे भाग में अपने उत्कर्ष पर पहुँचती है. इस भाग में कहानी घूम फिर कर फिर वापस परिवार में आ जाती है और काया फैसला करती है कि वह स्‍कूल जायेगी और अपना पहले जैसा जीवन जियेगी. काया उन तमाम बंदिशों, हिकारतों का इंकार कर देती है जो उसे समाज ने दी थी. यह कहानी इंकार की कहानी बन जाती है.

वरिष्‍ठ कथाकार रमेश उपाध्याय ने कहा इन दोनों कहानियों को देखे तो लगेगा कि कहानियों की भाषा बहुत सामान्य है, बातें अभिधा में कही गईं हैं और कोई भाषिक चमत्कार दिखाने की कोशिश नहीं की गई है. इन कहानियों में बिम्ब प्रतीक‍ या रूप जैसा कुछ नहीं है,पर अंतर्वस्तु के स्‍तर पर ये दोनों कहानियां हमें बहुत बड़े यथार्थ से जोड़ती हैं. सिनेवाली शर्मा की छोटी कहानी भी हमें बहुत बड़े यथार्थ से जोड़ती है. कहानी में बूढ़ा आदमी तो भय को जगाने का माध्यम है .पर भय तो बाहर है. हम रोज ही देखते है कि छोटी-छोटी बच्चियों के साथ क्या हो रहा है .कहानी का यह भय पाठकों को पूरे यथार्थ से जोड़ता है. सुरेन्‍द्र मनन की कहानी के बारे में रमेश उपाध्याय का मानना था कि सुरेन्‍द्र मनन की कहानी में अंतर्वस्तु के स्‍तर पर एक नया प्रयोग है जो इस कहानी को अन्‍य कहानियों से अलग करता है.यह प्रयोग कहानी के वर्णनों में नहीं है, वह उन इशारों में है, जो कहानी में अनकही बातों के माध्यम से कहा गया है. कहानी के अंत में जो निर्णय लिया गया है, वह निर्णय उस बच्ची का है जो कहानी के केन्‍द्र में है. और यही इस कहानी की सबसे बड़ी जान है.

कथाकार राकेश तिवारी ने कहा कि सुरेन्‍द्र मनन की कहानी का दो तिहाई हिस्‍सा सुनने के बाद कहानी का क्रम बनता है. एक तरह से प्रेगनेंसी को टरमिनेट करने का मामला है और दूसरी तरफ लड़की की आजादी का मामला है. कहानी का इससे बेहतर अंत नहीं हो सकता था. राकेश तिवारी ने कहा कि सिनेवाली की कहानी के केन्‍द्र में भी वहीं अंतर्विरोध है.

हीरालाल राजस्‍थानी ने कथा – कहानी के स्वरूप की प्रशंसा करते हुए कहा कि आज पढ़ी गई दोनों कहानियां हमें प्रेरित करती हैं। कहानी हमें नये परिवेश से रूबरू कराती है और समय की बारिकियों से परिचित कराती है.

विवेक मिश्र का मानना था कि सिनेवाली की कहानी में जो भय है , वह निराधार नहीं है . सुरेंद्र मनन की कहानी के बारे में उनका मानना था कि कहानी वहां बनती है जब लड़की अपने स्‍कूल की यूनिफार्म पहन कर पहले जैसा बनना चाहती है और वह स्‍कूल जाने की हिम्मत करती है।

परिचर्चा में भाग लेते हुए वंदना ने कहा कि हर स्‍त्री को काया की तरह ही देखा जाता है और यह एक पुरुष मानसिकता है. कहानी की खासियत मुझे वहां दिखी जब वह कहती है कि मैं तीसरी बार अपने साथ रेप नहीं होने दूंगी। रचना त्‍यागी का मानना था कि सुरेंद्र मनन की कहानी में विस्तार ज्यादा है और कहानी में गति नहीं है और सिनेवाली की कहानी यह नहीं बताती कि भय के आगे क्या हुआ. मोमिना ने इन दोनों कहानियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दोनों कहानियां बहुत प्रभावित करती हैं और बताती हैं कि आज के समय में भरोसा नहीं रह गया है.

प्रेम तिवारी का मानना था कि काया कहानी की नायिका इसलिए बनती है कि समाज जिसे कमजोरी के रुप में देखता है ,काया उसी को अपनी ताकत बना देती है. और यह कहानी की सबसे बड़ी ताकत है.
महेश दर्पण का मानना था कि काया-परकाया सुरेंद्र मनन की ऐसी कहानी है जो आज के कटु यथार्थ से सीधी मुठभेड़ करती है। यहां एक अबोध लड़की को खुद ही आगे बढ़कर वह निर्णय लेना पड़ता है जो उसे आगे के लिए ज़ीने को सहज कर सकता है। कहानी ‘अतिथि’ पढ़कर लगा कि डर दरअसल इस समय विशेष की सबसे बड़ी चुनौती है।
राकेश तिवारी के धन्‍यवाद ज्ञापन से कथा – कहानी की यह गोष्ठी समाप्त हुई .

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