केशव शरण की ग़ज़लें

एक

क्या बतायें जिस्म, दिल को और जां को क्या हुआ
बिंध गये सब इक तरफ़ से, पर कमां को क्या हुआ

उम्र तन की हो गयी है, इसलिए बस इसलिए!
किसलिए हो जाय बूढ़ा, मन जवां को क्या हुआ

देखकर दो प्रेमियों को क्यों परेशां हाल है
क्यों नहीं अपनी जगह है इस जहां को क्या हुआ

किस मुहब्बत से बरसता आ रहा था अब तलक
क्यों लगा बिजली गिराने, आसमां को क्या हुआ

ख़्वाब की मंज़िल चला था किस नये उत्साह से
क्यों नहीं पहुंचा अभी तक, कारवां को क्या हुआ

था बना तिनका-ब-तिनका ख़ूबसूरत किस क़दर
गिर रहा तिनका-ब-तिनका आशियां को क्या हुआ

हम परिंदों का पुराना है ठिकाना ये चमन
सौंपता सय्याद को है, बाग़बां को क्या हुआ

दो

ये न पूछो ज़िंदगी के हौसलों में क्या रखा
ज़लज़ले आते रहेंगे ज़लज़लों में क्या रखा

गर्म है बाज़ार बेहद हर तरफ़ अफ़वाह का
एक दिन सच देख लेंगे अटकलों में क्या रखा

बस तमाशा-खेल इनमें या बदल की बात है
देखना ये भी ज़रूरी हलचलों में क्या रखा

था सहारों ने डुबोया ये न भूले हो अगर
देख लेना ठीक होगा संबलों में क्या रखा

क्या न कोई मन मिलाने दिल लगाने के लिए
क्या रखा है मनचलों में, दिलजलों में क्या रखा

काट डाला पर्वतों को, मथ दिया संसार को
ये नहीं कहना कभी तुम पागलों में क्या रखा

तीन
फिर न चंगी हो सकी है घायलों की ज़िंदगी
प्यार में मारे हुए हम पागलों की ज़िंदगी

उड़ रही थी आशिक़ों में जो कभी तितली बनी
जी रही है वो हसीना सांकलों की ज़िंदगी

रेख जिनकी जा उतरती थी दिलों में तीर-सी
बह गयी है आंसुओं में काजलों की ज़िंदगी

भेद जग ने कर रखा है क्या समझकर क्या पता
पर न कम गोरे तनों से सांवलों की ज़िंदगी

नाप ले चाहे गगन ये इस दिशा से उस दिशा
बस बरसने तक रही है बादलों की ज़िंदगी

एक सन्नाटा भयानक जब यहां छाया हुआ
क्यों न होती एक वंशी-मादलों की ज़िंदगी

आ पलों में और आकर छा पलों में ख़ूब है
और छाकर गा पलों में जा पलों की ज़िंदगी

चार
मुस्कुराना, ज़ुल्फ़ लहराना नहाके सामने
क्यों नहीं​ होते फ़िदा हम इस अदा के सामने

वो नवाज़े प्यार से या तोड़ डाले खेलकर
दिल लिये बैठे हुए हैं दिलरुबा के सामने

ख़ूबसूरत फूल कितने और जल्वे हुस्न के
दूसरी कोई फ़िज़ा क्या इस फ़िज़ा के सामने

बस ज़रा-से फ़ासले पर रक़्स खुशियां कर रहीं
सिर्फ़ ग़म ही तो नहीं हैं ग़मज़दा के सामने

उस प’ है बरसे न बरसे, उस प’ किसका ज़ोर है
चाहतें ही तो करेंगे हम घटा के सामने

जो छलकती है नशीली प्यालियों से आंख की
और कोई है सुरा क्या इस सुरा के सामने

एक महबूबा हमारी भी रही जो खो गयी
किस तरह जायें पहुंच उस लापता के सामने

पांच
देश की धरती हुई पत्थर किसानों के लिए
सरहदों पर बर्फ़बारी है जवानों के लिए

आम जनता पर भले गुज़रे भयानक ज़ुल्म-सा
हुक्म केवल हुक्म होता हुक्मरानों के लिए

और भी कितने बना लो ईंट-पत्थर, लौह के
लोग कम पड़ते नहीं हैं क़ैदख़ानों के लिए

कैंचियों के काम कितने बढ़ गये हैं आजकल
धार पर लायी गयीं जब से ज़ुबानों के लिए

अब न गाने के लिए मृदु कंठ अपने खोलते
पर नहीं हैं तौलते पंछी उड़ानों के लिए

ये हमारे कुछ हठीले रहबरों का है करम
हम पिछड़ते जा रहे कितने ज़मानों के लिए

क्यों खपायें माथ वो मेहनतकशों के हाल पर
ये निहायत निम्न बातें हैं महानों के लिए

———

केशव शरण

प्रकाशित कृतियां-
तालाब के पानी में लड़की  (कविता संग्रह)
जिधर खुला व्योम होता है  (कविता संग्रह)
दर्द के खेत में  (ग़ज़ल संग्रह)
कड़ी धूप में (हाइकु संग्रह)
एक उत्तर-आधुनिक ऋचा (कवितासंग्रह)
दूरी मिट गयी  (कविता संग्रह)
क़दम-क़दम ( चुनी हुई कविताएं )
न संगीत न फूल ( कविता संग्रह)
गगन नीला धरा धानी नहीं है ( ग़ज़ल संग्रह )
कहां अच्छे हमारे दिन ( ग़ज़ल संग्रह )

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