कृष्ण सुकुमार की 5 कविताएं

कृष्ण सुकुमार

ए०  एच०  ई०  सी०
आई. आई. टी. रूड़की
रूड़की-247667 (उत्तराखण्ड)

मोबाइल नं० 9917888819
kktyagi.1954@gmail.com

 
 

एक

प्रेमिकाएं उड़ रही थीं
आकाश में !

प्रेमी धरती पर चुग रहे थे
बिखरा हुआ अपना वर्तमान !

खिलती हुई हवाओं के फूलों ने
सपनों में बिखेर रखी थी ख़ुशबू !

जब कि मैं
अपने छूटे हुए अतीत को
घसीट कर लिए जा रहा था
सुदूर भविष्य की ओर !

मेरे हाथ में कई रंग के ब्रश थे
और मैं रंग भरना चाहता था
उड़ती हुई प्रेमिकाओं में …
मैंने एक परित्यक्त नदी को
मोड़ दिया आकाश की तरफ़
ताकि उड़ती हुई प्रेमिकाएं
जल पर ठहर सकें कुछ देर
खोल कर अपनी प्यास !

बहुत सारी आहत धुनें
गुम चुकी थीं
पृथ्वी पर पड़ी हुई प्रतीक्षाओं में !

उन सब को खा़मोश बादलों पर लिख कर
मैं भेजना चाहता था
उड़ती हुई प्रेमिकाओं तक !

सुदूर भविष्य की परवाह छोड़
मैंने अपने छूटे हुए अतीत के हाथों
पृथ्वी की तमाम नींदें प्रेषित कर दीं
आकाश की ओर
ताकि उड़ती हुई प्रेमिकाएं नृत्य कर सकें सपनों में
आहत धुनों के साथ …!

और फिर हो गया मैं भी
उन्हीं प्रेमियों में शामिल ! 

दो

मेरे जीवन में एक प्रेम करने वाली स्त्री आयी
उसने मुझे प्रेम से किये असंख्य नमस्कार!
और मैं प्रेम से वंचित रह गया !

मेरे जीवन में एक सुंदर स्त्री आयी
उसने प्रेम से किये अपने अद्भुत अनोखे सोलह श्रंगार
हर बार पूछते हुए -मैं कैसी लग रही हूँ
और मैं प्रेम से वंचित रह गया !

मेरे जीवन में एक सीधी सरल स्त्री आयी
उसने मुझे अपना मंदिर कहा और देवता बना कर प्रेम से पूजती रही
और मैं प्रेम से वंचित रह गया !

मेरे जीवन में एक आधुनिक स्त्री आयी
वह प्रेमपूर्वक स्त्री विमर्श पर करती रही बहस
और सभाओं गोष्ठियों में करती रही
आतिथ्य स्वीकार
और मैं प्रेम से वंचित रह गया !

फिर किसी स्त्री ने किसी स्त्री से मेरी तरफ़ इशारा करते हुए कहा,
कितना लंपट आदमी है… इसे
और कितना प्रेम चाहिए !! 

तीन

एक शाम बितानी थी
तुम्हारे सान्निध्य में !


लेकिन तुम्हें उस कोलाहल से
बाहर निकालना
लगभग असंभव था !
किनारे तोड़ कर
पानी उफन रहा था और
उनमें उठते बुलबुलों में तुम्हें पकड़ने की कोशिश
नुक़सान से मिलती जुलती प्रतीत होती थी !


मल्टीकलर हवाओं में
अजन्मे सपनों की अनवरत जलती बुझती
कोमल धाराएं थिरकती हुई उड़ी जा रही थीं
जिनके बीच समय
दूध की तरह फट कर लिथड़ गया था !


अधपका एक फल
पकने की प्रतीक्षा में था और
तुम्हें थी खट्टे मीठे रस की प्रतीक्षा !


इधर सूरज जल्दी में था
उस पार निकलने की और मैं
प्रतीक्षा में था तुम्हारी !

चार

कुछ है जो कि
नहीं है
किंतु होना चाहिए था…
जैसे तुम्हारे होने से मेरा होना
किंतु तुम
कहाँ हो…?

अक्सर बन जाता है
एक ख़्वाब
बहुत सारे शब्दों की परछाइयों से…
नींद से बाहर !

नींद में कुछ बजता है
मधुर मधुर
मैं जागना नहीं चाहता…

पेड़ तालियाँ पीटते हुए
खिलखिला कर हँसते हैं…

नदी नाचती है
रेत के घूँघरू बाँध कर…

आकाश खेलता है बादलों के बिस्तर पर
हवाओं को गुदगुदा कर !

फल बनने से पहले
फूल खिलता है और मैं
जाग जाता हूँ
इधर उधर शून्य में
शुभकामनाएं ढूँढ़ते हुए !

कल रात फिर घंटियाँ बजी
और मैं सो गया

जगाना मत मुझे
अभी रात बहुत गहरायी हुई है ! 

पांच

ऐसा नहीं कि बारिश भिगोती न हो
ऐसा भी नहीं कि हवा सुखाती न हो
लेकिन भीग कर सूखने
और सूख कर
भीगने के अनवरत क्रम के बीच भी
जो जगह बची रहती है
वहाँ एकत्रित होता रहता हूँ मैं !

उसकी तरफ़ खुलने वाली
सन्नाटे की खिड़कियों से
झुलसती हुई नदी के बेआवाज़ झोंके
एक तीव्र शोर के साथ बहते हुए
रह-रह कर झकझोरते हैं मुझे !

उसके हाथ से छूट कर गिरे हुए
सपनों का कैनवस जब से टूटा है
मै घिर गया हूँ
मिट चुके अव्यक्त सघन स्पर्शों से !

मेरी जागृत नींदों के तकिये पर
सिर टिकाये
बेसुध पड़ा
एक परित्यक्त ख़याल
मँडराता रहता है आँसुओं के इर्द गिर्द
बहुत पुरानी स्मृतियों का
आभार प्रकट करने के लिए !


हड़बड़ाती हुई प्रतीक्षाओं में
ठीक से देख नहीं पाता हूँ…
मैं कितना दूर हूँ अभी
अपने बुझे हुए समय से
जिसकी बाती के धुएं की गंध
निरंतर खींचते हुए उड़ा ले जा रही है मुझे
शब्दों की पहचान से छूटे हुए
उपेक्षित दर्द के अपरिभाषित वनवास पर !

हर पल मेरी तरफ़ बढ़ते हुए
घटित होने वाली विकृत आहटें
काफ़ी हैं
मुझे निचोड़ कर
आग की अलगनी पर
सूखने को फैला देने के लिए !

और मैं अभिशप्त !
बंद दरवाज़े के पीछे
ख़ामोशी पर भौंकता हुआ !
क्षमा कर दिया जाऊँगा
एक दिन !
अक्षम्य…! 

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