‘कविता लिखने से पहले नेक इंसान बनना ज़्यादा जरूरी’

वरिष्ठ कवि विजेंद्र से सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की ख़ास बातचीत

लिटरेचर प्वाइंट संवाद

वरिष्ठ कवि विजेंद्र 84 साल की उम्र में भी पूरी सक्रिय हैं. कविता लिखते हैं, पेंटिंग बनाते हैं। फेसबुक पर भी सक्रिय हैं। हिन्दी कविता में उनका स्थान क्या है, यह नए सिरे से बताने की जरूरत नहीं है। उन्होंने बहुत लिखा है। अभी हाल ही में उनका कविता संग्रह जो न कहा कविता में लोकोदय प्रकाशन से आया है। कविता, समाज, राजनीति समेत कई मुद्दों पर उनके बातचीत हुई और उन्होने खुलकर जवाब दिए। कविता पर उनके विचार नई पीढ़ी का मार्गदर्शन कर सकते हैं। पढ़िए पूरी हबातचीत। 

सत्येंद्र :  विजेंद्र जी, कविता क्या है?

विजेंद्र :   कविता की परिभाषा नहीं दी जा सकती। कविता क्या है—इस पर शुक्ल जी ने महत्वपूर्ण निबंध लिखा था। उसके बाद फिर कोई ऐसा निबंध लिखा ही नहीं गया। उसका कारण यह नहीं है कि कोई लिख नहीं पाता बल्कि उसका कारण यह है कि कविता को परिभाषित नहीं किया जा सकता क्योंकि हर व्यक्ति कविता को अपनी तरह से परिभाषित करेगा तो इतनी परिभाषाएं होंगी कि एक वक्त ऐसा आएगा कि कविता ही गायब हो जाएगी। बीसवीं शताब्दी में कविता की भाषा से ज्यादा महत्वपूर्ण ये हुआ कि कविता की प्रक्रिया क्या है। हमें समझना चाहिए कि कविता की प्रक्रिया क्या है? परिभाषा जो है, वह absolute होती है। मतलब कि बांध देती है चीज़ों को कि इसके अलावा हम और कुछ नहीं सोच सकते लेकिन कविता तो बंधती नहीं कभी। वह जीवन के जो नियम हैं, उनको भी तोड़ देती है। मम्मट ने तो यह कहा है कि जो नियति के नियम हैं, कविता उनको मानती ही नहीं। मान लीजिए अगर मैं ये कहूं कि आज सूर्य पश्चिम में उदित है, तो ये कविता की लॉजिक की दृष्टि से गलत नहीं होगा। ‘प्रकृति नियम रहिताम’ मम्मट के शब्द हैं। जो प्रकृति के नियम हैं, उनसे रहित है ये। कविता जो है उन नियमों को नहीं मानती। अगर आप ये कहें कि मैं हर वक्त पहाड़ पर रहता हूं, हालांकि आप घर में ही रहते हैं लेकिन अगर आप कहें कि नहीं मैं हर वक्त पहाड़ पर ही रहता हूं तो यह गलत नहीं होगा क्योंकि उसके प्रतीक अर्थ होते हैं। आप स्वप्न में रहते हैं, आप बहुत ऊंचे स्थान पर अपने को रखना चाहते हैं। तो कविता जो है, वह प्रकृति के नियमों को नहीं मानती।

सत्येंद्र :  कविता में जनवादइस बारे में आपका क्या कहना है?

विजेंद्र : एक वर्ग ऐसा है, जो कुलीन है, संभ्रान्त है, सम्पन्न है। एक वर्ग ऐसा है, जो बिल्कुल इसके विपरीत है। तो हर कवि को यह निश्चित करना पड़ता है कि वह कहां खड़ा है, किसके पक्ष  में खड़ा है। अगर वो ये कहता है कि मैं किसी के पक्ष में नहीं हूं तब भी वह किसी न किसी के पक्ष में होता है उस वक्त। जो ये कहते हैं कि वो किसी के पक्ष में नहीं हैं, वो सत्ता के पक्ष में होते हैं। जनवाद का मतलब ये है कि आप जनता के पक्ष में हैं। उनकी बातों को उनकी आकांक्षाओं को आप व्यक्त करना चाहते हैं, उनके संघर्ष को आप व्यक्त करना चाहते हैं। आप जनता से जुड़े हुए हैं। उनसे सीखते भी हैं और फिर उस सीख को उनको वापस भी कर देते हैं।

सत्येंद्र :  देश और समाज का अभी जो हाल है, उसमें कविता की क्या भूमिका है?

विजेंद्र : देखिए, कविता से ज्यादा अपेक्षा करने की जरूरत नहीं है।  कविता से कोई क्रांति नहीं होती बल्कि क्रांति कविता को प्रभावित करती है। रूस में जो क्रांति हुई और मायकोवस्की वगैरह जो कवि हुए, वो उससे प्रेरणा ले रहे थे, मतलब क्रांति से प्रेरणा ले रहे थे लेकिन कविता से क्रांति नहीं हुई। क्रांति हुई राजनीतिक दल से, जो वहां स्टालिन ने या लेनिन ने दल तैयार किया था, उससे क्रांति हुई। कविता का दायरा वैसे बहुत सीमित है। मन को परिष्कृत करती है। मन का परिष्कार करती है। आपको उत्साह भी देती है, आपको उल्लसित भी करती है, आपको सक्रिय भी करती है। कविता का स्थापत्य आंतरिक होता है। लेकिन वर्ग समाज में कवि को कोई न कोई पक्ष लेना पड़ता है और लेना चाहिए। मैं निजी तौर पर ये मानता हूं कि भारत जैसे समाज में, जहां जनता बहुत दलित है, उसका बहुत शोषण हो रहा है, तो आपको भी उसमें शिरकत करनी चाहिए। उसकी भावनाओं को समझना चाहिए, उसके संघर्ष में शामिल होना चाहिए। जैसे मेरी एक कविता है ‘गोली दागी गई’। मंदसौर एक जगह है, जहां किसानों पर गोली चली थी (यह कविता उसी घटना पर लिखी गई)। तो इस तरह की घटनाएं जो है, आपको जनता के नजदीक ले जाती है

सत्येंद्र :  जैसा कि आपने कहा कि दो पक्ष हैं– या तो जनता के पक्ष में या सरकार के पक्ष में। लेखन छोड़ कर यदि लेखक सत्ता का प्रचार करने लगे तो इसे आप कैसे देखेंगे?

विजेंद्र : सत्ता का प्रचार करने वाले लेखक होते ही हैं। मगर जब आप जनता के साथ नहीं हैं, तो कहां हैं आखिर? जैसे अशोक वाजपेयी हैं। अशोक वाजपेयी ये तो नहीं कहेंगे कि मैं सत्ता के साथ हूं लेकिन आप जनता के तो पक्षधर नहीं हैं। जब जनता पर कोई परेशान आती है तो उसकी बात तो आप नहीं कहते। आप स्वतंत्रता की बात करते हैं, लेखक को स्वतंत्र होना चाहिए लेकिन स्वतंत्रता अपने आप में एब्सोल्यूट नहीं होती। स्वतंत्रता हमेशा सापेक्ष होती है। आखिर समाज में आप रहते हैं तो समाज के नियम मानते हैं कि नहीं? आप ये नहीं कहते कि मैं समाज के नियमों से दमित हूं। हम ऐसा नहीं कहते क्योंकि वो हमारी ज़िन्दगी का एक हिस्सा बन जाता है। नागार्जुन जी ने सीधे सीधे प्रहार किया है कि नहीं किया है? केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं पढ़िए तो सीधा सीधा प्रहार है। इस पूंजीवादी व्यवस्था की जो विकृतियां हैं, उस पर सीधे सीधे प्रहार है। त्रिलोचन ने बकायदे प्रहार किए हैं। निराला हैं—जो उत्तरवर्ती निराला हैं, पूर्ववर्ती  निराला तो वेदान्त से घिरे हुए हैं – जैसे उनका ‘नए पत्ते’। नए पत्ते को आप पढ़िए तो सीधे सामन्तवाद पर प्रहार है। तो कविता प्रहार करती है। उन चीजों पर प्रहार करती है, जो जनविरोधी है। हमारे यहां कहा गया है कि ‘काव्यम यशसेSर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतर क्षतये।’ शिवेतर का मतलब ये है कि जो जनविरोधी है, उस पर प्रहार भी करती है। क्षत का मतलब विनाश। तो मम्मट तक ने ये कहा है। हमारे यहां जो परिभाषा दी है उन्होंने, उसमें कविता को एक अस्त्र भी मानते हैं। यह केवल हमारी परंपरा में है। मैं चूंकि अंग्रेजी का विद्यार्थी रहा हूं, मैंने यूरोप में कहीं नहीं पढ़ा। वहां दो ही चीज़ें बताई गईं हैं—‘The poetry is to instruct and delight’ मतलब आपको कुछ उपदेश देती है और आनन्द देती है। अरस्तू से लेकर टी एस इलियट तक यही दो बातें ही कही गईं हैं। लेकिन हमारे यहां बहुत पहले शिवेतर क्षतये जो बात कही, वो बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसा विश्व में किसी काव्य शास्त्र में नहीं है कि कविता जनविरोध के लिए विनाश भी करती है यानि प्रहार करती है। और हमारे यहां ऐसे कवि हुए हैं। दिनकर ने कहा था न कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। कुरूक्षेत्र बताता है कि शांति उस समय तक नहीं होगी जब तक आदमी का सुख भाग बराबर नहीं होगा वगैरह वगैरह।

सत्येंद्र :  आपने कहा कि कविता से क्रांति नहीं हो सकती लेकिन कविता प्रतिरोध दर्ज कराती है। तो क्या ऐसा कहा जा सकता है कि कविता क्रांति के लिए उकसाती है?

विजेंद्र : चेतना पैदा करती है। यह बताती है कि यह गलत हो रहा है और इसके लिए तैयारी होनी चाहिए। लेकिन सवाल ये है न कि जनता तक पहुंच नहीं पाती कविता। पूंजीवादी व्यवस्था का यह भी एक षड्यंत्र है कि किताबों की कीमत बहुत रखो। जनता को अशिक्षित रखो ताकि कविता पढ़ ही न पाए। देखिए जो 80 फीसदी जनसंख्या है हमारे देश की, वो अपने पेट के पालन में ही लगी रहती है। उसको अवकाश कहां है? शिक्षा भी नहीं है। तो शिक्षा होना और अवकाश होना। रूस में एक समय आया था, जब श्रमिक अच्छी कविता की मांग करते  थे। येव्तुशेंको, वॉज्नोसेंस्की जो थे, वो श्रमिकों को बकायदे अपनी कविताएं सुनाते थे। श्रमिक मांग करते थे कि अच्छी कविता हमें चाहिए।

सत्येंद्र : तो रचनाकार को जनता तक पहुंचने के लिए करना क्या चाहिए?

विजेंद्र : जनता से मिलना चाहिए

सत्येंद्र :  जनता के बीच जाए, कविता पढ़े…

विजेंद्र : कविता पढ़े या न पढ़े, जनता से मिले। देखिए मैं अपनी बात बताता हूं। ये मेरा सौभाग्य रहा कि मैं छोटे स्थानों पर रहा। भरतपुर मेरी पोस्टिंग थी। भरतपुर गवर्नमेंट कॉलेज में 28 साल मैं रहा। वहां के किसानों से मैं आत्मीयता से मिलता जुलता था। किसान सभाओं में भी जाता था। तो उनसे मैं भाषा भी सीखता था और उनकी जो समस्याएं थी, वो भी समझता था। लेकिन बड़े शहरों के जो कवि हैं, वो तो कहेंगे कि हमारे पास समय ही नहीं है। मैं आपको एक उदारहण देता हूं टॉलस्टाय का। रूस में कहा जाता है कि टॉलस्टाय इज द मिरर ऑफ रशियन रिवोल्यूशन। टॉलस्टाय सप्ताह में तीन दिन गांवों में जाते थे। एक बार कुछ विद्यार्थी मिलने उनके घर गए। तो उन्हें बताया गया कि वो तो गांव में गए हुए हैं। छात्र उन्हें ढूंढते हुए गांव पहुंच गए। उन्होंने टॉलस्टाय से पूछा कि आप यहां क्या कर रहे हैं? तो उन्होंने कहा कि मैं इन किसानों से सीख रहा हूं। इसलिए उनके जो उपन्यास वगैरह हैं, उनमें किसानों के जो अभाव हैं, जो संघर्ष हैं, सब दिए हुए हैं लेकिन उनके निष्कर्ष जो हैं वो गलत हैं क्योंकि उन्होंने निष्कर्ष नैतिक निकाले। उनका कहना है कि नैतिकता समस्या का समाधान कर सकती है लेकिन नैतिकता से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता तो हमारे जितने शास्त्र हैं—महाभारत, रामायण, ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषद—इनमें बड़ी अच्छी-अच्छी बातें कही गई हैं। तो सब कुछ सुधर नहीं गया होता? लेकिन उससे नहीं सुधरता। सुधरता है आदमी व्यवस्था का बदलने से। मार्क्स ने पहली बार ये कहा कि हमें दुनिया की परिभाषा नहीं करनी चाहिए बल्कि हमें ये बताना चाहिए कि How to change it.  इसको बदल कैसे सकते हैं, इसको ट्रांसफॉर्म  कैसे कर सकते हैं। इसे बेहतर कैसे बना सकते हैं। उसी समय से ये शायद नई एस्थेटिक विकसित हुई, जिसमें ये बताया गया कि हमें इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश करनी चाहिए। वो सच भी है। जितनी भी कोशिशें होती हैं, चाहें वो लोकतांत्रिक व्यवस्था हो या फासिस्ट व्यवस्था हो। फासिस्ट अपनी तरह से बदल देता है, फासिस्ट बन जाता है, जनता का दमन करता है। लोकतांत्रिक तरीका ये है कि जनता अपने पक्ष में बदलाव करती है।

सत्येंद्र :  आप आज भी बहुत सक्रियता के साथ लिख रहे हैं। आपको क्या चीजें प्रेरित करती है कि लिखना जरूरी है? लिखना चाहिए।

विजेंद्र : इसके लिए तो मेरे ख्याल से कोई फॉर्मूला नहीं..

सत्येंद्र :  कोई चीज़ जो आपको उद्वेलित करती हो?

विजेंद्र : मुझे यही लगा रहता है कि मैं जिस युग में जी रहा हूं, वहां बड़े अंतर्रविरोध हैं और उन अंतर्रविरोधों को व्यक्त करना चाहिए। अंतर्रविरोध जो है एक बहुत बड़ा सत्य है। माओ ने तो यहां तक कहा है कि Life means contradiction and death means the end of contradiction.  तो अंतरर्विरोध हमेशा रहता है—वैश्विक स्तर पर भी और स्थानीय स्तर पर भी। हर चीज़ में अंतर्विरोध होता है। लेनिन ने तो यहां तक कहा है कि गति में भी अंतर्विरोध होता है। आज के जीवन के जो अंतर्विरोध हैं, वो मुझे बहुत उद्वेलित करते हैं लेकिन मैं ये मानता हूं कि एक कवि को बंधना नहीं चाहिए। अगर मैं जनता का पक्षधर हूं तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं जनता के संघर्ष की बातें ही लिखता रहूं। मैं प्रेम कविताएं भी लिखता हूं। मेरे दो संकलन हैं प्रेम कविताओं के- चैत की लाल टहनी और आंच में तपा कुंदन। ये दोनों प्रेम कविताओं के संग्रह हैं। मैं आज भी प्रेम कविताएं लिखता हूं। प्रेम जो है, वो शक्ति देता है। तो कवि को बंधना नहीं चाहिए कि एक ढर्रे की कविताएं लिखता चला जाय।  केवल संघर्ष की कविताएं लिखता चला जाय क्योंकि जीवन में केवल संघर्ष ही नहीं है, जीवन में करुणा है, प्रेम है, घृणा है, अवसाद भी है, निराशा भी है। हर चीज आनी चाहिए। यह तभी संभव है, जब आपके अनुभव का दायरा बड़ा हो। अनुभव के दायरे के लिए तो आपको जनता के बीच जाना पड़ेगा, चाहें उसे जनता कहिए, लोग कहिए या कुछ कहिए लेकिन जाना तो पड़ेगा। अगर लोग खिड़कियां दरवाजे बंद करके अपने कमरे में ही बैठे रहेंगे तो उन्हें दुनिया कैसे दिखाई देगी। जैसे नेचर। नेचर इज वेरी इम्पोर्टेंट। कविता में नेचर का आना उसका एक डाइमेंशन है, एक आयाम है। बगैर नेचर के कविता मल्टी डाइमेंशनल नहीं हो सकती। बगैर नेचर के हम एक क्षण नहीं जी सकते। इसलिए कविता में नेचर का भी आना बहुत जरूरी है।

सत्येंद्र :  आज के दौर के रचनाकारों के बारे में क्या कहेंगे आप? कैसा लिखा जा रहा है आज?

विजेंद्र : इस समय जो लिखा जा रहा है, उससे तो मैं वाकिफ़ नहीं हूं। ऐसी जगह पर रहता हूं, न मुझे पत्र-पत्रिकाएं मिलती हैं, न मुझे कोई समाचार पत्र मिलता है लेकिन छायावादोत्तर काल तक मैं परिचित हूं। उसके बारे में मैं बता सकता हूं। आज क्या लिखा जा रहा है, इसके बारे में मुझे ज्यादा ज्ञान नहीं है।

सत्येंद्र :  कविता ज़िन्दगी में कैसे आई?

विजेंद्र :  1956 में त्रिलोचन शास्त्री के संपर्क से और रामदरश मिश्र के प्रोत्साहन से। रामदरश मिश्र, शिवप्रसाद सिंह और नामवर सिंह ये मेरे टीचर रहे हैं। इन्होंने मुझे क्लास में पढ़ाया है बकायदे। गोष्ठियों में जाता था, तो परिचय होता था बाद में तो मैं कहता था कि मुझे साहित्य से अभिरुचि है। एक दिन रामदरश बहुत झुंझला कर मुझे हाथ पकड़ कर बाहर ले गए और कहा कि ये क्या परिचय होता है। लिख के लाया करो। तो जब उन्होंने कहा कि लिख कर लाया करो तो उसी दिन से मैंने लिखना शुरू किया। सबसे पहले कविता मेरी ज्ञानोदय में छपी 1956 में। त्रिलोचन शास्त्री मेरे गुरु बने। वो मेरे कमरे में आते थे और हर कविता का संशोधन करते थे।

सत्येंद्र : पहली कविता याद है आपको?

विजेंद्र :  (सोचते हुए) याद तो पूरी तरह नहीं है लेकिन मेरे किसी संग्रह में है वो। लेकिन वो गीत है। गीतात्मक है लेकिन ट्रैडिशनल गीत नहीं है। छन्द को तोड़ कर लिखा था लेकिन गीतात्मकता है उसमें।

सत्येंद्र : आपने कविता के अलावा भी लगभग सभी विधाओं में लिखा है?

विजेंद्र :  हां, कहानी और उपन्यास को छोड़कर। जो वैचारिक गद्य है…मेरी 5 डायरी छपी हुई है—बहुत मोटी मोटी। डायरी में मैंने सौंन्दर्य शास्त्र, साहित्य, साहित्य की राजनीति बहुत सारे विषयों पर लिखा है।

सत्येंद्र : अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में कुछ बताएंगे?

विजेंद्र :  रचना प्रक्रिया का मतलब ये है कि आप जो लिखते हैं तो उसका स्रोत कहां है और उन स्रोतों से आपको क्या अनुभूति होती है। उन अनुभूतियों को आप किस स्तर पर स्वीकार करते हैं। और उनको फिर किस तरह भाव जगत में ले जाते हैं। रचना प्रक्रिया में सबसे बड़ा रोल जो है, वो हमारी इंद्रियों का होता है। हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियां हैं, उनका बहुत बड़ा रोल है। इन्हीं पांचों इन्द्रियों से हमें ज्ञान होता है, जिसको संवेदनात्मक ज्ञान कहते हैं लेकिन संवेदनात्मक ज्ञान की कोई दिशा नहीं होती है। इसलिए उसे हमें पुनर्ठिगत करके बुद्धिगत बनाना पड़ता है। ये दूसरा ऊंचा स्तर है। उसके बाद हम उसको व्यक्त करने की बेचैनी महसूस करते हैं, तब हम भाषा की खोज करते हैं और उपयुक्त भाषा में उसको व्यक्त करते हैं।

सत्येंद्र : कविता में शिल्प की कितनी अहमियत होती है? हर कविता में शिल्प जरूरी है या कथ्य ही काफी है?

विजेंद्र :  देखिए इसका कोई फॉर्मूला नहीं है। बड़े से बड़े कवि की भी कविताएं लें तो उसमें आपको फ्लैटनेस मिल जाएगी। शेक्सपियर तक ने कमजोर ड्रामा लिखा है। शुरू शुरू के ड्रामा उसके कमजोर ही ड्रामा हैं। कई बार ऐसा होता है कि हमें वक्तव्य भी देने पड़ते हैं कविता में लेकिन कोशिश यह होनी चाहिए कि हम जो निर्मिति करते हैं…कविता जो है वो वस्तुजगत की पुनर्रचना है। पुनर्रचना का मतलब ये है कि वस्तुजगत जो है, वो आधारभूत है लेकिन जब वो कविता में व्यक्त होता है तो वो वो नहीं रहता, जो वास्तविक है। उसमें हमारी जो आत्मपरकता है, जो सब्जेक्टिविटी है, हमारे भावों की जो अनुभूतियां हैं और हमारी जो बनक है (बनक मतलब व्यक्तित्व), वो उसमें मिल जाते हैं। इसलिए कविता जो है, वो वस्तुजगत से ज्यादा आकर्षित करती है। हालांकि उसमें वस्तुजगत होता है लेकिन वह उससे ज्यादा आकर्षक होती है। इसका कारण यह है कि उसमें और चीजें जुड़ जाती हैं.

सत्येंद्र –कविता के कंटेंट और फॉर्म के बारे में कुछ बताएं।

विजेंद्र—इनके संबंध जो हैं, द्वन्द्वात्मक हैं। कथ्य बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसमें कोई शक नहीं लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण फॉर्म भी होता है। फॉर्म निष्क्रिय नहीं होता है। इनके रिलेशन डाइलेक्टिकल होते हैं। डाइलेक्टिकल का मतलब द्वन्द्वात्मक। द्वन्द्वात्मक का मतलब ये है कि एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। अगर बहुत बेहतरीन आपका कथ्य है और बहुत खराब शिल्प में दिया हुआ है तो वह बेअसर हो जाएगा। और अगर निरा फॉर्म पर ही आप जोर देंगे तो उसमें अर्थवत्ता नहीं आएगी। इसलिए कंटेंट और फॉर्म के जो रिलेशन हैं, वो डाइलेक्टिकल होते हैं। फॉर्म पर बहुत ध्यान देना चाहिए। जितना हम कंटेंट पर ध्यान देते हैं, उतना ही हमें फॉर्म पर भी ध्यान देना चाहिए। बगैर फॉर्म के अच्छे से अच्छा कंटेंट भी भदेस हो जाता है। असरदार नहीं होगा।

सत्येंद्र :  आपने कहा कि जयपुर छोड़ने का बहुत कष्ट है आपको? आखिर इस कष्ट की वजह क्या है?

विजेंद्र : वजह ये है कि जयपुर बहुत ही अच्छा शहर है। उसे गुलाबी शहर कहते हैं। जब मैं भरतपुर से जयपुर किसी काम के लिए आता था तो हमेशा  सोचता था कि मैं किसी तरह इस शहर में रहूं। तो जब मैं रिटायर हो गया तो मेरे पुत्र ने खुद सलाह दी कि आगरा आपके लायक शहर नहीं है, आपको जयपुर रहना चाहिए। आगरा में हमारा बहुत बड़ा घर था। तो मैंने कहा कि ये तो मेरे मन की बात है। तो उसी ने सारी व्यवस्था की, घर के बेचने की और बाकी सारे इंतज़ाम। तो जयपुर आ गया मैं। बहुत ही शांत शहर है। मैं जिस कॉलोनी में रहता था, बड़ी ही शांत कॉलोनी थी और थोड़ी दूर निकलने के बाद जंगल आ जाते थे। सरसों के खेत, गेहूं के खेत मतलब दिखाई देते थे। तो मुझे बड़ा अच्छा लगता था। वहां महानगर जैसा सफोकेशन नहीं था। तो मैंने वहां बहुत काम किया।

सत्येंद्र :  जयपुर और दिल्ली के साहित्यिक माहौल में क्या फ़र्क पाते हैं?

विजेंद्र : दिल्ली तो मैं गया ही नहीं। दिल्ली एकाध बार गया हूं। बहुत पहले जब मैं पढ़ता था। दिल्ली दरबार में मेरी कोई रुचि नहीं है।

सत्येंद्र :  अब आपकी निजी ज़िन्दग़ी से जुड़े कुछ सवाल। अपने बचपन के बारे में कुछ बताएंगे।

विजेंद्र : मैं एक बहुत छोटे से गांव में पैदा हुआ हूं। जिला बदायूं में तहसील सहसवान में एक हैं गांव धर्मपुर। बहुत छोटा गांव है। मुश्किल से सौ-दो सौ घर होंगे। मेरा मकान कच्चा  था और हमारे मकान  के आगे दो तालाब थे। हमारा गांव दो नदियों के बीच में था। एक तरफ तो गंगा नदी थी और दूसरी तरफ महावा नदी थी। बरसात में दोनों एक हो जाते थे और हमारा गांव जो है, वह टापू बन जाता था। तो हम बड़ी कठिन परिस्थितियों में थे। हमारे गांव से 20-20 तीस तीस किलोमीटर तक सड़क नहीं थी। रेलवे स्टेशन 30 किलोमीटर दूर था। पढ़ने के लिए जब हम ट्रेन पकड़ने जाते थे तो हमें बैलगाड़ी में बैठना  पड़ता था। हमारी बैलगाड़ी थी क्योंकि हम किसान परिवार से थे। हमारा परिवार किसान था, खेतीबाड़ी होती थी। टाट पट्टी वाले स्कूल में पढ़े हैं हम। बैठने के लिए कुर्सी मेज नहीं थी वहां पर। अपनी टाट पट्टी ले जाते थे, उसे बिछा लेते थे और उस पर बैठकर  पढ़ते थे। एक बात जो मैं बताना चाहता हूं वो ये कि मेरी जो प्रारंभिक शिक्षा है, वो उर्दू में हुई थी। मैं अकेला लड़का था माता  पिता का तो उनका इरादा ये था कि हम ज्यादा नहीं पढ़ाएंगे। अपना काम वाम देखने लगे, इतना पढ़ाएंगे। तो मौलवी रफीक अहमद नाम के शिक्षक को बुला दिया गया और वो उर्दू पढ़ाते थे। आठवीं क्लास तक मेरी पहली जुबान उर्दू रही है। बाद में लोगों ने कहा कि उर्दू का ज़माना नहीं रहा, हिन्दी में शिफ्ट करो, तब मैं हिन्दी की तरफ आया। जब मैं हिन्दी की तरफ आया तो हिन्दी की परीक्षाएं प्रथमा, विशारद, साहित्य रत्न, साहित्य अलंकार ये सब किए। हिन्दी साहित्य परिषद नाम की संस्था थी, वो ये सब कराती थी। हाई स्कूल किया मैंने। हाई स्कूल करने के बाद मैं  सीधा बीएचयू चला गया। बीएचयू में 6 साल पढ़ा, वहां से अंग्रेजी में एमए किया। उसके बाद प्राध्यापक बन गया और जीवन चलता रहा।

सत्येंद्र :  पिताजी के बारे में कुछ यादें?

विजेंद्र : मेरे पिताजी किसान थे लेकिन उन्हें शिकार का बहुत शौक था। कुत्ते पालते थे। ग्रे हाउंड। मुर्गा मुर्गी बहुत पालते  थे, बत्तखें पाल रखी थी। बहुत शौकीन मिजाज के थे, अच्छे कपड़े पहनते थे और अपने बच्चों को भी अच्छे कपड़े पहनवाते थे। मुझे अब भी याद है कि जब बाज़ार जाते थे तो ये कहते थे कि जो सबसे अच्छा हो, वो दिखाओ। अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छा कपड़ा, अच्छी चीजें खरीदते थे। मेरे पिता स्वाभिमानी बहुत थे। हमें ये नसीहत देते थे कि गलत काम  कभी  मत करना, जिससे कि मां-बाप के नाम पर धब्बा लगे। पिता की ये नसीहत मैंने निभाई है। जो बात मैं कह देता हूं, वो मतलब अटल होती है। मैं उससे फिर मुकरता नहीं। एक उदाहरण देता हूं। भरतपुर में मैंने एक प्लॉट खरीदा था, 600 गज का। मेरी मिसेज ने कहा कि आगरा में मकान है और भरतपुर कोई रहने लायक जगह नहीं है तो फिर आप क्या करोगे इस प्लॉट का? तो मेरा एक परिचित था, उसने कहा कि आप मुझे दे दीजिए। तो मैंने उसको दे दिया। कोई लिखा-पढ़ी उसकी नहीं हुई। फिर मुझ पर प्रेशर आया कि आपने लिखा-पढ़त तो की नहीं है, हम आपको पूरे दाम देते हैं इसके। चौगुने-पंचगुने जितने भी। मैंने कहा नहीं। आप समझिए कि 17 साल बाद उस आदमी ने उसका रजिस्ट्रेशन कराया और 17 लाख में कराया उसने। एक उदाहरण दिया मैंने आपको। तो मैं ये मानता हूं कि एक कवि के लिए पहले एक नेक इंसान होना  पहली शर्त है। अगर आप नेक इंसान नहीं है तो अच्छे कवि नहीं हो सकते। जीवन में अगर आप गिरे हुए हैं और कविता में बड़ी बड़ी बातें करते हैं तो ये पाखंड हुआ कि नहीं? आपकी बात पर विश्वास कौन करेगा? लोग कहेंगे  कि जीवन में इतना गिरा हुआ है और कविता में इतनी ऊंची-ऊंची बात करता है। तो कवि से पहले मैं ये मानता हूं कि आदमी को एक नेक इंसान होना चाहिए। कविता सबसे पहले कवि को ही संस्कारित करती है और वो  ये कहती है कि जिस दिन तुम इन शर्तों को नहीं मानोगे मैं उछट के चली जाऊंगी। यानि कि जब तुम्हारे जीवन में पतन आएगा  तब मैं  तुम्हारे पास नहीं रहूंगी। ये संकेत देती रहती है कविता। मैं ये मानता हूं कि कविता लिखने वाला हर कवि कवि नहीं होता। हर युग में सैकड़ों कवि कविता लिखते हैं लेकिन उंगलियों पर गिने चुने रह जाते हैं। इसी तरह आलोचना लिखने वाला हर कोई आलोचक नहीं  होता। गिने चुने होते हैं। रामविलास शर्मा शिखर पुरुष हैं। आजतक कोई उनको  लांघ नहीं पाया। नामवर सिंह भी उनके कद के नहीं थे। नामवर सिंह बड़े आलोचक थे, इसमें कोई शक नहीं लेकिन उनके कद के नहीं थे। तो ये विरल होते हैं। अच्छा कवि, बड़ा कवि होना विरल है। बड़ा आलोचक होना भी बहुत विरल होता है। इसलिए इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि इतने सारे कवि लिख रहे हैं। बहुत से लोग शौकिया लिखते हैं। कविता शुरू करना आसान है लेकिन उसका निर्वाह अन्त तक करना और अपना व्यक्तित्व भी उसीके समानान्तर बनाए रखना ये बहुत मुश्किल काम है। इसीलिए कविता को साधना कहा गया है। यह एक साधना होती है, जिसे हर सांस का समर्पण चाहिए। ये आकस्मिक कर्म नहीं है। कविता आकस्मिक कर्म नहीं है कि जब मन में आया कर लिया। यह एक निरंतर साधना है। मार्क्स ने कहा है कि लिटरेचर अपने आप में कोई मीन्स नहीं है बल्कि एंड है। ये साध्य है, साधन नहीं है। जैसे आप धन कमाने के लिए लिखते हैं तो वो साधन हो गया लेकिन वह लिटरेचर नहीं होगा। कबीर ने कहा है न कि घर को जलाकर अगर कोई हमारे साथ आना चाहे तो आए। तो कविता आपको सम्पन्नता नहीं देती। कविता से कुछ अर्न नहीं होता। मैंने कविता से आजतक एक पैसे की कमाई नहीं की। एक भी पैसा। न पेंटिंग से। मेरी पेंटिंग लोग मांगते हैं। मैं कहता हूं ले जाओ।

सत्येंद्र—पेंटिंग की ओर आपका रुझान कैसे हुआ?

विजेंद्र—चित्रकला कविता से पहले मेरे जीवन में आई। जब मैं दसवीं में पढ़ता था तो चित्रकाल मेरा एक वैकल्पिक  विषय था और उसमें मुझे डिस्टिंक्शन मिला। चित्र नहीं बनाता था लेकिन स्कूलों में चित्रकला जैसे पढ़ाई जाती है, वैसे पढ़ता था लेकिन चित्रों में मेरी बहुत दिलचस्पी थी। हाई स्कूल पास कर लिया. बात खत्म हो गई। उसके बाद मैं सीधा बीएचयू चला गया। बीएचयू में 6 साल पढ़ा और इस दौरान मैंने कोई चित्र नहीं बनाया। कविता से तो जुड़  गया लेकिन चित्रकला मन में कौंधती रही। फिर उसके बाद जब मैं स्थापित हो गया, लेक्चरर हो गया, तब मैंने फिर चित्रकला शुरू की। मैं चित्रकला को अमूर्तन के रूप में बनाता हूं। मैं पोर्ट्रेट नहीं बनाता। मेरा मानना है कि अमूर्तन अपने आप में वैज्ञानिक स्टाइल है। कोई भी बड़ी कला बिना अमूर्तन के नहीं हो सकती। जैसे आप कविता पढ़ते हैं, आपको बहुत अच्छी लगती है लेकिन उसका कला तत्व क्या है, आप एक्सप्लेन नहीं कर सकते। ये एक्सप्लेन न करना ही अमूर्तता है। मैं न पेंसिल लेता हूं, न रबर लेता हूं। बस मेरे हाथ में ब्रश होता है और कलर्स होते हैं। मेरे चित्रों को अमूर्त  कहते हैं लोग लेकिन वो अमूर्त इसलिए नहीं है क्योंकि उनमें भू-दृश्यात्मकता है। भू-दृश्यात्मक चित्रकला। एक बहुत बड़ा वर्ग जो है उन्हें पसंद करता है। तो मुझे भी साहस हुआ। मैंने उसी तरह के चित्र बनाने शुरू किए। जो चित्र आपको सोचने को विवश न करे, मैं उसको महत्व नहीं देता। मेरी पुत्र वधू इंग्लैंड गई थी। वो वहां से वॉन गॉग की एक  पुस्तक ले आई। वॉन गॉग डेनमार्क का बहुत बड़ा चित्रकार था। ‘लस्ट फॉर लाइफ’ एक किताब है, वह वॉन गॉग की ज़िन्दगी पर ही है। वह ऐसा था चित्रकार, जीवन भर प्यार के लिए तरसता रहा लेकिन उसको प्यार नहीं मिला। बहुत बड़ा चित्रकार था। उसे एक लड़की से प्यार हो गया। लड़की ने समझा इतना बड़ा कलाकार है और ये प्यार का भूखा है तो उसने प्यार का रिस्पांस दिया उसको। वॉन गॉग ने कहा कि मेरे पास तुम्हें उपहार देने के लिए कुछ नहीं है। तो लड़की ने मजाक में कहा कि तुम कुछ उपहार मत दो बस अपना एक कान काट कर दे दो मुझे। तो उसने वास्तव में अपना एक कान काटा और उसे उपहार देने चला गया। यह देखकर वह लड़की बेहोश हो गई। उसके चित्र जब मैंने देखे तो अमूर्त हैं। बहुत सारे अमूर्त हैं।

सत्येंद्र –मां के बारे में कुछ बताएं।

विजेंद्र –मेरी मां पढ़ी लिखी नहीं थी लेकिन इतना ज्ञान था कि रामायण महाभारत पढ़ती थी और वो मुझे अच्छा लगता था। मन में सोचता था कि मैं जब बड़ा हो जाऊंगा तो महाभारत-रामायण जरूर पढ़ूंगा। वो मैंने किया। जब मैंने संस्कृत तीन साल पढ़ ली तो मैंने वाल्मीकि रामायण और महाभारत पढ़ा।

सत्येंद्र : बीएचयू से पढ़ाई करने के बाद आपने राजस्थान का रुख कर लिया?

विजेंद्र –मुझे ऑफर मिला। बीएचयू से निकलने के बाद मुझे अप्लाई करने की जरूरत नहीं पड़ी। एसएस मुकुन्दगढ़ कॉलेज, शेखावाटी में मुझे अंग्रेजी के लेक्चरर पद के लिए ऑफर मिला। प्राइवेट कॉलेज था। हमारे गुरुजी थे राम अवध द्विवेदी, जो हमें काव्य शास्त्र पढ़ाते थे। एस्थेटिक शब्द का इस्तेमाल वो जरूर करते थे। जब मैंने डिक्शनरी में देखा तो एस्थेटिक का मतलब सौन्दर्य शास्त्र लिखा हुआ था। मैंने तय किया कि इस विषय को मैं जरूर पढ़ूंगा आगे चलकर। तो मेरी जो पहली किताब है—सौन्दर्य शास्त्र—भारतीय चित्त और कविता। वो मैंने उन्हीं को समर्पित किया है क्योंकि उन्होंने ही तो वो शब्द दिया था मुझे। और उन्होंने ही मुझे रिकमेंड किया था एक कॉलेज के लिए। मुझे नियुक्ति पत्र मिला और मैं चला गया मुकुन्दगढ़। मुझे लोगों ने वहां कहा कि आप क्या करोगे यहां। आप बीएचयू से पढ़े हुए हो। आपका सरकारी में हो जाएगा। तो वहां जब वैकेंसिज निकली तो मैंने अप्लाई किया। मेरा इंटरव्यू हुआ और मेरा सेलेक्शन हो गया। मेरी पहली पोस्टिंग भरतपुर में ही हुई। ट्रांसफर लोग होते रहते हैं लेकिन मेरा 28 साल तक ट्रांसफर नहीं हुआ। जब मैं प्रिंसिपल के पद पर प्रमोट हुआ तो चुरू गया और चुरू से फिर नोहर गया मैं। नोहर से रिटायर होकर जयपुर आकर बस गया।

सत्येंद्र : नई पीढ़ी के कवियों को आप क्या सलाह देंगे?

विजेंद्र :  मैं फिर कहूंगा कि एक कवि को सबसे पहले एक अच्छा इंसान होना चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं। मैंने देखा है कि बड़े बड़े लेखक पथभ्रष्ट होते हैं। मुझे उनके नाम लेने में भी घृणा होती है। जैसे मैं उदाहरण दूं। कोई लेखक है और उसकी पत्नी जो है अपढ़ है। वह शहर में बड़े पद पर पहुंच गया तो अपनी ग्रामीण पत्नी को छोड़ कर दूसरा विवाह कर लिया, मैं इसको अनैतिक मानता है। यह एक गिरा काम है। रामविलास शर्मा की पत्नी अपढ़ थी लेकिन वो बड़ा सम्मान देते थे। त्रिलोचन की पत्नी को मैंने देखा है, वो तो उन पर झुंझला पड़ती थी लेकिन हंस देते थे। टाल देते थे क्योंकि जा रहे हैं आटा पिसाने के लिए और शाम हो गई घर लौटे ही नहीं, तो मैंने उनकी पत्नी को उन्हें झाड़ते हुए देखा था लेकिन वो कुछ कहते नहीं थे, मुस्कुराते थे। केदारनाथ अग्रवाल की पत्नी भी बिल्कुल अपढ़ थी लेकिन उन्होंने खुद को साधा उनके लिए। ये इंसानियत जो है, ये बहुत बड़ी चीज है। मैंने जितने बड़े कवि देखे या सुने, वो इंसान बहुत अच्छे थे। रामविलास जी से मेरा बहुत गहरा संबंध रहा है और लंबे समय तक रहा है। वो आगरा रहते थे, आगरा मेरा घर था। भरतपुर से जब भी आगरा जाता था, उनके पास जाता था। अब देखिए इतना बड़ा आलोचक, कोई काम कर रहे होते, छोड़ देते थे। बिठाते थे, पूछते थे, चाय पिलाते थे। साहित्य की बात करते थे। बताते थे मैं ये कर रहा हूं, इसके आगे ये प्लान है। मतलब व्यापक रूप से एक बेहतर इंसान होना बहुत जरूरी है। और ये कविता सिखाती है। मेरा अपना अनुभव ये है कि कविता बराबर सजग करती है कि मैं कोई गलत काम तो नहीं कर रहा हूं। ये सेंस कविता ही देती है।

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