सचिन मनन की कहानी ‘मोमेंट’ (Moment)

सचिन मनन अब तक 30 से 40 कहानियां लिख चुके हैं लेकिन लिटरेचर प्वाइंट पर उनकी यह पहली कहानी प्रकाशित हो रही है। इस कहानी की खासियत इसका ट्रीटमेंट है। अपना संदेश पाठकों तक पहुंचाने के लिए सचिन ने दो कालखंडों को जिस तरह जोड़ा है, वह अद्भुत है। आप पढ़ेंगे तो प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे। तो पढ़िए उनकी कहानी ‘मोमेंट’
पहली उद्घोषणा– प्रस्तावना
मैंने कई बार वही प्राचीन कथा सुनाई है। हो सकता है आपने पहले भी सुनी होगी लेकिन समझी नहीं होगी। कहानी कही ही ऐसे गई है कि अज्ञानी को कहानी सुनने में आनंद आए, समझ आए न आए इसमें कुछ नहीं रखा।

मैं कौन हूँ? मैं भटका हुआ देवदूत हूँ। अपने प्रतिद्वंद्वी के तर्क को इतनी अच्छी तरह से बाँचता हूँ कि अपने तर्क भूल जाता हूँ। और कहानी का पहला पात्र मैं हूँ। इसके बाद चंद्रप्रकाश है, जो जीवन से प्रेम करता है। चंद्रप्रकाश को साथ ले जाने के लिए मृत्यु का अर्दली उसके आस पास मंडरा रहा है। और मृत्यु कहानी का आखिरी पात्र है। तो कहानी शुरू करते हैं।

प्राचीन कहानी (जल्दी जल्दी)
चंद्रप्रकाश एक राजा था। मैं एक अघोरी। राजा के दरबार में मैं रोज एक उपहार दिया करता था-एक जंगली फल। चंद्रप्रकाश चूंकि स्वयं को राजा मानता था, इसलिए उस जंगली फल को अपने बंदर को दे दिया करता था। बंदर को उस फल में स्वाद नहीं आता था। इसलिए वो उस फल को आधा खाकर फेंक दिया करता था। जिस पेड़ पर वह बंदर बैठा करता था, उस खेत के किसान को रोज उस फल में छुपा हीरा मिलता। लेकिन ‘एक किसान के पास हीरा है’ अगर यह बात किसी को पता चली तो किसान पर संकट आ जाएगा। यह सोच किसान उस हीरे को अपनी कोठरी में छुपा लेता था। तो हीरा न किसान के काम आया, न चंद्रप्रकाश के और बंदर के काम का तो खैर वो था ही नहीं।

 दूसरी उद्घोषणा
मैं पहले बता  चुका हूँ कि मैं भटका हुआ देवदूत हूँ। जो कहानी सुन रहे हैं, वो अगर अज्ञानी हैं तो आनंद अनुभव कर रहे होंगे और ज्ञानी तो आश्चर्य। आश्चर्य इसलिए कि जिस तरह मैंने पिछले पैराग्राफ में तीसरे पात्र को इन्ट्रोड्र्यूस किया, उन्हें वह पसंद आया होगा। अब जो ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं वो पुनश्च पिछला पैराग्राफ पढ़ कोशिश कर सकते हैं।

आधुनिक कहानी –दसवां दिन देर रात (धीरे धीरे)
चंद्रप्रकाश अपनी आखिरी सांसें ले रहा है? या यह भी हो सकता है कि जीवन का हाथ थाम मृत्यु को गच्चा दे अपनों के बीच वापस लौटने वाला है?

क्या होगा–यह तो जीवन और मृत्यु के बीच सौदा पटने अथवा न पटने पर है। चंदप्रकाश सिर्फ इंतजार कर सकता है और अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा पूरी ईमानदारी से पिछले 10 दिनों से इंतजार कर भी रहा है।

तीसरी उद्घोषणा
“चंद्रप्रकाश ने कभी उस फल से प्यार नहीं किया जो मैं उसे रोज दिया करता था। वो जीवन भर जंगली फल को बंदर की तरफ लुढ़काता रहा और अब उसी फल को पकड़ना चाहता है।”   – देवदूत रचित ‘जीवन का सार’ से

दसवीं रात की बेनतीजा बहस (चौथे पात्र का कहानी में चले आना)
जीवन ने आखिरी बोली लगाई। मृत्य ने इनकार कर दिया। जीवन ने एक और कोशिश की, “बाकी सब छोड़, एक काम कर। 2 दिन और दे दे। दाम तो बोल?” जीवन, यकीनन, कुछ भी दे देने को तैयार था लेकिन मृत्यु ने तिरछी नजर से देखा और इनकार कर दिया। कुछ बोली तो नहीं लेकिन उस तरेर ने, जो उसके माथे पर थी, साफ कर दिया, ‘कोई दाम पूरा नहीं बैठेगा।’
जीवन ने पैंतरा बदलकर कहा, “जानती है न मैं हर उस शह में हूँ, जिसपर तेरी नजर पड़ती है। कहीं इस धोखे में तो नहीं कि हर शह से निकाल  फेंक देगी मुझे?” जीवन ने अपनी लंबी यात्रा में सीख लिया था, जहाँ साम, दाम न चले वहाँ दंड, भेद से काम बन जाता है।
मृत्यु को कहाँ फुरसत थी कि वो बेकार के बौद्धिक विमर्श में पड़े। उसके पास पड़ी अर्जियों की लिस्ट लंबी थी। मेरी तरफ देख बोली, “देवदूत, जीवन से मिले हर दर्द की निजात मृत्यु में ही मिलती है– क्या कहता है?”
मैं इस बहस का सिर्फ साक्षी रहना चाहता था; बहस का प्रतिभागी होने का कोई इरादा न था। लेकिन देवदूतों की अपनी परेशानी है – सत्य वचन पर ‘सत्य वचन’ का उच्चारण जैसे अनिवार्य हो।
“चंदप्रकाश” मृत्यु ने अर्दली की तरफ देखते हुए नाम की घोषणा की।
अर्दली ने नाम सुनते ही यंत्रवत समझ लिया, ‘जाओ, ले आओ, समाप्त करो उसका हर क्षण ‘हरक्षण’ खोते चले जाना’। मृत्यु ने अर्दली को रिमाइंडर के लहजे में कहा, “जल्दी से लौटना। खड़ा मत रहना वहाँ”।
जीवन ने अपने कान वहीं टिका रखे थे। जीवन बड़ा जुझारू होता है; कहीं थोड़ी सी भी आशा हो तो अपनी टांग अड़ा दिया करता है। अपने चेहरे पर कृत्रिम आत्मबल का भाव ला बोला, “चंद्रपकाश बडा जूझारू है। ऐसे ही तुम्हारे साथ उठकर नहीं चल देगा।“ जीवन लगातार नए पैंतरे आजमा रहा था।
जीवन की बात सुन अर्दली में क्षण भर को ही सही अविश्वास का बीज रोपित हुआ।

लौटते हैं प्राचीन कहानी में (जल्दी जल्दी)
हीरे का गुण है चमक। अघोरी वर्षों तक प्रतिदिन चंद्रप्रकाश को फल देता रहा और एक-एक कर किसान उन्हें अपनी कोठरी में रखता रहा। और फिर वो रात आई जिस रात पूरा गाँव अचरज में था कि किसान के घर देर रात इतना प्रकाश कैसे है? किसान इस डर से उसी रात देश छोड़ भाग गया कि अगली सुबह राजा के सैनिक उसे नहीं छोड़ेंगे। भागने से पहले उसने अपनी पोटली में एक हीरा जरूर रख लिया।

चौथी उद्घोषणा
“चंद्रप्रकाश को यदि वह सारे हीरे वापस मिल भी जाएँ जो अघोरी उसे रोजाना दिया करता था तब भी वह उन हीरों का कोई उपयोग नहीं कर पाएगा। अज्ञानी पूछेंगे क्यों? और ज्ञानी जानते हैं – जो बीत गई वो बात गई”। – देवदूत रचित ‘जीवन का सार’ से’।

लौटते हैं प्राचीन कहानी में (जल्दी जल्दी)
चंद्रप्रकाश अगले दिन अघोरी का इंतजार करने लगा। उसके दिए फल का क्या उपयोग करना है, इस बार वो इसकी पूरी योजना बना कर बैठा था। अज्ञानी पूछेंगे – “तो क्या अघोरी आया?” ज्ञानी कहेंगे, “अब वो लौट कर नहीं आने वाला”। भटका हुआ देवदूत कहेगा, “यह दसवीं रात की बेनतीजा बहस पर निर्भर है।

लौटते हैं दसवीं रात की बेनतीजा बहस पर
मृत्यु ने झटपट अर्दली से कहा “अर्दली, याद रहे तुम पुण्य का काम कर रहे हो। याद रहे जीवन के लिए दुख, कष्ट, विलाप, भाग्य का रोना, विपत्ति, चिंता, खेद, क्लेश, पीड़ा, तकलीफ, दुर्गति, उसकी खुराक हो सकता है, लेकिन मृत्यु तो इन सबसे कन्नी काटकर निकल जाने का नाम है। हमें देर नहीं करनी चाहिए।“
अर्दली ने चप्पल पहनते हुए कहा “समझ गया, चंद्रप्रकाश को जीवन के साथ तड़पता छोड़ दें – यह तो नाइंसाफी होगी। निकलता हूँ”
मृत्यु को महसूस हुआ कि उसका तर्क अर्दली पर काम कर गया। दोगुनी मजबूती से जीवन को इंगित करते हुए बोली, “एक पल को भी किसी आत्मा को नहीं तड़पाना। एक पल को भी कष्ट में नहीं रखना। एक पल को भी नहीं।”
जीवन ने झुँझलाकर कहा, “बेवकूफ, जिजीविषा कहते हैं इसको”
मृत्यु मंद-मंद मुस्कुराई, खुद से जैसे कह रही हो, “जीवन की पकड़ ऐसे ही कमजोर होती है। कैसे कुण्डली मारकर बैठा रहता है लोगों के रोम रोम में, किसी को छूटने ही नहीं देता। चारों तरफ यह जो हाहाकार है इसके वशीकरण का ही प्रभाव है। लेकिन जब झुँझलाने लगता है तभी पकड़ ढीली करता है”।
मृत्यु को यकीन सा होने लगा कि उसका पलड़ा भारी होने लगा है। चंद्रप्रकाश का मरना तय जान पड़ा। “तेरी चालाकी नहीं जाती!– धूर्त, महाधूर्त”
जीवन चुप रहा। मैं जानता हूँ यह उसका आखिरी पैंतरा था, जब हार नजदीक हो लेकिन हार हुई न हो तो प्रतिद्वन्द्वी को जीत का भ्रम देना हमेशा से उसका आखिरी पैंतरा रहा है।
“क्रूर, बस एक दिन और, एक और दिन, एक दिन न सही एक और साँस ही सही।” जीवन बोलता जाता था।
जीवन और मृत्यु के बीच सौदा किसी नतीजे पर पहुंचे उससे पहले अर्दली चंद्रप्रकाश के सिरहाने पहुँच गया।

आधुनिक कहानी –ग्यारहवें दिन की सुबह(धीरे धीरे)
अगली सुबह चंद्रप्रकाश की आँख खुली तो उसने पाया उसके आस पास खड़े लोगों के चेहरे लटके हुए हैं। सभी चेहरे से ऐसा लगता था मानो क्षण भर के लिए उधार ली हुई चिंता का नकाब डाले खड़े हैं। अपनी-अपनी व्यस्तताओं के लिए चिंता लिए लेकिन सामाजिक कर्तव्य का निर्वाह करने को बाध्य। चंद्रप्रकाश ने खुद को ऊपर से नीचे तक देखा।तए नहीं कर पाया कि आस पास खड़े लोग उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा में थे या उसकी शवयात्रा में शामिल होने के लिए आए थे।

पाँचवी उद्घोषणा 
“मृत्यु से ठीक पहले मनुष्य विक्षिप्त हो जाता है। यह जीवन का मत है।
“जीवन के आखिरी पलों में मनुष्य मृत्यु से औपचारिकता के चलते गुफ्तगू करने लगता है”। यह मृत्यु का मत है। – देवदूत रचित ‘जीवन का सार’ से’।

लौटें आधुनिक कहानी की तरफ
अर्दली ने मदद के इरादे से चंद्रप्रकाश से कहा, “सच्चाई आपको मुक्त कर देगी चंद्रप्रकाश जी लेकिन मुक्ति से पहले वही सच्चाई बहुत तड़पाएगी”।
“मृत्यु को जीवन की उपलब्धि के रूप में देखिए चंद्रप्रकाश जी। और अगर आप तैयार हैं तो चलें?”अर्दली ने जोड़ा।
‘मुझे इस क्षण में डरना चाहिए न’ विक्षिप्त चंद्रप्रकाश ने किससे कहा ठीक से कहा नहीं जा सकता।
“मृत्यु का अध्ययन किसी ने नहीं किया, मृत्यु पर बस मानवीय प्रतिक्रियाएं हैं चंद्रप्रकाश जी। ऐसे में यह कहना ही ठीक रहेगा कि आपका मौत से डरना तर्कहीन है। चलिए अब चलते हैं” अर्दली ने हाथ आगे बढ़ाया।  
“यह एहसास कि मृत्यु निश्चित है, पहले कभी न महसूस किया गया डर पैदा कर रही है” विक्षिप्त चंद्रप्रकाश किससे कह रहा था इसके लिए पाँचवी उद्घोषणा पढ़ पाठक अपना निर्णय ले सकते हैं।
“चंद्रप्रकाश जी, वास्तव में जीवन का अंत होने वाला है और इस कारण आप डर रहे हैं। मृत्यु का तो आपका अनुभव ही नहीं है। फिर इस डर का संबंध मृत्यु से कैसे हो सकता है? यह जीवन का षड्यन्त्र ही मानिए कि मृत्यु को लेकर नकारात्मक भावनाओं का उत्प्रेरण वह लगातार करता रहा है। उठिए चलिए, पहले अनुभव तो लीजिए; संभवतः मृत्यु जीवन से बेहतर हो!” अर्दली ने चंद्रप्रकाश का हाथ पकड़ कर उसे उठाना चाहा।

प्राचीन कहानी में अंतिम बार (जल्दी जल्दी)
“महाराज बुद्धिमान व्यक्ति वास्तव में जीवन के बीच में मृत्यु का चिंतन करता है। और इसी चिंतन के बल पर अधिक प्रबुद्ध और जिम्मेदार तरीके से जीता है”। अघोरी राजदरबार में खड़ा था।
“होश न हो तो जीवन ऐसे ही चूक जाता है। खैर अब जो हुआ सो हुआ, अब पीछे की तरफ मत जाओ और आगे के विषय में भी मत सोचो”।  अघोरी ने अपने झोले में से फिर एक फल निकाला और राजा की झोली में डाल दिया। फल के बीच से हीरा निकला तो राजा का मन भटकने से रुक न सका, उसको फिर वही हीरे याद आने लगे जो वो वर्षों से खोता आया था – राजा रोने लगा।

आखरी उद्घोषणा
“जीवन पीछे भी नहीं और आगे भी नहीं। शेष फिर कभी”। -– देवदूत रचित ‘जीवन का सार’ से’।

आधुनिक कहानी में अंतिम बार
विक्षिप्त चंद्रप्रकाश निरंतर अपने ही दिए तर्क को काटने हेतु नए तर्क प्रस्तुत कर रहा था। इसी शृंखला में फिर बोला “अर्दली, मेरे दोस्त, चंद्रप्रकाश ने ठीक से तैयारी कहाँ की, समय ही कहाँ था उसके पास। इसी कारण वो अपनी मृत्यु से डरता है”।

“और आपके इस डर के फलस्वरूप ही तो आपके संबंधियों को आपकी स्थिति पर दया आ रही है।“ अर्दली के इतना कहते ही चंद्रप्रकाश की नजर उसके आसपास खड़े लटके हुए चेहरों पर गई। अर्दली ने अपनी बात में जोड़ा “चंद्रप्रकाश जी ध्यान रहे, जीवन इसी तरह गलत धारणाओं के माध्यम से मन को धोखा देता है”।

चंद्रप्रकाश की मृत्यु
विक्षिप्त चंद्रप्रकाश सर उठाए पंखे की तरफ टकटकी लगाए देख रहा था। नर्स ने अपने साथी से कहा, “इनकी हालत बिगड़ रही है। पाजामा गीला कर लिया है। बॉय को कहो कपड़े बदल दे। मैं डॉक्टर को फोन कर देती हूँ। घरवालों को खबर कर देनी चाहिए”।
“चलें? वहाँ ऊपर। किसको देखते हैं आप चंद्रप्रकाश जी?” अर्दली, चंद्रप्रकाश की आराम कुर्सी के पीछे खड़ा था
“मुझे ईश्वर दिखता है”।
“आप गलत देखते हैं चंद्रप्रकाश जी। ईश्वर परिपूर्ण अवस्था में रहते हैं। नश्वर पुरुषों पर ध्यान देने का अर्थ है दिव्य जीवन से दूर चले जाना। आपको लगता है वह आपके लिए दिव्य जीवन से दूर चले जाने का जोखिम उठायेंगे?”
“मैंने हमेशा अच्छा किया है – जीवन भर”।
“मृत्यु संवेदना से वंचित होती है चंद्रप्रकाश जी। आप इसका अनुभव तो लीजिए। चलिए अब चलते हैं”।

उपसंहार
मैंने आज फिर वही प्राचीन कथा सुनाई है। और इस बार भी कहानी अज्ञानी को आनंद देगी, ज्ञानी को आश्चर्य। मैं कौन हूँ? मैं भटका हुआ देवदूत हूँ– शैतान। अब इसी कहानी की शैतानी देखो – राजा चंद्रप्रकाश को जीवन जीने का एक और मौका मिला लेकिन वो जो छूट गया। उसको लेकर रोता है। चंद्रप्रकाश को मौका नहीं मिल और वो जो भविष्य में करना चाहता था वो न कर सका, अतः रोता है। मैं देवदूत सदियों से कहानी कहता हूँ – जीवन इस क्षण में है – लेकिन आज्ञानी कहानी के आनंद में खोया है और ज्ञानी आश्चर्य में


सचिन मनन

आत्मकथ्य

बतौर लेखक मैं सिर्फ दो बातें जानता हूँ-कोई कहानी ऐसी नहीं है जो पहले नहीं लिखी जा चुकी और कोई कहानी ऐसी नहीं है जिसे दोबारा नहीं कहा जाना चाहिए। मैं खुद को रचनाकार कहने में झिझकता हूँ क्योंकि मैं कुछ भी मौलिक रच ही नहीं सकता। और ऐसा इसलिए कि मौलिक रचने का काम तो उस रचनाकार का है, जिसने सबकुछ रचा। उस रचनाकार की इस रचना – सचिन मनन – का ‘अवतरण’ (क्योंकि मैं भी रचना का अंश ही हूँ, इसलिए अवतरण में दंभ है न अतिशयोक्ति) 1977 में हुआ। क्योंकि इसके लिए ‘डाटा ऐनलिस्ट’ की नौकरी से जीवन यापन तए किया गया था इसलिए वही रोटी का जरिया है। मैं पढ़े हुए को दोबारा लिखता हूँ, इसके अतिरिक्त मेरा कोई परिचय नहीं।

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11 Responses

  1. हरीश कनौजिया says:

    कुछ ऐसा एहसास जैसे की कहानी हमारे आसपास या फिर हमारे साथ कुछ घटीट हो रहा हो

    ग्यारहवें दिन की सुबह। बहुत करीब महसूस हुआ ।
    बहुत बहुत बधाई

    चंद्रप्रकाश की मृत्यु । “मुझे ईश्वर दिखता है”। मन को छू लेने वाला।

  2. Preeti Gurnani says:

    कहानी की संरचना और प्रस्तुतीकरण बहुत अलग तथा बेहतरीन .
    Applaudable work. Keep writing!

  3. Preeti Gurnani says:

    कहानी की संरचना और प्रस्तुतीकरण बहुत अलग तथा बेहतरीन .
    Applaudable work. Keep writing!

  4. Neeraj Neer says:

    बिल्कुल ही अनूठे ढंग से लिखी गयी कहानी ।

  5. Deepak Prasad says:

    “जीवन पीछे भी नहीं और आगे भी नहीं। शेष फिर कभी”। -– देवदूत रचित ‘जीवन का सार’ से’।
    Thinking if this work of Devdut is available in print form… seems key to salvation … Good work Sachin.

  6. Arti Chandi says:

    संपादक साहब, आपने सही कहा। ट्रीट्मन्ट अलग है। नीति कथा का इस्तेमाल बढ़िया किया है। लेखक को बधाई

  7. Mahidhar J says:

    Congratulations Manan…

  8. Rahul says:

    कहानी पढ़ते हुए चक्कर आए। यही बात आप आसान तरीके से भी लिख सकते थे सचिन भाई। इसीलिए कोई आपको नहीं छापता क्योंकि आप जलेबी बहुत बनाते हैं। literature point को आपको धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने आपको छापा। मुझे कहानी में एक बात जो बहुत शानदार लगी वह यह कि मृत्यु को यकीन है कि असली पुण्य का काम तो वो कर रही है। जीवन मुझे एंटी हीरो लगा यार। और किसान का आखिर क्या हुआ ?? वो सिरा छूट गया तुमसे – नहीं ?

  9. Sekhar Kanyal says:

    हमारे गाँव में इस कहानी में जिस लोक कथा का जिक्र है वह पण्डितजी इस तरह कहते हैं – बेटा जो समझ गए तो पार लग जाओगे। बढ़िया कहानी है। और लिखो । और तुम्हारा अपना ब्लॉग पेज का क्या हुआ ? आजकल आते नहीं वहाँ

  10. Sunil Prakash says:

    Found it interesting. Applaudable “Story Structure”. I heard it first hand about a month back. & both of us talked about it. I am pleasantly surprised that editor found it worthy of getting published. Especially after the response that we received from HANS, we both were sure that this wont get published. Stay Blessed and Stay Safe

  11. शशि कुमार सिंह says:

    बहुत ही अच्छी कहानी। यह कहानी नए शिल्प में विषय की अप्रतिम प्रस्तुति के लिए याद रखी जायेगी।आप दोनों को बधाई।

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