शिवदयाल की कहानी ‘नन्हें रंगदार’

शिवदयाल

मो.- 9835263930

 

‘चोर-चोर ….’ अचानक शोर उठा और इतवारी तरकारी बाजार में धक्कामुक्की और ठेलमठेल शुरू हो गई। मैंने आलू वाले से वापस रेजगारी लेने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि बगल से किसी ने धक्का मारा। मैं आलू के ढेर पर गिरते-गिरते बचा, लेकिन धक्के के जोर से कई गज आगे घिसट आया। चवन्नी वापस लेने के लिए मैं ज्यों ही संभला कि देखा – एक व्यक्ति भीड़ को चीरते हुए निकल भागने की जी-तोड़ कोशिश में है। उसके पीछे से कुछ लोग उसे धकियाकर गिराने की कोशिश कर रहे हैं। किसी ने उसे कमर में बँधे गमछा को पकड़कर रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने गाँठ ढीली की और पकड़नेवाले के हाथ में गमछा रह गया। कुछ लोग ऐसे में भी हँसने से बाज नहीं आए। हद तो तब हुई जब एक अन्य जवान ने चुनौती मानकर पीछे से उसकी कमीज की कालर पकड़कर उसे गिराने की कोशिश की, लेकिन यह क्या, यह तो कमीज का एक चीथड़ा उसके हाथ में रह गया और वह गिरते-गिरते बचा। इस बार लोगों को हँसी नहीं आई क्योंकि कड़ुवा तेल में चुपड़े चोर महाराज के साँवले बदन की चमक-गमक ने सबको विस्मित कर दिया। अब उत्साही नौजवान उसे पकड़ने को कोशिश करते और वह मछली की तरह फिसलकर उनके हाथ से निकल जाता। मुक्कों तक का वार मानो उसकी पीठ और छाती पर से फिसल जाता था।

चोर ठीक मेरे पास से निकला और भीड़ थोड़ी हल्की पाकर निकल भागने को हुआ कि वह सहसा मुँह के बल गिर पड़ा। देखता क्या हूँ कि नन्हें जी उसकी पीठ पर लात जमाए उसे दबोचने की कोशिश में हैं और भकुआए लोगों को उसपर मिट्टी डालने को कह रहे हैं। पहले से उसके पीछे लगे जवानों ने उसकी देह पर मिट्टी डालनी शुरू कर दी ताकि वह छूटकर भाग न सके। कहने की बात नहीं कि इसी क्रम में उसे कूटा भी खूब।

‘का नन्हें भइया, कुछ भेंटलई भी ना, आ झुट्ठो तु पकड़ ले लऽऽ छोड़ दऽ जाए दऽ हमरा, अब न अइबई बजार में। छोड़ दऽऽ भइया, गोड़ पड़ऽही ….!’ नन्हें भइया ने हाथों में मिट्टी मलकर उसकी बाँह मरोड़ी, और अचानक छोड़ दिया।

“जाए दो, इसको जाए दो …. जब कुछ लेबे नहीं किया तब का?’’ हाथ झाड़ते नन्हें भइया उठ खड़े हुए। कुटाई-रसिक भीड़ का उत्साह ठंडा पड़ गया। चोर हाथ-पैर-गरदन झटकारते उठ बैठा था। एक जवान ने उसके थोबड़े को निशाना बनाना चाहा कि नन्हें भइया गरज उठे – ‘नाऽ ….’। उन्होंने आँख तरेककर जवान को देखा तो उसने अपना हाथ रोक लिया।

अजब जमाना था। छोटन दिन भर खाली घूमता था इस रोड से उस रोड, और रात में चोरी करता था – ऐसा कहते थे। कहते थे कि दिन भर घूमकर वह क्वार्टरों की टोह लेता रहता है। किसका घर बंद है, किस घर में, सर-सवांग कम है। किसके आँगन की दीवाल आसानी से फाँदी जा सकती है। मैं उसे फिल्मी गाने गाते सड़क पर मटरगश्ती करते देखता तो यह सोचकर हैरान होता कि क्यों आखिर उसे कोई पकड़कर पुलिस को नहीं दे देता, या ठुकाई ही कर देता अगर वह चोर ही है, जबकि वह तो बैकुंठ बाबू के सर्वेन्ट रूम में रहता था जो कि खुद पुलिस विभाग में थे।

तब रंगदारी की दुनिया में नन्हेंजी एक उभरता हुआ नाम था। रंगदारी में डीलडौल से ज्यादा साहस (दुस्साहस पढ़ा जाए) की भूमिका महत्वपूर्ण और निर्णायक मानी जाती थी। वरना तो नन्हेंजी तीखे नैन-नक्शवाले, दरमयाना कद के एक दुबले-पतले शख्स थे। कहीं से रंगदार या खौफनाक नहीं दिखते। अक्सर तो बैलून मियाँ के फिल्मी डॉयलॉग सुनकर हँसते भी रहते थे। तब उनके छोटे-छोटे दाँतों के बीच के ‘गैप्स’साफ-साफ दिखाई देते थे। उन्हें देखकर कोई कहाँ सोच सकता था कि पुतुलवा को उसी के मुहल्ले में रगेद-रगेद कर जिसने पीटा था, वह नन्हें जी ही थे। पुतुलवा चक्कूबाज था लेकिन उसे चक्कू निकालने का मौका ही नहीं दिया। वह अचेत होकर गिर पड़ा तो कमीज की कालर और आस्तीनें ठीक करते उन्होंने अगल-बगल निगाह दौड़ाई। बाबू बाजार के दुकानदार, राहगीर और उदीयमान रंगदार उनकी अभ्यर्थना में स्वतःस्फूर्त बोल उठे- पड़ाम भइया! परनाम नन्हें भइया! …. उसके बाद मोहल्ले में उन्हें कभी किसी ने नन्हें जी नहीं कहा, आदर से नन्हें भइया ही पुकारा।

मझले भइया ठीक कहते थे कि नन्हें जी को दारोगा बनने की अभिलाषा थी। आठवीं पास करने के बाद से ही वे इस कोशिश में लग गए थे। सुबह चार बजे उठकर कुछ साथी दारोगा अभ्यर्थियों के साथ एयरोड्रम या राजभवन की ओर दौड़ लगा देते। हमारी टोली जब सुबह-सुबह निकलती तो हम उन्हें दौड़ लगाते देखते। हमारा शगल था बालूखत्ता में बालू से भरे गड्डों में कूदना, और फिर बाहर निकलने की जुगत बिठाना। बुजुर्ग कहते थे कि वह किसी नदी की छोड़ी हुई जगह थी। नदी या तो विलुप्त हो गई हो या उसने धारा बदल ली हो। बरसात में उन गड्डों में पानी भर जाता तो हम बंसी लेकर पोठिया-गरई का शिकार करने चल पड़ते। पोठिया मछली को पारदर्शी पानी में एकदम तल पर रेत में अठखेलियाँ करते मैंने पहली बार वहीं देखा था, जैसे चाँदी की पत्तियाँ तल से झिलमिल करतीं। माँ मुझे मछली पकड़ने से बराबर मना करती, और पहली बार माँ की बात मान लेने की जो चाहा था…।

यह भी एक उल्लेखनीय बात थी कि गुंडई की तरफ आकर्षित लड़कों को दरोगई बहुत सुहाती थी। इस ‘स्कूल’ के कई लड़के रौबदाब वाले अच्छे दारोगा साबित हुए थे और लड़कों की निगाह में उनकी हैसियत अच्छी पढ़ाई कर अच्छा पद पानेवाले बाबुओं के लड़कों से कहीं ऊँची और काम की थी । शायद यही कारण हो, यानी दारोगा के लिए ‘क्रेज’, जो अनेक बाबुओं के मन में यह आकांक्षा पलती थी कि उनके बच्चों में से कम से कम एक रंगदारी के आकाश को अपनी प्रतिभा से जगमगा दे। अब सौभाग्य कहिए कि दुर्भाग्य, बटेसर बाबू, नन्हेंजी के पिता, अभिभावकों की इसी कोटि में आते थे। नन्हेंजी के शुरुआती दुस्साहसों का वे बढ़-चढ़ कर बखान करते, कुछ इस प्रकार मानो उनका होनहार लड़का एक दिन जरूर कुछ (दारोगा) बनकर दिखाएगा। मेरे कड़ियल बाबूजी इसी वजह से उन्हें सख्त नापसंद करते थे और मुझे उस ओर जाने की सख्त मनाही थी। हमारा रूटीन बिल्कुल फिक्स्ड था। शाम को धुँधलका होते ही रेलवे लाइन के किनारे वाले रोड पर झाँककर हम दूर से उन्हें पहचान लेते। उनकी साइकिल हम्हीं फाटक के अंदर करते, फिर हाथ मुँह धोकर पढ़ने बैठ जाते।

‘पुतुलवा कांड’ के बाद सुनने को मिलता कि नन्हें भइया अब रामपुरी भी रखने लगे थे। इस लाइन में टिके रहने के लिए यह हथियार जरूरी माना जाता था। सच कहूं तो मैं उनसे भय खाने लगा था, जबकि मुझसे जब भी मिलते, प्यार से पेश आते – ’ का हो, का हाल है तोहर? ठीक से पढ़ो बउआ-’ मेरे घर में मझले भइया को रंगदारी-चर्चा में खूब रस मिलता। इस दुनिया की कोई खबर हो, उन तक जरूर पहुँचती और वे अपनी उपलब्धि की तरह उसे हमारे सामने प्रस्तुत करते। मुहल्ले के रंगदार उन्हें जान रहे हों, यही उनके लिए पर्याप्त था। उसे उनकी भीरूता कहें या बाबूजी का दबाव, उनका शौक रंगदारों की सोहबत या शागिर्दी तक नहीं पहुँचा। बाद में बीए पास करके वे बैंक में लग गए, गो कि पुराना शौक अबतक बरकरार है।

हाँ, तो नन्हें भइया का रुतबा यहाँ तक बढ़ा कि लौंडे उनका नाम लेकर बस का किराया नहीं देते, कभी-कभी मुहल्ले के दुकानदारों से भी छूट ले लेते, हवा यहाँ तक उड़ी कि पटना जंक्शन पर बेटिकट पकड़े जाने पर नन्हें भइया का नाम ले लो और छूट जाओ! ऐसा नहीं कि इस लाइन में कम्पीटीशन या प्रतिद्वन्द्विता नहीं थी – चावल बाजार का सुदमवा, यारपुर का रतनवा, पंजाबी कॉलोनी का कुलबंता, अनीसाबाद का बन्ने खाँ …, सब एक पर एक! गनीमत थी कि सबका ‘एरिया’ बँटा हुआ था, सभी अपने मोहल्ले को ‘प्रोटेक्शन’ देते थे। अक्सर पुल-पुलिया-सड़क, यहाँ तक कि बिजली के खंभे भी उनके सीमा क्षेत्रों को चिन्हित करते थे – पुल के दक्खिन सुदमवा, दस नंबर रोड के उत्तर ललनवा, चालिस नंबर के पश्चिम बन्ने खाँ …! इस बात में संदेह नहीं कि नन्हें भइया सबसे ऊपर चल रहे थे। लेकिन ‘सबदिन होत न एक समान’! वक्त-वक्त की बात है।

यह चोर-पिटाई वाली घटना के कुछ ही दिनों बाद की बात है। हमें इस समाचार ने स्तब्ध कर दिया – नन्हें भइया किसी औरत के रूप-जाल में फँस गए हैं! जितना मुँह उतनी बातें। सही बात जानने के लिए हमें मझले भइया के स्रोतों पर निर्भर करना था। तो उनके स्रोत से जो पता चला वह यह कि एक सुनसान दोपहरी को एक जवान औरत रिक्शे पर किसी का पता पूछती रोड-रोड घूम रही थी। पता जाली था। मामला शायद प्रेम में धोखे का रहा हो। शाम होते-होते शोहदे पीछे लग गए। नन्हें भइया को अपने टहलुओं से खबर मिली। मामला उनके एरिया का था। ऐसे किसी मामले से पहले कभी साबका पड़ा नहीं था। भारी फेर में पड़े। हिरणी के पीछे लकड़बग्घे लगे थे। कुछ हो-हवा गया तो पुलिस उनको भी जरूर तलब करेगी। कुछ करना तो होगा ही। अपने गुर्गों के साथ साइकिल पर निकले। उनतीस नंबर रोड में बहेड़ा के पेड के पास वो रिक्शा मिला और उसके बगल-बगल पान कचरते चलते शोहदे। साँझ घिर आई थी। रिक्शे को रुकवाया। सामने नन्हें भइया को देख शोहदे हैरान। लेकिन आज वे कहाँ किसकी सुननेवाले थे। नन्हें भइया से भी उलझने को तैयार। और तभी देखनेवालों ने देखा – नन्हें भइया दाहिने हाथ में बडे़ फल वाला रामपुरी चाकू लहराते चुनौती दे रहे थे – खबरदार! खबरदार! जिएला हऊ त निकल ले हियाँ से, ना त आज खून हो जइतऊ …!

नन्हें भइया मामले की नजाकत समझ रिक्शे को सवारी सहित थाने लेकर चले गए। थाने में क्या हुआ क्या नहीं, किसी को कुछ पता नहीं। कुछ ‘जासूसों’ का कहना था कि नन्हें भइया की थानेदार ने अच्छी खातिरदारी की। उन्हें लॉकप में बंद करके उस जल्लाद चाँद उस्मान हवलदार से पिटवाया। अब क्या सच था, क्या झूठ, किसे पता! हाँ, एक बात रह गई। उस शाम मझले भइया का खास परिचित नन्हें भइया के साथ था। उसका कहना था कि जब रामपुरी बंदकर नन्हें भइया ने रोती-बिलखती सवारी को देखा तो कुछ क्षणों तक मानों टँगे रह गए – समाधि में चले गए हों जैसे। उनकी तंद्रा तब टूटी जब सवारी उनके पैरों पर गिर पड़ी – हमको बचा लीजिए, रहम कीजिए।

बाद का किस्सा यूँ है कि कोई साल भर तक नन्हें भइया को किसी ने नहीं देखा। जब अचानक प्रगट हुए तो लगा कि ये कोई और नन्हें भइया हैं। न किसी से बात न चीत, अपने में लीन। लोग अगल-बगल से गुजरते – ’पड़ाम भइया, परनाम भइया’, लेकिन मानो उनका ध्यान कहीं और रहता। बदल गए थे नन्हें भइया। वैसे भी रंगदारी की उम्र थोडी़ होती है। कोई कहता शादी कर आए हैं, कहीं रख आए हैं। कोई कहता पुलिस की मार, भइया, अच्छों-अच्छों की रंगदारी छुड़ा देती है। मेरी माँ कहती थी, आदमी की मति का कोई ठिकाना नहीं, कब बदल जाए, कब क्या करा दे। सब बाबू, ग्रह-नक्षत्र का चक्कर है।

बटेसर बाबू रिटायर होकर चले गए अपने गाँव, नन्हें भइया उसी क्वार्टर में रह गए, सर्वेन्ट रूम को दखल कर लिया। नये बाबू को क्वार्टर आवंटित हुआ। साजो-समान के साथ आए तो देखा, नामी रंगदार सर्वेन्ट रूम पर कब्जा किए बैठा है। झगड़ा-झंझट से बचने के लिए पुराने ठिकाने लौटने को हुए, तो स्वयं नन्हें भइया ने मिन्नत करके उन्हें रोका और विश्वास दिलाया कि उन्हें कोई तकलीफ या असुविधा नहीं होगी, वे आराम से रहें। आस-पड़ोसवालों ने भी आश्वस्त किया कि डरने की कोई जरूरत नहीं है।

उनके टहलुओं ने ही खगौल रोड पर एक क्वार्टर के अहाते के अंदर चाय-बिस्कुट की दुकान कर ली। नन्हें भइया कुर्सी पर बैठे रहते, सारा काम उनके दो चेले मिलकर करते। दुकान चल निकली। नन्हें भइया समझौता-फरिऔता भी करवाने लगे दुकान में बैठे-बैठे। फिर यह भी हुआ कि फुलपैंट-बुश्शर्ट से खादी का कुर्ता-पायजामा भी उन्होंने धारण कर लिया। धरना-जुलूस के दौर में कुछ नेतागिरी भी चल निकली। कुलमिलाकर उनका रुतबा वही रहा, धंधा बदल गया। मझले भइया की अब उनमें खास रुचि नहीं रह गई थी, नौकरी में उनके पास वह खाली समय भी नहीं था। बाबूजी रिटायर हुए तो क्वार्टर छोड़ हम किराए के मकान में आ गए। फिर तो अपनी भी नौकरी-चाकरी हुई और ठिकाने बदलते रहे। मेरा मन लेकिन अपने क्वार्टर के अहाते के झाड़-बनस्पतियों – नीम-करौंदे, शरीफा और अश्वगंधा, उड़हुल-कनेर और सफेद गुलाब के लतरों में ही उलझा रहा। सपने में नेवले, पंडुक-नीलकंठ-बनमुर्गियाँ दिखाई देतीं। आँगन में आम की फुनगियों के ऊपर पूनम का चाँद दिखाई देता। ब्रह्मवेला में कभी नींद खुलती तो पंजाबी कॉलोनी के गुरुद्वारे की गुरबानी, बीस नंबर रोड की मस्जिद की अजान और अनीसाबाद मंदिर की घंटियाँ – लगभग एकसाथ सुनाई देतीं। सुनने में आता, मुहल्ले की हालत बुरी हो रही है, की जा रही है। क्वार्टरों और सड़कों की मरम्मत नहीं हो रही, अवैध लोग बसते या बसाए जा रहे हैं। जैसे जानबूझकर एक भरा-पूरा, हरा-भरा मोहल्ला नष्ट किया जा रहा था।

कोई सात-आठ साल पहले की बात होगी। छुट्टियों में घर आया हुआ था। सुबह-सुबह अचानक गर्दनीबाग की ओर निकले पड़ा। नन्हें भइया का खोखा अभी जिंदा था, बल्कि उसके अगल-बगल दो-एक खोखे और लग गए थे। बेंच पर जाकर बैठा और पूछा – नन्हें भइया कहाँ है जी?

जिस आदमी की पीठ मेरी ओर थी, झट मेरी ओर घूमा और थोड़े गौर से देखा तो मैं विश्वास न कर सका कि ये नन्हें भइया थे – मटमैली गंजी, कंधे पर लाल गमछा। बेतरतीब केश, हफ्ते भर की बढ़ी अधपकी दाढ़ी-मूँछ …! मैं सकपकाकर खड़ा हो गया – ‘पड़ाम नन्हें भइया? पहचनलऽऽ ? राजू….’’

‘पहचान लिए बाबू! काहे नहीं पहचानेंगे …..’ हल्की-सी मुस्कान चेहरे पर लाते उन्होंने धीमी आवाज में कहा और चूल्हे पर दूध चढ़ाया। फिर दो चाय के गिलास लिए मेरे पास आकर बैठ गए – ‘लो चाय पिओ।’

‘आप यहीं रह गए नन्हें भइया, मुहल्ले में, इहें रह गेलऽ…’

‘कहाँ जाते! कहाँ अउर कुछ देखे-जाने …., यहीं पैदा हुए, यहीं मर-खप भी जाएँगे बउआ। तुम बताओ … का कर रहे हो आजकल…? सोनुआ तो बैंक धर लिहिस था न?’

‘का कहें भइया, किसी तरह नौकरी पा गए हम भी, ज्यादेतर बाहरे रहते हैं … और बाबूजी? माने चाचा-चाची लोग?’’

‘बाबू तो जिंदगी बरबाद कर दिहिस …. ठीके है, सब ठीके है बउआ …’ यह बात मानो उन्होंने अपने आप से कही। यह जुमला मोहल्ले के लड़कों में खूब प्रचलित था, बाप नामक संस्था के विरुद्ध अपनी भड़ास एक ही वाक्य में निकालने के लिए। लेकिन जुमले के रूप में नन्हें भइया ने इसे नहीं कहा था, यह कहते हुए उनके अंतर की पीड़ा उनकी आँखों में भी छलक आई थी। मुझे इतने सालों बाद उन्हें इस रूप में देखकर ही धक्का लगा था, यह सुनकर मन और दुःखी हो गया। मैंने बात बदलने के लिए पूछा – ‘‘और बाल-बच्चा सब भइया?’’

‘बरबाद हो गए हम बाबू …. सब खतम हो गया … का बचा हमरे पास ….’’ यह सुनकर मुझे काठ मार गया। वे एकदम चुप हो सुड़ककर चाय पीते रहे।

अब और विस्तार में जाकर क्या-क्या कहूँ ! कौन ऐसी प्रसन्न कर देनेवाली बात है जिसका बखान करूँ। ऐसे प्रसंगों को सार-संक्षेप में ही कहना-सुनना ठीक रहता है।

सच है कि थाने में नन्हें भइया की पिटाई हुई थी, यानी मझले भइया का कहना सही था। पिटाई इसलिए हुई कि थानेदार ने कुछ ऐसे सवाल किए थे कि उन्हें गुस्सा  आ गया था। तो उनकी गर्मी उतारने के लिए हवलदार ने जमकर पिटाई की उनकी। उस औरत ने भी मिन्नतें कीं कि उन्हें छोड़ दिया जाए, लेकिन उल्टे उनका चालान कर दिया गया। दो माह जेल में रहकर बाहर आए तो उस महिला की खोज में सुधार गृहों में भटकते रहे, लेकिन वह कहीं नहीं मिली। उन्हें समझ में आ गया कि उसे गायब कर दिया गया था। उन्हें लगा कि उनके चलते ही उस लड़की का जीवन नष्ट हो गया। न वे उसे थाने ले जाते न वह गायब की जाती। इससे तो अच्छा यही होता कि उन लफंगों को पीट-पाटकर शांत कर देते और उसे उसके ठिकाने छोड़ आते, या फिर …! मारे ग्लानि के वे बनारस के घाटों पर घूमते रहे, लंगरों में कुछ-कुछ खा-पीकर काम चलाते रहे।

 ‘सोचो बउआ, कोई तुम्हारी शरण आए, और तुम उसकी रक्षा कर न सको … धिक्कार है!’

इधर घरवालों ने तो उन्हें गुंडा बनने के लिए आजाद ही कर दिया था। कहीं कोई आधार बचा नहीं। वे वापस तो आए मोहल्ले में, लगा कि और कहीं रह नहीं सकेंगे, लेकिन वे कहीं से भी नन्हें भइया नहीं रह गए थे, उनका और ही अवतार हो गया था। गो कि तब भी उन्हें सर्वेन्ट रूम हासिल करने के लिए कुछ जोर-जबरदस्ती करनी पड़ी। अपने को सहेजना शुरू किया। एक बिना बाप की बच्ची की परवरिश करते रहे, लोगों ने सोचा उन्होंने परिवार ही बसा लिया है। दुनिया ऐसी ही है। कुछ नेतागिरी भी जमाने की कोशिश की लेकिन मन जल्द ही विरक्त हो गया – ‘‘कींच-कादो का खेल है जी, हमसे न हुआ …। गंदा आदमी बनकर रहने से तो अच्छा लगा छोटा आदमी बनके रहना, तो यही दउरी-दोकान कर लिए …. रंगदारी कहते हो, अरे हम कौन रंगदार हैं, रंगदार होकर क्या कबाड़ लिए जिनगी में …! एक ठो अबला का रच्छा नहीं कर सके। ऊ बोला था हमको हो, कि पुलिस के पास मत ले चलिए, किरपा करिए… आ हम …! ए बउआ … इससे तो अच्छा होता कि हम उससे शादी कर लेते- जोर-जबरदस्ती से ही, ऊ बच तो जाती ….!’’

अभी गर्दनीबाग से होकर गुजर रहा हूँ। अंदर आतंक पैदा करनेवाला ध्वंस का नजारा है। सत्ताइस नम्बर के आगे उत्तर की ओर से आँखें लगभग ढकते हुए आया। उधर मेरा घर था – अपना क्वार्टर। उधर देखने की हिम्मत नहीं जुटा सका। पूरा ध्यान नन्हें भइया के खोखे पर था। वह कहीं नहीं दिखा। मेरा जी धक्-सा हो गया है, धड़कनें तेज हो गई हैं और नजर धुँधली।

गर्दनीबाग में जब नेवलों-बनमुर्गियों-पंडुकों-कठफोड़वों-बगुलों-तितलियों ….. को रहने का हक नहीं तो फिर आखिर नन्हें रंगदार को क्यों हो। इस वज्र-कठोर दुनिया में कुछ भी कोमल, ऋजु क्यों हो?

1 Response

  1. rabindrasubhash says:

    अभी-अभी ‘नन्हे रंगदार’ पढ़ा। बहुत ज़्यादा nostalgic महसूस हुआ। पटना में पले-बढ़े होने के कारण एक-एक शब्द, वाक्यांश, अभिव्यक्ति ख़ूब समझ पा रहा था।

    एक और बात, थोड़ी unrelated व अजीब है पर पढ़ते वक़्त अमरकान्त के उपन्यास ‘सूखा पत्ता’ के क़िरदार, मनमोहन, की भी ख़ूब याद आयी; मनमोहन भी अपने मोहल्ले का नन्हे-भैया था।

    हाल ही में Margaret Atwood का एक interview देखा, उसमे वो कह रहीं थीं कि कुछ भी ‘absolute fiction’ या ‘absolute figment of imagination’ नहीं होता, कोई भी कहानी पूर्णतः काल्पनिक नहीं होती। हमारे अनुभव, विचार, इत्यादि की ही अभिव्यक्ति का रूप होता है fiction। आपकी कहानी पढ़कर एकदम वैसा ही महसूस हो रहा था।

    इस कहानी को पढ़ना मनोरंजक तो ज़रूर था पर इसमें वो nostalgia के elements भी गूँथे हुए थे जो मन में “ऐसा नहीं हुआ होता तो क्या होता, कैसा होता” के विचार छोड़ जाते हैं। और साथ ही छोड़ जाती हैं कितनी ही स्मृतियाँ।

    धन्यवाद और शुभकामनाएं।

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