नवीन गोपाल कानगो की 5 ग़ज़लें

प्रोफेसर नवीन गोपाल कानगो

प्राध्यापक एवं अध्यक्ष 
सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग 
समन्वयक, परिष्कृत उपकरण केंद्र 
डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) ४ ७०००३ 

Mobile 9425635736,

nkango@gmail.com

एक

कहकशाँ हूँ मैं  सारे सितारे मुझमें

बहता दरिया हूँ सारे किनारे मुझमें

ये मेरा दिल है कि आईनाख़ाना

मैं सभी में नज़र आता हूँ सारे मुझमें

अजीब तजरबा हुआ है कल रात मुझे

मैं नज़ारा था और सारे नज़ारे मुझमें

अपने गिरने के ज़िक्र से मुझे गुरेज़ नहीं

ढूँढ़ता हो न कहीं कोई सहारे मुझमें

 

दो

कहता है दुनिया को मुकम्मल, झूठ ही होगा

मुस्कराता है सू-ए-मक्तल, झूठ ही होगा

अब कोई भरम दोस्त की शनासाई का न रहा

वो सब्ज बाग, ख्वाबों का महल, झूठ ही होगा

मैं तो बस आज में ही जी लेता हूँ

तुम जिसे कहते हो कल, झूठ ही होगा

अल्फाजों से उठाता है साँसों का बोझ वो

कहते हैं जिसको लोग गजल, झूठ ही होगा

वक्त कब किसी का हुआ है जनाब

वो जो हर पल जाता है बदल, झूठ ही होगा

 

तीन

ये झूठ है, किसी ने किसी को चाहा

जब हुआ, हमको ख़ुद से प्यार हुआ

मुफ़लिसी में था तो सच बोला किया

बिकी क़लम तो सिर्फ व्यापार हुआ

किसी की जान लेकर ही कोई ज़िन्दा है

हर एक पहला दूसरे पे जाँनिसार हुआ

एक निवाले के लिये मर गया बच्चा

रौनक़-ए-शहर देख कर मैं शर्मसार हुआ

उस ग़म-ए-हयात से मेरा कोई राब्ता ही नहीं

जाने किस हक़ से मैं उसका ग़मगुसार हुआ  

 

चार

रह.ए.दैर में ख़ुशनुमा लोगों से मिला

राह में मिल गया मुझे सफ़र का सिला

एक पुरनूर दरख़्त की छाँव तले

मुझमें अचानक कुछ हवा.सा हिला

आसमाँ हो गया था मेरा वजूद

मेहरबाँ वो मुझे ज़मीं सा मिला

वो अपना अक्स निहारता ही रहा

फूल तनहाई में चुपचाप खिला

मैनें फिर उसका हाल पूछ लिया

जो बिछड़कर फिर कभी न मिला

 

रह.ए.दैर –मंदिर का रास्ता,

 

पांच

मंज़िलें भी मयस्सर हों मरहले ही नहीं

कैसे पहुँचेंगे उस पार अगर चले ही नहीं

घर से फिर निकला हूँ आज ये सोचते हुए

कितने ऐसे हैं जो घरों से निकले ही नहीं

मेरी आवाज़ में असर कम तो न था

संग दिल ही रहे होंगे जो पिघले ही नहीं

हवेलियों में रौनक थी रोशनी थी बहुत

उदास झोपड़ों में दिये मगर जले ही नहीं

आईना फिर बँट गया था टुकड़ों में

सीरतें भी नुमाया थीं शक्लें ही नहीं

शहर में हर तरफ़ ग़ौर से देखो

अँधेरे मंज़र भी बहुत हैं उजले ही नहीं

 

मरहले—पड़ाव 

 

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