शंकर की कहानी ‘नायक’

ये प्रेम किशोर के लिए उद्भुत और अभूतपूर्व क्षण थे और स्टेट सर्विसेज प्रतियोगिता संयोजित करने वाले इस कार्यालय की इमारत से सफल परीक्षार्थियों की सूची देखकर निकलते हुए उनके पाँव जिस तरह उड़ रहे थे,  यह उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था। उन्होंने पथरीली जमीन पर पाँव दबा-दबा कर चलने की कोशिश की लेकिन पाँव थे कि उड़ते ही जा रहे थे और दिल था कि उछलता ही जा रहा था।

उन्होंने ठहरकर दिमाग पर जोर दिया, क्यों ऐसा हो रहा है। सवा दो सौ सफल परीक्षार्थियों में उनका स्थान पाँच-दस के भीतर नहीं, डेढ़ सौ के बाद ही था। यह ऐसी स्थिति तो नहीं थी कि इस तरह इतराया या इठलाया जाये। उनके दिमाग ने इसका जवाब तुरन्त दिया, पाँच दस के भीतर वे आते हैं जिनके घर में कोई गाइड करने वाला होता है या जो महंगी और अच्छी कोचिंग लेकर परीक्षा में बैठते हैं। एक मामूली साधानहीन परिवार के उन जैसे लड़के के लिए, जिसने ट्यूशन पढ़ा पढ़ा कर और रोजमर्रा की जरूरतों में कटौती कर कर के पढ़ाई पूरी की हो, यह कामयाबी पाँच-दस क्रमों में आने जैसी ही है। वे स्कूल में क्लास में फर्स्ट-सेकेंड आते थे तो क्या हुआ, अच्छे कॉलेजों में नाम लिखा लेने की उनकी कोई औकात नहीं थी। उनके हिस्से में यह शोहरत जरूर थी कि वे अपने कस्बे का चिराग हैं और इस कस्बे से अगर कोई निकलेगा या कुछ करेगा तो वे प्रेम किशोर ही होंगे। उनके सीनियर और उनके हमउम्र उन्हें इस कस्बे का हीरो कहते थे। वे कहते थे, सबसे पहले और सबसे अच्छी नौकरी प्रेम किशोर की ही लगेगी और दोस्तों के बीच सबसे पहले किसी की शादी होगी तो उन्हीं की होगी।

उन्होंने अपने दिमाग पर दस्तक दी तो उनको कुछ कुछ आभास हुआ, यह शायद दबी हुई इच्छाओं और जमीन की निचली सतह पर घिसटते रहने की यातनाओं से निकलकर सामान्य सतह पर आ जाने की उछाल है जो उन्हें अपनी सरहदों में नहीं रहने दे रही है और जिसने उनके पाँवों और दिल में पंख टाँक दिये हैं। ऑफिस के कम्पाउंड से बाहर निकले कर वे सड़क पर आ गये।

आम तौर पर आठ-दस किलोमीटर पैदल चल लेना उनका रोजमर्रा था। वे जब कभी इंटरव्यू या परीक्षा के लिए इस शहर में भी आते थे तो दूरियाँ पैदल ही तय कर लेते थे। रिक्शा कभी-कभी उन्होंने उसी हालत में लिया था जब स्टेशन पर पहुँचने में देर हो जाने और ट्रेन छूट जाने का अंदेशा रहता था। लेकिन आज उनके दिल ने कुछ ऐसा उत्साह दिखाया कि उन्होंने एक रिक्शावाले के हाथ देकर रोक लिया।दिन भर शहर में घुमाने और आठ-साढ़े आठ बजे स्टेशन पर छोड़ देने के लिए किराया पूछने पर रिक्शा वाले ने उलझने-भरे लहजे में दो सौ रुपये लेने की बात कही थी। यह उनकी औकात से ज्यादा था। लेकिन आज ‘चलो’ कहते हुए प्रेम किशोर तेजी से रिक्शे की सीट पर बैठ गये।

रिक्शा आगे बढ़ने लगा तो उन्होंने पैंट की बेल्ट के पास बनी चोरपॉकिट को धीरे से टटोल लिया। यहाँ के लिए रवाना होते समय पिताजी ने आने-जाने का किराया और दिन में कहीं नाश्ता-खाना कर लेने के लिए कुल दो सौ रुपये दिये थे और हिदायत दी थी कि कमखर्ची करना। मां ने अलग बुलाकर हजार रुपये थमा दिये थे कि इसे चोरपॉकिट में रखना और कोई मुश्किल आ पाये, तभी खर्च करना वरना उसे बचाकर वापस लिये जाना। माँ ने इसकी भी ताकीद की थी कि किसी भी हालत में शाम वाली ट्रेन से आ जाना, रूकना मत। मेरी खाँसी कभी भी उखड़कर जानलेवा हो सकती है। वह जब भी यहाँ आया था, मां ने उसे यही हजार रुपये दिये थे और ऐसी ही ताकीद की थी। उन्होंने पॉकिट को ऊपर की ओर थोड़ा उठा हुआ पाया तो इत्मीनान हुआ, माँ के पैसे सही सलामत छिपे हुए हैं।

थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर हनुमान मंदिर आया तो एक बार फिर माँ याद आयी। माँ ने कहा था, अगर रिजल्ट में तुम्हारा नाम हो तो हनुमान जी के चरणों में एक किलो लड्डू चढ़ाकर लेते आना, मैं आस-पास पड़ोस में बाँटूंगी। उन्हें एक बार लगा, वे लड्डू इसी मंदिर में चढ़ा दें लेकिन फिर तुरन्त ही लगा कि लड्डू का पैकेट दिन भर हाथों में ढोते रहना मुसीबत जैसा होगा और आज की खुशियों में बाधा पैदा करेगा।

चलो, लड्डू लौटते समय स्टेशन के पास वाले मंदिर में चढ़ा लेंगे और डिब्बा हाथों में लिये हुए ट्रेन में बैठ जायेंगे।

आगे शहर का सबसे व्यस्त और मशहूर चौराहा था। लेकिन वहाँ पहुँचने से पहले रास्ते में सबसे नामी वीमेंस कॉलेज आया। उन्होंने एक बार कॉलेज की ओर देखा। उन्होंने महसूस किया, दिल में कोई उछाल आ रहा है और गुदगुदी हो रही है। उन्होंने उसे दबाने की कोशिश की लेकिन उछाल रुक नहीं रहा था और गुदगुदी थम नहीं रही थी।

प्रेम किशोर शहर के सबसे व्यस्त और मशहूर चौराहे पर आ गये। यहाँ राजनेता, पत्राकार, लेखक, वकील, प्रोफेसर, कलाकार और बुद्धिजीवियों का अड्डा जमा रहता था। हर वक्त ये यहाँ घूमते-फिरते, टहलते मिलते थे। यहाँ उन्होंने कुछ देर चहलकदमी की, खुद को इस महत्वपूर्ण जमावड़े का हिस्सा माना और मन ही मन पुलकित हुए।

यहाँ चाय-काफी या कोल्ड ड्रिंक की तीन-चार दुकानें थीं। वे जब भी राजधानी में आते थे, उन्के मन में इच्छा उठती थी, वे भी कहीं खड़े होकर काफी या कोल्ड ड्रिंक पियें लेकिन वे जब भी पिता द्वारा दिये गये  पैसों का हिसाब बिठाते थे तो पाते थे, कोल्डड्रिंक पर पंद्रह रुपये खर्च करना पिता के दिये हुए पैसों पर एक बोझ डालने जैसा था और उन्होंने हमेशा अपनी इच्छा दबा ली थी। आज उन्होंने एक दुकान पर खड़े होकर कोल्डड्रिंक की बोतल मांगी, कोल्डड्रिंक को धीरे-धीरे चुस्कियाँ ले लेकर पिया ताकि वे कुछ ज्यादा देर तक खड़ा रह पायें। कोल्डड्रिंक खत्म हो गया तो उनके जी में आया, वे इसकी बोतल को उसी तरह लुढ़का कर किनारे कर दें, जिस तरह किसी फिल्म में महानायक ने शराब की खाली बोतल लुढ़का कर एक तरपफ फेंक दी थी। वे इधर-उधर देखने लगे कि कोई जगह दिखायी पड़े तो बोतल को उसी तरह से लुढ़का दें। तभी दुकानवालेने हाथ बढ़ाकर खाली बोतल वापस ले ली।

अंग्रेजों द्वारा इस शहर में बनवाये गये प्रसिद्ध गोलघर को उन्होंने आस-पास से गुजरते हुए देखा था लेकिन उसकी सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर तक जाने और वहाँ से शहर को देखने का खयाल उनके मन में कभी नहीं आया था। इस काम में समय गंवाना उन्हें हमेशा फिजूल लगा था। लेकिन उनके मन में आज इस खयाल ने जोर मारा कि इसके ऊपर चढ़कर शहर को देख ही लिया जाये। गोलघर के ऊपर चढ़कर उन्होंने पूरे शहर को देखा, शहर के कई हिस्से एक साथ दिखायी पड़े। वे चौंके, इतना बड़ा है यह शहर, वाह। उन्होंने बारी-बारी से हर दिशा में नजरें दौड़ायीं जैसे कि आज उन्होंने इस शहर को जीत लिया हो और अब उसका मुआयना कर रहे हों।

प्रेम किशोर ने अभी तक की जिंदगी में झील नहीं देखी थी और न ही समुद्र देखा था क्योंकि वे ऐसे किसी शहर में गये ही नहीं थे जहाँ झील हो या जो समुद्र तट पर बसा हो। उनके मन में इच्छा जगी कि आज वे कोई झील या समुद्र देखते। यहाँ कोई झील नहीं थी, न ही यह शहर समुद्र तट पर बसा था। उन्होंने रिक्शा वाले को उत्साहित किया, चलो, स्टीमर घाट पर ले चलो। स्टीमर घाट सूना पड़ा था। सामने नदी थी, पानी सूखकर घट गया था और नदी बहुत पतली हो गयी थी। उनका मन नहीं भरा। दुत, बेकार समय बरबाद हुआ,’ उनके होठ हिले और वे लौटने लग गये।

रिक्शावाला उनके इशारे पर पूरब की तरफ लम्बी सड़क पर चलने लगा। सड़क की एक तरफ कॉलेज, अस्पताल, लाइब्रेरी, अन्य शिक्षण संस्थान थे, दूसरी तरपफ दुकानें थीं। जब किताबों की एक दुकान शुरू हुई तो फिर किताबों की ही दुकानें आती गयीं। प्रांत के प्रीमियर कॉलेज के पास आकर उन्होंने रिक्शा रुकवा दिया और कॉलेज को हसरत भरी निगाहों से देखने लगे। मन में खयाल आया, यदि उनका एडमिशन इस कॉलेज में हुआ होता तो वे सूची में बीस-पचीस लड़कों के बीच हो सकते थे या फिर कुछ दूसरी ऊँचाइयों पर हो सकते थे। लेकिन तुरन्त उनके मन में एक दूसरा खयाल भी आया, ‘मैंने छोटे कॉलेज में ही पढ़ाई तो क्या हुआ।’ उनको लगा, उनका कद थोड़ा और बड़ा हो गया है।

सड़क के अंतिम सिरे पर इंजिनीयरिंग कॉलेज था और वहाँ से पुराने शहर की थोड़ी पतली सड़क शुरू हो जाती थी। प्रेम किशोर ने अपना रिक्शा यहीं से मुडवा लिया। किताब की जो दुकानें आते समय दायीं तरफ थीं, अब बायीं तरफ आ रही थीं। पुफटपाथ पर लगी पुरानी किताबों की दुकान के पास वे झट से उतर गये। दुकान वाले के पास जाकर वे तन कर खड़े हो गये, ‘मुझे पहचाना, भाई’?

दुकानवाला उन्हें विस्मय से देख रहा था लेकिन प्रेम किशोर ने अपनी आँखें दुकान वाले पर टिकाए रखीं।

‘बाबूजी, मेरे यहाँ से बहुत सारे लड़के आधे दाम पर पुरानी किताबें ले गये हैं। आप भी कभी ले गये होंगे।’ दुकानवाला उनके प्रति आत्मीयता ही दिखा रहा था।

‘हाँ हाँ, मैं आपके यहाँ से ही पुरानी किताबें खरीदकर ले गया था और इस बार मुझे कामयाबी मिली है।’ प्रेम किशोर ने खुशी में दुकान वाले का हाथ झकझोरा।

‘जो भी आपके यहाँ से किताबें खरीद कर ले गये और कामयाब हुए, एक बोर्ड लगाकर उनकी तसवीरें लगाइये। सभी आपके यहाँ से किताबें खरीदने आयेंगे।’ प्रेम किशोर जब यह कह रहे थे तो उनकी आँखें चमक रही थीं। कोई यदि उस समय उनकी आँखों में झाँकता तो उनमें उसे सबसे पहले प्रेम किशोर की ही तसवीर दिखायी पड़ती।

अब पाँच-साढ़े पाँच बज रहे थे। प्रेम किशोर जब मुख्य चौराह के इलाके में लौटकर वापस आये, तब तक धूप ढलने लगी थी। रास्ते में उन्होंने चोरपॉकिट से पैसे निकाल कर बाबू जी के पैसों के साथ मिला दिये थे। उनका खयाल था, आज कामयाबी का दिन है, पैसे खर्च हो जायें तो हो जायें। रोज थोड़े ही ऐसा अवसर आता है। उन्हें भूख लगी हुई थी। वे जहाँ उतरे, वहाँ आइसक्रीम पार्लर था। आस-पास एक नामी

साउथ इंडियन रेस्टोरेंट भी था। आज डोसा खाया जाये, इस खयाल ने जोर मारा।

तभी आइसक्रीम पार्लर के पास खड़ी एक आकर्षक लड़की दिख गयी। लड़की हवा में अपनी अँगुली उठाकर ऊपर से नीचे एक लकीर खींच रही थी। वे चौंके, लड़की किसे बुला रही है। उन्होंने आगे-पीछे, अगल बगल देखा लेकिन वहाँ आस-पास उनके सिवा कोई नहीं था।

उन्होंने लड़की को एक बार फिर देखा, लड़की ने हवा में एक बार और लकीर बनायी।

प्रेम किशोर के दिल में उत्साह ने जोर मारा तो उनके पाँव थोड़ा आगे बढ़ गये। उनकी अँगुलियाँ हवा में उठ गयीं और ‘व्ही’ की आकृति में तन गयीं।

 ‘तुम हवा में ये लकीरें खींच रही थी, इसका क्या मतलब?’ प्रेम किशोर सकुचा रहे थे, फिर भी सामने थे।

‘मैं अपनी फ्रेंड का इंतजार कर रही हूँ। वह आने में देर कर रही है तो मैंने हवा में अँगुलियों से उसके लिए रास्ता बनाया और मनौती की कि वह जल्द आ जाये, देर नहीं करे।’ लड़की की आवाज दबी-दबी सी थी।

‘मैंने अपनी दोनों अँगुलियों से जा बनाया, वह ‘विक्टरी’ है। मैं आज के रीजल्ट में स्टेट सर्विसेस प्रतियोगिता में कामयाब हो गया हूँ।’

लड़की ने पूछा नहीं था, फिर भी उन्होंने बताया। खुशी में उनका चेहरा दमक रहा था।

‘ओ, तो यह बात है। तुम बहुत लक्की हो। पहले से ‘जान-पहचान नहीं है, फिर भी तुम को मेनी मेनी कांग्रेचुलेशन…’ लड़की ने उनको बधाई दी थी लेकिन वह इस तरह सिकुड़ी-सिमटी दिख रही थी जैसे कि किसी जुर्म का कबूलनामा व्यक्त कर रही हो।

‘तुम बाहर के हो?’ लड़की ने थोड़ा रुक कर अंदाजा लगाया था।

‘हाँ, मैं यहाँ से लगभग 125-130 किलोमीटर दूर एक छोटे से कस्बे से हूँ। लगभग साढ़े आठ बजे मेरी ट्रेन है और मैं उसी से लौटूँगा।’ उनकी आवाज में सापफगोई और निश्छलता थी।

‘तुमने तो शायद आइसक्रीम खा ली है लेकिन मुझे बहुत भूख लगी है। चलो, मैं ट्रीट देता हूँ। साउथ इंडियन रेस्टोरेंट में डोसा खाते हैं। डोसा मुझे बहुत अच्छा लगता है और मेरे कस्बे में डोसा की कोई दुकान नहीं है।’ प्रेम किशोर के दिल में साहस का जो ज्वार उठा था, उसमें एक और लहर उठी।

‘नहीं, मैं डोसा नहीं खाती हूँ।’ लड़की तो नहीं हँसी लेकिन प्रेम किशोर को झेंप मिटाने के लिए या फिर अपनी ऊँचाई बरकरार रखने के लिए हँसना पड़ा।

कुछ देर दोनों के बीच खामोशी छायी रही लेकिन यह खामोशी लड़की ने ही तोड़ी, ‘तुम चले जाओ। डोसा खा लो।’

‘नहीं, नहीं। मैं ट्रेन पकडने से पहले स्टेशन पर ही कुछ खा लूँगा।’

दोनों के बीच चुप्पी फिर छा गयी। दोनों इधर-उधर देखते रहे। इस बार चुप्पी प्रेम किशोर ने तोड़ी, ‘घंटा भर हो गया, तुम्हारी दोस्त अभी तक नहीं आयी। लगता है, किसी काम में उलझ गयी। चलो, शापिंग कम्पलेक्स के कम्पाउंड में पत्थर की जो बेंच बनी है, वहाँ बैठते हैं। चाय या काफी तो पिओगी?’

लड़की ने न ‘हाँ’ कहा था, न ‘ना’ कहा था। बस वह शापिंग काम्पलेक्स की तरफ बढ़ने लगी थी।

दोनों बेंच पर आकर बैठ गये। प्रेम किशोर पास के स्टाल से दो काफी ले आये, फिर पूछा, ‘कुछ खाने के लिए भी लोगी?’

‘नहीं’

दोनों फिर चुप रहे।

‘मेरी कामयाबी का दिन है। कोई गिफ्ट या ट्रीट लोगी?’ प्रेम किशोर को यह पूछने में कोई झिझक महसूस नहीं हुई।

‘नहीं, हर किसी से गिफ्ट या ट्रीट नहीं लिया जाता है।’ लड़की कहकर फिर चुप हो गयी।

कुछ देर की चुप्पी के बाद प्रेम किशोर फिर आगे बढ़े, ‘तुम अपने बारे में कुछ बताओ…।’

‘मेरे पिता जी एक प्राइवेट कम्पनी में काम करते थे, दो महीने पहले उनकी छंटनी हो गयी। माँ एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती हैं। मैंने बी.ए. तक की पढ़ाई की है और नौकरी के लिए जहाँ-तहाँ एप्लिकेशन भरती हूं।’ प्रेम किशोर व्यक्तिगत जानकारियाँ पाने के स्तर पर उतर आये थे। फिर भी लड़की ने बता दिया।

‘अच्छा, ज्वाइन करूँगा तो तुम्हारे लिए कोई उपाय बिठाऊँगा।’ प्रेम किशोर ने एक बार फिर ऊँचाई पर जाने की कोशिश की।

‘नहीं। कभी न कभी, कोई न कोई नौकरी अपने आप लग जायेगी।’ लड़की ने उनसे दूरी बनायी।

‘तुम्हारा नाम क्या है?’ प्रेम किशोर ने एक और बिल्कुल व्यक्तिगत जानकारी माँगी।

‘सपना’ लड़की की आवाज बिल्कुल ठंडी थी।

‘ओ, सपना, एक दिन का सपना या जिंदगी भर का सपना?’ प्रेम किशोर ने अपनी सरहद लांघ ली थी। उन्हें उम्मीद थी, कम से कम इस बार लड़की जरूर मुस्करायेगी लेकिन उनकी उम्मीद के उलटा लड़की ने उन्हें ठंडी निगाहों से देखा।

प्रेम किशोर घबड़ा गये। उन्हें लगा, कुछ गलत हो गया है लेकिन अब तो वह कह चुके थे, शब्द उनकी जुबान से निकल चुके थे। सिर्फ वे चुप्पी अख्तियार कर सकते थे। उन्होंने चुप्पी अख्तियार कर ली।

इस बार की चुप्पी लंबी हो गयी जिसे लड़की ने ही तोड़ा, ‘सात-साढ़े सात बज चले हैं। मेरी फ्रेंड नहीं आयी। अब मैं घर चलूँगी।’

लड़की खड़ी हो गयी तो प्रेम किशोर ने स्थिति को लपक लिया, ‘तुम रिक्शा क्यों करोगी? पूरे दिन के लिए मेरा रिजर्ब्ड रिक्शा है। मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूँ।’

‘मुझे पत्थर गली मुहल्ला जाना है जो बहुत दूर है। तुम क्यों जाओगे उधर, तुम्हें तो समय पर स्टेशन जाना है।’ लड़की ने प्रेम किशोर के प्रस्ताव में रुचि नहीं दिखायी।

‘उसी मुहल्ले में मेरा एक फ्रेंड रहता है। वह भी मेरे साथ ही इस परीक्षा में बैठा था। मैं उसका हालचाल जान लूँगा और वहीं से स्टेशन चला जाऊँगा।’ प्रेम किशोर को अच्छा जवाब सूझ आया था।

लड़की ने प्रतिवाद नहीं किया। दोनों रिक्शा पर बैठ गये। रास्ते में लड़की ने बातचीत करने की कोई पहल नहीं की। प्रेम किशोर को भी कोई सूत्र नहीं सूझ रहा था। लड़की ने रिक्शे को एक पतली गली में मुड़वाया, फिर उसके बाद एक दूसरी गली में। एक छोटा मकान आया तो लड़की ने रिक्शा रुकवाया, फिर प्रेम किशोर से बिना कुछ कहे

रिक्शे से कूद कर उतर गयी।

प्रेम किशोर को उम्मीद थी, लड़की कम से कम ‘थैंक यू’ तो जरूर कहेगी लेकिन तभी ‘खटाक’ की एक भारी आवाज हुई। लड़की ने घर में घुसकर दरवाजा बंद कर दिया था।

प्रेम किशोर ने रिक्शा मुड़वाया, ‘चलो, भाई रिक्शा वाले, अब सीधे स्टेशन चलो, इस तरह चलो कि मेरी ट्रेन न छूटे।’

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शंकर

साहित्यिक पत्रकारिता और कथा-लेखन के सुप्रतिष्ठित व्यक्तित्व।

पहले ‘अब’ और अभी ‘परिकथा’ का संपादन

कृतियां

कविता संग्रह : थोड़ी सी स्याही

कहानी संग्रह : पहिये, मरता हुआ पेड़, जगो देवता जगो, एक बटा एक (शीघ्र प्रकाश्य)

संपादकीय टिप्पणियों का संग्रह : सड़क पर मोमबत्तियां

कथा आलोचना —  कहानी : परिदृश्य और प्रश्न

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