पल्लवी मुखर्जी की कविता ‘औरत और चिड़िया’

पल्लवी मुखर्जी

वह औरत
तमाम दुःखों को
रखती है
संदूक के भीतर
तह लगाकर
फिर
एक-एक कर
उन्हें खोलती जाती है
परत दर परत उनसे
गुज़रती है
और डूबती जाती है
आँखों के समुद्र में
गोते लगाती हुई
किनारे पर मिल जाती है
एक चिड़िया से

औरत और चिड़िया
एक हो जाती हैं

 

पल्लवी मुखर्जी के फेसबुक वॉल से साभार

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