पवन कुमार मौर्य की 3 कविताएं

पवन कुमार मौर्य

जन्मतिथि- 01 जून, 1993
शिक्षा– स्नातक- भूगोल (ऑनर्स) (बीएचयू, बनारस)
एमए जनसंचार-एमसीयू, भोपाल.
पेशा- दिल्ली में पत्रकारिता
पता – वर्तमान – नोएडा
स्थाई पता-
जन्म- बनारस, अब जिला- चन्दौली
गांव- मानिकपुर, पोस्ट- नौबतपुर, थाना-सैयदराजा
पिन- 232110
सम्पर्क सूत्र- 9667927643

  1. जंगली संगीत का एक टुकड़ा

    जब मैं स्वयं,
    दिमाग की उदासियों को पढ़ता हूं
    तब
    एकाग्रता को विचलित कर
    अपने ख्यालों को बदल देता हूं,

    ठीक वैसे ही जैसे
    साफ़ पानी के समंदर में
    सूरज की पहली रश्मि गिरते ही
    मछलियां दिशा बदल लेती हैं,

    या शायद इस तरह
    खंडहर में तब्दील होती
    स्तूप और किले की दीवारों को
    उनकी अनदेखी से कोई फर्क नहीं पड़ता

    फर्क पड़ता है
    मालूम भी है कि बड़ी ही बेरहमी से
    उनको सुनहरे आयाम से विलगा दिया जाएगा,

    सुनो तुम,
    मेरे दिल की धड़कन
    जिंग-जांग आती-जाती सांसों में
    जंगली संगीत का एक टुकड़ा
    कोई संगीतकार भूल गया हो
    बेपरवाही और कितनी बेकशी हैं,


    तुम, कैसे महसूस कर सकते हो
    भड़कती मेरी सांसों को
    तुम कैसे पढ़ सकते हो
    दिमाग की उदासियों को,


    विचारों की स्केटिंग पर
    पैर ठहरते कहां हैं

    शाम के पहर एकांत में
    सुनहरी धूप जब सड़कों को चूमती है
    तब, मैं बालकनी में बैठकर
    कुछ सवालों के जवाब ढूढ़ता हूं

    इन सवालों में
    प्रेमिका की गुलाबी मुस्कुराहट,
    गुजरते समय की कश्मकश,

    स्कूल से लौटते बच्चों के बस्ते में
    भरी किताबें,
    साइकिल की पतली टायर,

    खूबसूरत सड़क के बीच में आई दरार,
    पार्क में लगे लोहे के गेट को खा रही जंग
    स्ट्रीट लाइट की नजाकत
    बेकार पड़े पानी के फव्वारे
    और बेसिन पर पड़ी पानी की बेकार बूंदें
    हो सकती हैं….,

    मन की उदासियों को
    विचारों के स्केटिंग पर सैर कराने में
    आने वाले सुकून
    और उल्फत को मैं लिख सकता हूं

    इन्हें महसूस करने कि
    कोशिश की जा सकती है,

    सूर्यताप की भांति
    मन की उदासियां
    और बातों की गर्माहट

    घटती-बढ़ती रहती है
    माटी के मर्तबान में
    गरम होते पानी की तरह

    2. आहारनाल

    इंसानी बस्तियों के मुहाने से
    एक स्वर भभक उठता है
    जीवी…
    जीवित हो गई…
    अरपा…,

    काले बादलों के शोर
    कड़कड़ाती बिजलियों की रौशनी में
    मूसलाधार बारिश होती है
    एक-एक बूंद को तरसती
    उबड़-खाबड़ ज़मीन का
    आहारनाल भर उठता है,

    थोड़े मटमैले
    आंखों को किरमिचाने वाले
    गंदेले पानी से,
    अंधेरे शाम में खग नाद
    झींगुरों की चीख
    मुखबिरी से बाज नहीं आते.

    पहाड़ और वनस्पतियों को चूमती आ रही
    सलील की शंख बूंदें
    ग़मकती हैं
    सभ्यताओं को लोलुप करती
    इनकी मिश्रित गंध,

    इंसानी बस्तियों के मुहाने से
    एक स्वर भभक उठता है
    जीवी…
    जीवित हो गई…
    अरपा…,
    अरपा नदी।

    शिलाखंड, बजरी, ऊसर..
    और वनस्पतियों की आस को
    घोल देती हो जीवन के रंग में !

    एक बात बताओ,
    अरपा !
    वह मेघ कितने ख़ूबसूरत होंगे
    अपरदित शिलाखंड
    ऊसर परतों की ख़ुशबू कितनी बेजोड़ होगी?
    तुम वहां से आती होगी
    तभी तो जीवन का मीठा गीत गाती हो..।

    नहीं,
    वे शिलाखंड नग्न, उष्मित हैं
    मेघों का राग वियोग है
    सभ्यता की आंखें शुष्क हैं
    मेरी यात्रा उम्मीद और विनाश की वाणी है।

    इसीलिए,
    मेरी आहारनाल की जलराशि का गंध
    तुम्हारे चैन और उदासियों का गीत है
    तुम्हारी
    अरपा
    अरपा नदी!
    (अरपा नदी: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में बहाने वाली बरसाती नदी, जो इन दिनों भू माफिया और अवैध खनन से अपने अस्तित्व को जूझ रही है.)

    3 . अनगिनत मुलाकातों की ख्वाहिश

किसी प्रेम कथा में प्रेम


गहरी सर्दी का मौसम
ठहरे हुए दिन की उदासी
और उतरती दरिया की रवानी सा होता है
किसी प्रेम कथा में प्रेम,

किसी प्रेम कथा में प्रेम
मेघ से गिरी बूंदों के स्वाद सा
गेहूं की गमकती मटमैले गंध सा
पवन के झोंकों में गाते संगीत सा होता है
किसी प्रेम कथा में प्रेम,

संभावना ऐसी कि मानो
कोई मानसून की बूंदें गिनने बैठा हो
तुम्हारे आस-पास होता है
अजनबी भी को भी हाथ हिलाते हुए विदा करता है
किसी प्रेम कथा का नायक

किसी प्रेम कथा में प्यार और बरसात की कहानी
अनगिनत मुलाकातों की ख्वाहिश लिए
मंजीरे में उठते संगीत
और किसी मंज़िल का अधूरा रास्ता
बे- इंतजार सा निर्दोष होता है
किसी प्रेम कथा कथा में प्रेम।

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